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नहरों और बिजली की कमी से 50 फीसदी तक घटा कृषि का रकबा
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 28 Oct 2016 12:15 AM IST
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भिवानी।
जिले के गठन के बाद नहरों का जाल बिछा और ट्यूबवेल बढ़े तो 30 फीसदी भूमि नहरी पानी से सिंची जाने लगी। लेकिन, पिछले 20 सालों में अचानक गिरावट आई और यह प्रतिशतता घट कर 18 फीसद पहुंच गई। ट्यूबवेल के लिए पर्याप्त बिजली नहीं तो संसाधन होने के बावजूद काफी भूमि सूखी रह जाती है। कमोबेश यही हाल औद्योगिक क्षेत्र का है।
जिले में 10 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि होने के बावजूद किसान बेहाल है। इसका कारण है बरसात पर निर्भरता। जिले की कृषि एक तिहाई तक बरसात पर निर्भर करती है। बरसात अक्सर या तो कम होती है या ज्यादा। इससे नुकसान ही होता है। इसके अलावा नहरी पानी का अभाव और बिजली किल्लत। नहरों की टेल तक पानी नहीं पहुंच रहा है। पहले जहां तीन लाख हेक्टेयर तक भूमि नहरी पानी से सिंची जाती थी। मगर इसमें अब भारी गिरावट आ गई है। अब केवल पौने दो लाख हेक्टेयर भूमि ही नहरी पानी से सिंची जाती है। ट्यूबवेल से पहले 60 फीसदी सिंचाई होती थी। खंभे लगाना, तार, ट्यूबवेल कनेक्शन सब सरकार देती थी। मगर अब खंभे, तार लगाने का खर्च भी किसान से वसूला जाता है। ट्यूबवेल कनेक्शन तत्काल लेना हो तो एक लाख रुपये अलग से जमा कराने होंगे। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाए। कभी ओलावृष्टि तो कभी सूखा। मुआवजा भी समय पर नहीं मिला और जो मिलता है वह फसली नुकसान से बहुत कम।
एक्सपर्ट व्यू
1982 तक कृषि किसानों के लिए फायदे की स्थिति थी। भिवानी जिले की कृषि एक तिहाई तक बरसात पर निर्भर है। इस कारण यहां कृषि फायदे का कम घाटे का सौदा ज्यादा साबित हो रही है। उसके बाद मौसम की मार पाला, शीत लहर व अन्य। अब बीमारियों व इन आपदाओं को मुआवजे से भी बाहर कर दिया है।
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मा. शेर सिंह, प्रदेशाध्यक्ष
किसान सभा
25 से अधिक बड़ी औद्योगिक इकाइयों पर लटके ताले
कभी प्लास्टिक उद्योग में एशिया भर में अपनी पहचान बनाने वाले भिवानी प्लास्टिक उद्योग के पांव अब उखड़ने लगे है। प्लास्टिक और सर्जिकल प्लांट की तरक्की को किसी की बुरी नजर लग गई है। भिवानी से करीब 25 फैक्टरी बंद हो चुकी है। इनके हजारों मजदूर बेरोजगार हो चुके है। पहले जहां 40 से अधिक पीपी प्लांट होते थे और 40 टन प्रति माह उत्पादन होता था वहीं अब 22 पीपी प्लांट ही बचे है। वे भी अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहे है। सर्जिकल प्लांट का भी बुरा हाल है और अधिकतर प्लांटों पर ताले लटके है। औद्योगिक इकाइयों के समक्ष अनेक समस्याएं है। जिनमें मुख्य है रॉ मटीरियल पर टैक्स और वैट। इसके अलावा मशीनों पर कोई सब्सिडी नहीं। बिजली अन्य राज्यों से महंगी, कचरा डंप करने का कोई स्थान नहीं।
फैक्ट फाइल
* 2200 है लघु और सूक्ष्म इकाइयां
* 1300-1400 है सूक्ष्म इकाइयां
* 8-10 लाख औसतन मासिक टर्न ओवर है लघु इकाइयों का
* 6-7 लाख औसतन मासिक टर्नओवर है सूक्ष्म इकाइयों का
* औसतन 10 श्रमिक है लघु इकाइयों में
* औसतन 4-5 श्रमिक है सूक्ष्म इकाइयों में।
न मेंटनेंस सुविधाएं और न ही लोगों का विजन
भिवानी में सुविधाओं की कमी है। दरअसल यहां लोगों का विजन भी नहीं है। अब सर्जिकल इंडस्ट्री लगभग खत्म हो गई है। उनके समय में एक-एक इक्यूवपमेंट दो-दो लाख में बिकता था। उस समय हम क्वालिटी देते थे। अब वह क्वालिटी नहीं है और महज 20-20 हजार रुपये में वो ही इक्यूवमेंट मिल रहे है। मशीन में खराबी आ जाए तो यहां इंजीनियर नहीं है।
