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आजादी के संघर्ष में जब गांधी ने भरा जोश तो लोगों ने दी गिरफ्तारियां
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पानीपत। देश के प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 में हरियाणा (उस समय संयुक्त पंजाब) की धरती भी देश के वीर सपूतों के खून से लाल हुई थी। मेरठ से करीब नौ घंटे पहले अंबाला में क्रांति शुरू हो गई थी, जब सैनिकों ने विद्रोह कर दिया था। वहीं पानीपत में भी निर्धारित समय से पहले ही क्रांति का बिगुल बज गया था। आजादी के लिए संघर्ष की चिंगारी पूरे प्रदेश में फैल गई, जबकि अंग्रेजों से कई क्षेत्रों को मुक्त करा लिया था। इसके बाद स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में आजादी के लिए संघर्ष में महात्मा गांधी ने जहां अंबाला व पानीपत में आकर जोश भरा था, तो वहीं प्रदेश में रोलेट एक्ट के तहत हरियाणा आगमन पर गिरफ्तारियां दीं थीं। आजाद हिंद फौज में भी करनाल से 14 अफसर व 105 सैनिक, अंबाला से एक अफसर समेत 31 ने देश के लिए लड़ाई लड़ी।
अंबाला में इस तरह शुरू हुआ था 1857 में आजादी के लिए विद्रोह
अंबाला में हर मैजिस्टीज 9वां रिसाला, चौथा बंगाली रिसाला, पांचवी बंगाली देशी पलटन, 60वीं बंगाली देशी पलटन, 2 ट्रूूप घुड़सवार, तोपखाना (यूरोपियन) मौजूद थे। पंजाब और उत्तर पश्चिमी प्रांत के समस्त सैनिकों अड्डों से बहुत सारी सैनिक टुकड़िया भी एंफील्ड राइफलों का प्रशिक्षण लेने आईं थीं, जिन्होंने कारतूस वापस लेने की मांग रखी, जो मंजूर नहीं हुई। योजना थी कि दस मई 1857 को जब अंग्रेज गिरिजाघर जाएंगे तो 60वीं और पांचवीं पलटन शस्त्रागारों पर कब्जा करेंगी, घुड़सेना का चौथा दस्ता तोपों पर कब्जा करेगा, हर मैजिस्टीज के 9वें रिसाले पर प्रहार करेगा और उनके घोड़ों को भगा देगा। इसके बाद संघर्ष शुरू किया जाएगा। दिल्ली और मेरठ आदि छावनियों के संपर्क में ये सैनिक थे। अंबाला में मेरठ से करीब नौ घंटे पहले विद्रोह शुरू हो गया था, लेकिन योजना की सूचना अंग्रेजों को पहले लग गई, अंग्रेज सैनिकों ने विद्रोहियों को घेर लिया, जिससे इनको समझौता करना पड़ गया।
हरियाणा में ऐसे हुआ था आजादी के लिए संघर्ष
गुरुग्राम में दिल्ली से करीब 300 सैनिक 13 मई को हमले के लिए पहुंचे, जिनको अंग्रेजों ने रोकना चाहा, लेकिन असफल रहे। कलेक्टर विलियम फोर्ड गुरुग्राम छोड़ गए, जबकि क्रांतिकारियों को 7.80 लाख हाथ लगे। मेवाती इलाके से अंग्रेजों का राज समाप्त हो गया।
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रोहतक में मई के तीसरे सप्ताह में क्रांति भड़की। लोगों ने दिल्ली के सम्राट बहादुरशाह जफर को अपना नेता मान लिया और संघर्ष जारी रखा। अगस्त के दूसरे सप्ताह में लेफिटनेंट हडसन का दस्ता भेजा गया, लेकिन उन पर भी क्रांतिकारी हावी रहे।
हिसार के हर गांव में मई के तीसरे सप्ताह में क्रांति शुरु हुई। इनका नेतृत्व भट्ठू के सहायक पेट्रोल अधकारी शहजादा मुहम्मद आजिम ने किया। फिरोजपुर के डिप्टी कमिश्नर जनरल वार्न कोर्टलैंड के नेतृत्व में सेना भेजी। संघर्ष में 530 क्रांतिकारी शहीद हुए और कई घायल हुए।
पानीपत और थानेसर में क्रांति जोरों पर हुई। यमुना किनारे बसे गुर्जरों ने कैथल, असंध और जलमाना के जाटों ने कोल, पिपली तथा अमीन के रोड़ों, कुरुक्षत्र के सैनियों, लाडवा के सिखों ने अंग्रेजों को हराकर क्षेत्रों पर कब्जा किया। पटियाला से डेढ़ हजार सैनिक चर तोपें, जींद नरेश ने 400 सैनिक, कुंजपुरा और करनाल के शासकों ने 500 सैनिक भेजे। अंग्रेजों ने बड़ी मुश्किल से इन पर काबू पाया।
यह भी रहा महत्वपूर्ण
28 जून 1857 को अंबाला में बंदी सैनिकों ने संघर्ष किया।
- कांग्रेस स्थापना में सदस्य रहे अंबाला के लाला मुरलीधर ने लोगों को एकजुट किया।
