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कपास-ग्वार से मोहभंग, दलहनी फसलों में मोह
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 29 Sep 2016 12:33 AM IST
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- फोटो : फाइल फोटो
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खरीफ की फसल को लेकर किसानी के ट्रेंड में बदलाव आना शुरू हो गया है। विगत आठ-दस वर्षों से मुख्य फसल मानी जाने वाली कपास व ग्वार के प्रति किसानों का मोहभंग होता जा रहा है और इसका स्थान अब दलहनी फसल लेती जा रही हैं। लगातार दूसरे वर्ष जिले में कपास और ग्वार के रकबे में गिरावट दर्ज की गई है। इन दोनों फसलों के स्थान पर बाजरा और दाल उगाने में किसानों ने रुचि दिखाई है। किसानी के नए ट्रेंड का इस बार बरसात ने भी अच्छा साथ दिया है। इसलिए, अच्छी पैदावार की भी आस है।
पिछले चार-पांच वर्षों के दौरान कम बरसात व दो वर्षों से कपास में सफेद मक्खी के कारण नुकसान होने पर किसानों ने इस बार खेती में बदलाव किया। विकल्प के तौर पर कपास की खेती करने वाले किसानों ने अन्य किस्मों की बजाए देशी कपास व दलहनी फसलों में अरहर को तरजीह दी। पिछले वर्ष कपास फसलों में सफेद मक्खी रोग के प्रकोप से करीबन 70 से 80 फीसदी फसल बर्बाद हो गई थी।
रोग बढ़ा तो किसान की कपास से तौबा
वर्ष 2015-16 में जिले में 93 हजार हेक्टेयर में कपास रोपी गई थी। लेकिन करीबन 70 हजार हेक्टेयर फसल सफेद मक्खी की चपेट में आने से किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ा। फलस्वरूप इस वर्ष केवल 56,500 हेक्टेयर रकबे में कपास रोपी गई। जुलाई माह से ही मानसून की अच्छी बारिश होने व कम खर्चीली होने से बाजरा की फसल की ओर किसानों का रुझान बढ़ा। साथ ही फसल में किसी प्रकार के रोग की संभावना भी नहीं होने से जिले में गत वर्ष की अपेक्षा दोगुने क्षेत्र (1,06,000) में बाजरा की रोपाई हुई।
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मांग बढ़ी तो किसानों ने दाल पर लगाया दांव
बीते वर्षों से कृषि विभाग के लक्ष्य को भी बमुश्किल हासिल करने वाली दलहनी फसलों के रकबे में इस बार रिकार्ड बढ़ोतरी हुई। विभाग के पांच हजार हेक्टेयर लक्ष्य से लगभग तीन गुणा दलहनी फसलों का रकबा बढ़ा। किसानों ने कपास की जगह पर अरहर की खेती को तरजीह दी। इसके अलावा मूंग, मोठ आदि दालें के रकबे में भी बढ़ोतरी हुई।
मोटे अनाज से मोटा मुनाफे की आस
अनाज मंडी में भी खरीद शुरू होने के 20 दिनों में ही लगभग 30 हजार क्विंटल बाजरा की आवक हो चुकी। आढ़तियों को सीजन खत्म होने तक तकरीबन एक लाख क्विंटल तक बाजरा मंडी में पहुंचने की उम्मीद है।
पिछले वर्षों में कपास की फसल में सफेद मक्खी के कारण नुकसान व बारिश की कमी से किसानों के रुझान में बदलाव आया। कपास में सफेद मक्खी का कीड़ा व ग्वार में जड़ गलन, बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट समस्या के कारण बिजाई क्षेत्र घटा। दूसरी ओर जुलाई से ही नियमित अंतराल पर मानसून की अच्छी बारिश ने बाजरा व दलहन फसलों की बिजाई भी सही समय पर की जा सकी।
डा. विनोद कुमार, कृषि वैज्ञानिक, केवीके
वर्ष 2015-16
फसल रकबा
कपास 93,000
बाजरा 52,000
ग्वार 1,31,000
दलहन 4,570
तिलहन 450
(हेक्टेयर में)
--
वर्ष 2016-17
फसल रकबा
कपास 56,500
बाजरा 1,06000
ग्वार 90,500
दलहन 14,200
तिलहन 200
(हेक्टेयर में)
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पिछले चार-पांच वर्षों के दौरान कम बरसात व दो वर्षों से कपास में सफेद मक्खी के कारण नुकसान होने पर किसानों ने इस बार खेती में बदलाव किया। विकल्प के तौर पर कपास की खेती करने वाले किसानों ने अन्य किस्मों की बजाए देशी कपास व दलहनी फसलों में अरहर को तरजीह दी। पिछले वर्ष कपास फसलों में सफेद मक्खी रोग के प्रकोप से करीबन 70 से 80 फीसदी फसल बर्बाद हो गई थी।
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रोग बढ़ा तो किसान की कपास से तौबा
वर्ष 2015-16 में जिले में 93 हजार हेक्टेयर में कपास रोपी गई थी। लेकिन करीबन 70 हजार हेक्टेयर फसल सफेद मक्खी की चपेट में आने से किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ा। फलस्वरूप इस वर्ष केवल 56,500 हेक्टेयर रकबे में कपास रोपी गई। जुलाई माह से ही मानसून की अच्छी बारिश होने व कम खर्चीली होने से बाजरा की फसल की ओर किसानों का रुझान बढ़ा। साथ ही फसल में किसी प्रकार के रोग की संभावना भी नहीं होने से जिले में गत वर्ष की अपेक्षा दोगुने क्षेत्र (1,06,000) में बाजरा की रोपाई हुई।
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मांग बढ़ी तो किसानों ने दाल पर लगाया दांव
बीते वर्षों से कृषि विभाग के लक्ष्य को भी बमुश्किल हासिल करने वाली दलहनी फसलों के रकबे में इस बार रिकार्ड बढ़ोतरी हुई। विभाग के पांच हजार हेक्टेयर लक्ष्य से लगभग तीन गुणा दलहनी फसलों का रकबा बढ़ा। किसानों ने कपास की जगह पर अरहर की खेती को तरजीह दी। इसके अलावा मूंग, मोठ आदि दालें के रकबे में भी बढ़ोतरी हुई।
मोटे अनाज से मोटा मुनाफे की आस
अनाज मंडी में भी खरीद शुरू होने के 20 दिनों में ही लगभग 30 हजार क्विंटल बाजरा की आवक हो चुकी। आढ़तियों को सीजन खत्म होने तक तकरीबन एक लाख क्विंटल तक बाजरा मंडी में पहुंचने की उम्मीद है।
पिछले वर्षों में कपास की फसल में सफेद मक्खी के कारण नुकसान व बारिश की कमी से किसानों के रुझान में बदलाव आया। कपास में सफेद मक्खी का कीड़ा व ग्वार में जड़ गलन, बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट समस्या के कारण बिजाई क्षेत्र घटा। दूसरी ओर जुलाई से ही नियमित अंतराल पर मानसून की अच्छी बारिश ने बाजरा व दलहन फसलों की बिजाई भी सही समय पर की जा सकी।
डा. विनोद कुमार, कृषि वैज्ञानिक, केवीके
वर्ष 2015-16
फसल रकबा
कपास 93,000
बाजरा 52,000
ग्वार 1,31,000
दलहन 4,570
तिलहन 450
(हेक्टेयर में)
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वर्ष 2016-17
फसल रकबा
कपास 56,500
बाजरा 1,06000
ग्वार 90,500
दलहन 14,200
तिलहन 200
(हेक्टेयर में)
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