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Bhiwani News: रोहनात की मिट्टी में आज भी महकता है शहादत का लहू
Wed, 13 Aug 2025 12:57 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
Updated Wed, 13 Aug 2025 12:57 AM IST
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गांव रोहनात का गौरव पट्ट।
बवानीखेड़ा। आजादी की लड़ाई में अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीरों की अमिट गाथा आज भी गांव रोहनात में जीवंत है। कस्बा बवानीखेड़ा से करीब 12 किलोमीटर दूर बसे इस गांव ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजी हुकूमत को सीधी चुनौती दी थी। यहां के क्रांतिकारियों के बलिदान को अंग्रेजों ने इतनी क्रूरता से कुचला कि उनकी यादें आज भी ‘लाल सड़क’ और नीलाम हुई जमीन के रूप में मौजूद हैं।
11 मई 1857 को दिल्ली से उठी क्रांति की चिंगारी रोहनात तक पहुंचते ही बहादुर शाह का आदेश यहां के क्रांतिकारियों को मिल चुका था। आदेश पाते ही 29 मई 1857 को शुक्रवार के दिन रोहनात और आसपास के गांवों ने अंग्रेजों पर हमला बोल दिया। सबसे पहले तोशाम फिर हांसी और हिसार पर धावा बोला गया। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों का खजाना लूट लिया, जेल तोड़कर कैदियों को मुक्त करा दिया। इस हमले में हिसार में 12 और हांसी में 11 अंग्रेज अधिकारी मारे गए।
इस साहसिक विद्रोह का बदला लेने के लिए अंग्रेजों ने हांसी में पलटन भेजी और नजदीकी गांवों में कहर बरपा दिया। पुट्ठी मंगल खां गांव पर तोप दागी गई, रोहनात को गोलों से तहस-नहस कर दिया गया। जमालपुर, हाजमपुर, भाटोल, खरड़, अलीपुर और मंगाली गांवों में आग लगा दी गई। पकड़े गए क्रांतिकारियों को हांसी लाकर सड़क पर लिटाकर रोड रोलर से कुचल दिया गया। उनके खून से लाल हुई इस सड़क को आज भी ‘लाल सड़क’ के नाम से जाना जाता है। इसी सड़क पर गांव के नोंदाराम को कुचला गया जबकि वीरड़ा दास स्वामी को तोप से उड़ा दिया गया।
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हांसी के तहसीलदार को 14 सितंबर 1857 को हिसार के उपायुक्त मिस्टर विलियम ख्वाजा ने पत्र लिखकर रोहनात की सारी जमीन नीलाम करने का आदेश दिया। 20 जुलाई 1858 को गांव की 20,656 बीघा 19 बिसवा जमीन में से सिर्फ तालाब वाली 13 बीघा 10 बिसवा जमीन छोड़कर बाकी सब नीलाम कर दी गई। यह भूमि 61 लोगों ने 8,100 रुपये में खरीदी, जिनमें उमरा के 29, सुल्तानपुर के 20, मेहंदीपुर का 1, भगाना के 7 और मुजाहिदपुर के 4 लोग शामिल थे। आज भी इस जमीन का पट्टानामा इन्हीं खरीदारों के नाम दर्ज है।
गांव में बना एक कुआं भी अंग्रेजी बर्बरता की गवाही देता है। हमले के दौरान इज्जत बचाने के लिए हजारों ग्रामीणों ने इसी कुएं में छलांग लगाकर जान दे दी थी। वीरड़ा दास बैरागी, रूपा खाती और नोंदाराम जैसे वीरों की शहादत आज भी रोहनात की मिट्टी में बसी है। संवाद
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11 मई 1857 को दिल्ली से उठी क्रांति की चिंगारी रोहनात तक पहुंचते ही बहादुर शाह का आदेश यहां के क्रांतिकारियों को मिल चुका था। आदेश पाते ही 29 मई 1857 को शुक्रवार के दिन रोहनात और आसपास के गांवों ने अंग्रेजों पर हमला बोल दिया। सबसे पहले तोशाम फिर हांसी और हिसार पर धावा बोला गया। क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों का खजाना लूट लिया, जेल तोड़कर कैदियों को मुक्त करा दिया। इस हमले में हिसार में 12 और हांसी में 11 अंग्रेज अधिकारी मारे गए।
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इस साहसिक विद्रोह का बदला लेने के लिए अंग्रेजों ने हांसी में पलटन भेजी और नजदीकी गांवों में कहर बरपा दिया। पुट्ठी मंगल खां गांव पर तोप दागी गई, रोहनात को गोलों से तहस-नहस कर दिया गया। जमालपुर, हाजमपुर, भाटोल, खरड़, अलीपुर और मंगाली गांवों में आग लगा दी गई। पकड़े गए क्रांतिकारियों को हांसी लाकर सड़क पर लिटाकर रोड रोलर से कुचल दिया गया। उनके खून से लाल हुई इस सड़क को आज भी ‘लाल सड़क’ के नाम से जाना जाता है। इसी सड़क पर गांव के नोंदाराम को कुचला गया जबकि वीरड़ा दास स्वामी को तोप से उड़ा दिया गया।
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हांसी के तहसीलदार को 14 सितंबर 1857 को हिसार के उपायुक्त मिस्टर विलियम ख्वाजा ने पत्र लिखकर रोहनात की सारी जमीन नीलाम करने का आदेश दिया। 20 जुलाई 1858 को गांव की 20,656 बीघा 19 बिसवा जमीन में से सिर्फ तालाब वाली 13 बीघा 10 बिसवा जमीन छोड़कर बाकी सब नीलाम कर दी गई। यह भूमि 61 लोगों ने 8,100 रुपये में खरीदी, जिनमें उमरा के 29, सुल्तानपुर के 20, मेहंदीपुर का 1, भगाना के 7 और मुजाहिदपुर के 4 लोग शामिल थे। आज भी इस जमीन का पट्टानामा इन्हीं खरीदारों के नाम दर्ज है।
गांव में बना एक कुआं भी अंग्रेजी बर्बरता की गवाही देता है। हमले के दौरान इज्जत बचाने के लिए हजारों ग्रामीणों ने इसी कुएं में छलांग लगाकर जान दे दी थी। वीरड़ा दास बैरागी, रूपा खाती और नोंदाराम जैसे वीरों की शहादत आज भी रोहनात की मिट्टी में बसी है। संवाद