स्वामी सिद्ध स्वरूप
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जिले के गठन के बाद नहरों का जाल बिछा और ट्यूबवेल बढ़े तो 30 फीसदी भूमि नहरी पानी से सिंची जाने लगी। लेकिन, पिछले 20 सालों में अचानक गिरावट आई और यह प्रतिशतता घट कर 18 फीसद पहुंच गई। ट्यूबवेल के लिए पर्याप्त बिजली नहीं तो संसाधन होने के बावजूद काफी भूमि सूखी रह जाती है। कमोबेश यही हाल औद्योगिक क्षेत्र का है।
जिले में 10 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि होने के बावजूद किसान बेहाल है। इसका कारण है बरसात पर निर्भरता। जिले की कृषि एक तिहाई तक बरसात पर निर्भर करती है। बरसात अक्सर या तो कम होती है या ज्यादा। इससे नुकसान ही होता है। इसके अलावा नहरी पानी का अभाव और बिजली किल्लत। नहरों की टेल तक पानी नहीं पहुंच रहा है। पहले जहां तीन लाख हेक्टेयर तक भूमि नहरी पानी से सिंची जाती थी। मगर इसमें अब भारी गिरावट आ गई है। अब केवल पौने दो लाख हेक्टेयर भूमि ही नहरी पानी से सिंची जाती है। ट्यूबवेल से पहले 60 फीसदी सिंचाई होती थी। खंभे लगाना, तार, ट्यूबवेल कनेक्शन सब सरकार देती थी। मगर अब खंभे, तार लगाने का खर्च भी किसान से वसूला जाता है। ट्यूबवेल कनेक्शन तत्काल लेना हो तो एक लाख रुपये अलग से जमा कराने होंगे। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाए। कभी ओलावृष्टि तो कभी सूखा। मुआवजा भी समय पर नहीं मिला और जो मिलता है वह फसली नुकसान से बहुत कम।
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एक्सपर्ट व्यू
1982 तक कृषि किसानों के लिए फायदे की स्थिति थी। भिवानी जिले की कृषि एक तिहाई तक बरसात पर निर्भर है। इस कारण यहां कृषि फायदे का कम घाटे का सौदा ज्यादा साबित हो रही है। उसके बाद मौसम की मार पाला, शीत लहर व अन्य। अब बीमारियों व इन आपदाओं को मुआवजे से भी बाहर कर दिया है।
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मा. शेर सिंह, प्रदेशाध्यक्ष
किसान सभा
25 से अधिक बड़ी औद्योगिक इकाइयों पर लटके ताले
कभी प्लास्टिक उद्योग में एशिया भर में अपनी पहचान बनाने वाले भिवानी प्लास्टिक उद्योग के पांव अब उखड़ने लगे है। प्लास्टिक और सर्जिकल प्लांट की तरक्की को किसी की बुरी नजर लग गई है। भिवानी से करीब 25 फैक्टरी बंद हो चुकी है। इनके हजारों मजदूर बेरोजगार हो चुके है। पहले जहां 40 से अधिक पीपी प्लांट होते थे और 40 टन प्रति माह उत्पादन होता था वहीं अब 22 पीपी प्लांट ही बचे है। वे भी अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहे है। सर्जिकल प्लांट का भी बुरा हाल है और अधिकतर प्लांटों पर ताले लटके है। औद्योगिक इकाइयों के समक्ष अनेक समस्याएं है। जिनमें मुख्य है रॉ मटीरियल पर टैक्स और वैट। इसके अलावा मशीनों पर कोई सब्सिडी नहीं। बिजली अन्य राज्यों से महंगी, कचरा डंप करने का कोई स्थान नहीं।
फैक्ट फाइल
* 2200 है लघु और सूक्ष्म इकाइयां
* 1300-1400 है सूक्ष्म इकाइयां
* 8-10 लाख औसतन मासिक टर्न ओवर है लघु इकाइयों का
* 6-7 लाख औसतन मासिक टर्नओवर है सूक्ष्म इकाइयों का
* औसतन 10 श्रमिक है लघु इकाइयों में
* औसतन 4-5 श्रमिक है सूक्ष्म इकाइयों में।
न मेंटनेंस सुविधाएं और न ही लोगों का विजन
भिवानी में सुविधाओं की कमी है। दरअसल यहां लोगों का विजन भी नहीं है। अब सर्जिकल इंडस्ट्री लगभग खत्म हो गई है। उनके समय में एक-एक इक्यूवपमेंट दो-दो लाख में बिकता था। उस समय हम क्वालिटी देते थे। अब वह क्वालिटी नहीं है और महज 20-20 हजार रुपये में वो ही इक्यूवमेंट मिल रहे है। मशीन में खराबी आ जाए तो यहां इंजीनियर नहीं है।
स्वामी सिद्ध स्वरूप