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प्रवचन सुनकर उनका मनन करना भी जरूरी है : कैलाश कृष्ण
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29 फोटो श्रीराम कथा सुनाते पंडित कैलाश कृष्ण। विज्ञप्ति
- फोटो : Bhiwani
भिवानी। जहरगिरी आश्रम में जारी श्रीराम कथा के छठे दिन वीरवार को पंडित कैलाश कृष्ण महाराज ने कहा कि ज्ञानी व्यक्ति वही होता है, जिसके जीवन में कोई भी दुर्गुण व विकार न हो। व्यक्ति के मन में बुराई हो तो उसे पूरे संसार मे बुराई नजर आती है। इसलिए हमें अपने मन में बुराई को प्रवेश नही होने देना चाहिए। महाराज ने कहा कि प्रवचन सुनने के साथ-साथ उनका मनन करना भी जरूरी है। गर हम प्रवचन सुन उनका मनन नहीं करते, या फिर उन पर अमल नहीं करते तो इसका कोई फायदा नहीं है।
उन्होंने कहा कि श्रोतागण विचारों को सुनते भी है, परंतु कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता। कारण यही है कि आज मनुष्य केवल इन विचारों को सुनने तक ही सीमित है तो इन पर मनन ही करता है और ही ईश्वर दर्शन के लिए आगे कदम बढ़ाता है, तभी इन विचारों से लाभ नहीं उठा पाता। ईश्वर दर्शन के लिए प्रेरित करना ही महापुरुषों के सत्संग व प्रवचनों का मुख्य उद्देश्य होता है।
इसलिए मात्र सुनना ही पर्याप्त नहीं है। जिस प्रकार नींव की पहली ईंट यदि गलत स्थान पर रख दी जाए तो नींव ही नहीं, वरन पूरी इमारत ही गिर जाएगी। उन्होंने कहा कि यदि हम प्रभु सिमरन में अपना जीवन लगाएं तो ही जीवन के आवागमन के चक्र से मुक्त हो सकेंगे और मोक्ष हासिल करेंगे। यदि आरंभ में ही गलती की तो आगे चलकर भी गलतियां ही होंगी। इसलिए संतों ने कहा है कि केवल सुनकर आचरण करना घातक सिद्ध हो सकता है। सुनने के साथ-साथ मनन करना भी आवश्यक है।
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उन्होंने कहा कि श्रोतागण विचारों को सुनते भी है, परंतु कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता। कारण यही है कि आज मनुष्य केवल इन विचारों को सुनने तक ही सीमित है तो इन पर मनन ही करता है और ही ईश्वर दर्शन के लिए आगे कदम बढ़ाता है, तभी इन विचारों से लाभ नहीं उठा पाता। ईश्वर दर्शन के लिए प्रेरित करना ही महापुरुषों के सत्संग व प्रवचनों का मुख्य उद्देश्य होता है।
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इसलिए मात्र सुनना ही पर्याप्त नहीं है। जिस प्रकार नींव की पहली ईंट यदि गलत स्थान पर रख दी जाए तो नींव ही नहीं, वरन पूरी इमारत ही गिर जाएगी। उन्होंने कहा कि यदि हम प्रभु सिमरन में अपना जीवन लगाएं तो ही जीवन के आवागमन के चक्र से मुक्त हो सकेंगे और मोक्ष हासिल करेंगे। यदि आरंभ में ही गलती की तो आगे चलकर भी गलतियां ही होंगी। इसलिए संतों ने कहा है कि केवल सुनकर आचरण करना घातक सिद्ध हो सकता है। सुनने के साथ-साथ मनन करना भी आवश्यक है।
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