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Bhiwani News: महिला जनप्रतिनिधियों के अधिकारों के हनन पर आयोग सख्त, समन जारी

Mon, 15 Dec 2025 01:42 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी Updated Mon, 15 Dec 2025 01:42 AM IST
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National Human Rights Commission
एनएचआरसी की ओर से जारी पत्र।
भिवानी। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने पंचायत राज संस्थानों (पीआरएलएस) एवं शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबीएस) में महिलाओं के लिए आरक्षित पदों पर उनके पति के नाम से प्रत्याशी प्रतिनिधित्व की गंभीर समस्या पर कड़ा रुख अपनाया है।
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आयोग ने इस संबंध में हरियाणा राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व सदस्य सुशील वर्मा की ओर से की गई शिकायत पर जांच के बाद राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों के पंचायती राज विभाग एवं शहरी स्थानीय निकाय विभाग के प्रमुख सचिवों से कार्रवाई रिपोर्ट (एटीआर) मांगी। लेकिन आंध्रप्रदेश, बिहार, ओडिशा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों को छोड़कर अधिकतर राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
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इसे गंभीरता से लेते हुए एनएचआरसी ने 32 राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों के शहरी निकायों और पंचायती राज विभागों के प्रमुख सचिवों को 30 दिसंबर को आयोग के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए सशर्त समन जारी किए हैं। यदि 22 दिसंबर तक विस्तृत एटीआर आयोग को मिल जाती है तो व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी जा सकती है। आयोग ने दो टूक कहा है कि महिला आरक्षण का उद्देश्य केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि वास्तविक नेतृत्व और निर्णयकारी भूमिका सुनिश्चित करना है।
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क्या थी शिकायत
शिकायत में सुशील वर्मा ने दावा किया था कि अधिकतर निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति या रिश्तेदार वास्तविक सत्ता का प्रयोग कर रहे हैं, जो कि संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों और महिलाओं की गरिमा के विरुद्ध है। यह प्रथा डब्ल्यूपी (सी) नंबर 615/2023 में सर्वोच्च न्यायालय से भी असांविधानिक करार दी जा चुकी है। एनएचआरसी के सदस्य प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने जांच में पाया कि यह प्रथा अनुच्छेद 14, 15(3) और 21 के तहत प्रदत्त समानता, गरिमा और जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। यह 73वें एवं 74वें संविधान संशोधनों की भावना के विपरीत है जिनका उद्देश्य महिलाओं को वास्तविक सशक्तीकरण करना है।

आयोग का दायित्व केवल अधिकारों का संरक्षण करना ही नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि सांविधानिक प्रावधानों का वास्तविक और प्रभावी क्रियान्वयन हो। निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति या रिश्तेदार शासन चलाते हैं, तो यह महिलाओं की गरिमा, समानता और आत्म निर्णय के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है। -सुशील वर्मा, पूर्व सदस्य, हरियाणा राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग।



एनएचआरसी का स्पष्ट मत है कि महिलाओं के लिए आरक्षित पदों पर किसी भी प्रकार का प्रत्याशी प्रतिनिधित्व, चाहे वह ‘सरपंच पति’ या ‘प्रधान पति’ के रूप में हो या किसी अन्य अनौपचारिक माध्यम से संविधान की मूल भावना के विपरीत है। लोकतंत्र में निर्वाचित महिला प्रतिनिधि ही अपने पद की वैधानिक, प्रशासनिक और निर्णयकारी अधिकारिता की वास्तविक धारक हैं। -प्रियंक कानूनगो, सदस्य, राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग।
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