- महात्मा गांधी अंबाला में 8 मार्च 1921 अंबाला आए और आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित किया, इसी तरह वे 17 फरवरी 1921 को रोहतक भी आए।
- महात्मा गांधी जी दिल्ली व पंजाब (मौजूदा हरियाणा समेत) रोलेट एक्ट के तहत पलवल पहुंचे, तो उनको गिरफ्तार किया गया।
- खिलाफत आंदालेन में अंबाला में अब्दुल रशीद, गुलाम भीख नैरंग जैसे वकील और खान अब्दुल्ल गफ्फार खान ने संघर्ष आगे बढ़ाया।
- व्यक्तिगत सत्याग्रह
आजादी के संघर्ष में व्यक्तिगत सत्याग्रह के तहत अंबाला में 120, गुरुग्राम में 32, हिसार में 77, करनाल में 36 तथा रोहतक में 251 गिरफ्तारियां दी गईं। इसके अलावा उक्त जिलों से 43 अन्य तरह की गिरफ्तारियां रहीं।
- आजाद हिंद फौज में यह रहा योगदान
आजाद हिंद फौज में रोहतक से 149 अफर, 724 सैनिक, करनाल से14 अफसर व 105 सैनिक, जींद से 53 अफसर व 296 सैनिक, हिसार से 61 अफसर व 478 सैनिक, गुरुग्राम से 106 अफसर व 580 सैनिक, महेंद्रगढ़ से 14 अफसर व 104 सैनिक तथा अंबाला से एक अफसर व 30 सैनिक शामिल हुए। इन में से 348 शहीद हुए।
विदेशी सामान का बहिष्कार
स्वदेशी को अपनाने के लिए विदेशी सामान का बहिष्कार भी किया गया। इस में 1905 में जहां 25 हजार रुपये का सामान अंबाला में खरीदा गया था, वहीं 1907 में यह महज दस हजार रह गया। इसी तरह करनाल में 16 हजार से आठ हजार, हिसार में दस हजार से चार हजार तथा रोहतक व गुरुग्राम में पूर्ण बहिष्कार रहा।
- 1857 से लेकर आजादी मिलने तक देश के वीरों ने काफी कुर्बानियां दीं। इतिहास पर नजर मारें, तो हरियाणा में तमाम लोगों ने बलिदान दिया, जबकि अंबाला व पानीपत में भी ऐसी कई घटनाएं हुईं, जिसने देश की आजादी के संघर्ष को काफी बढ़ाया।
- डा. अतुल यादव, इतिहासकार, प्रो. राजकीय कालेज अंबाला कैंट।
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अंबाला में इस तरह शुरू हुआ था 1857 में आजादी के लिए विद्रोह
अंबाला में हर मैजिस्टीज 9वां रिसाला, चौथा बंगाली रिसाला, पांचवी बंगाली देशी पलटन, 60वीं बंगाली देशी पलटन, 2 ट्रूूप घुड़सवार, तोपखाना (यूरोपियन) मौजूद थे। पंजाब और उत्तर पश्चिमी प्रांत के समस्त सैनिकों अड्डों से बहुत सारी सैनिक टुकड़िया भी एंफील्ड राइफलों का प्रशिक्षण लेने आईं थीं, जिन्होंने कारतूस वापस लेने की मांग रखी, जो मंजूर नहीं हुई। योजना थी कि दस मई 1857 को जब अंग्रेज गिरिजाघर जाएंगे तो 60वीं और पांचवीं पलटन शस्त्रागारों पर कब्जा करेंगी, घुड़सेना का चौथा दस्ता तोपों पर कब्जा करेगा, हर मैजिस्टीज के 9वें रिसाले पर प्रहार करेगा और उनके घोड़ों को भगा देगा। इसके बाद संघर्ष शुरू किया जाएगा। दिल्ली और मेरठ आदि छावनियों के संपर्क में ये सैनिक थे। अंबाला में मेरठ से करीब नौ घंटे पहले विद्रोह शुरू हो गया था, लेकिन योजना की सूचना अंग्रेजों को पहले लग गई, अंग्रेज सैनिकों ने विद्रोहियों को घेर लिया, जिससे इनको समझौता करना पड़ गया।
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हरियाणा में ऐसे हुआ था आजादी के लिए संघर्ष
गुरुग्राम में दिल्ली से करीब 300 सैनिक 13 मई को हमले के लिए पहुंचे, जिनको अंग्रेजों ने रोकना चाहा, लेकिन असफल रहे। कलेक्टर विलियम फोर्ड गुरुग्राम छोड़ गए, जबकि क्रांतिकारियों को 7.80 लाख हाथ लगे। मेवाती इलाके से अंग्रेजों का राज समाप्त हो गया।
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रोहतक में मई के तीसरे सप्ताह में क्रांति भड़की। लोगों ने दिल्ली के सम्राट बहादुरशाह जफर को अपना नेता मान लिया और संघर्ष जारी रखा। अगस्त के दूसरे सप्ताह में लेफिटनेंट हडसन का दस्ता भेजा गया, लेकिन उन पर भी क्रांतिकारी हावी रहे।
हिसार के हर गांव में मई के तीसरे सप्ताह में क्रांति शुरु हुई। इनका नेतृत्व भट्ठू के सहायक पेट्रोल अधकारी शहजादा मुहम्मद आजिम ने किया। फिरोजपुर के डिप्टी कमिश्नर जनरल वार्न कोर्टलैंड के नेतृत्व में सेना भेजी। संघर्ष में 530 क्रांतिकारी शहीद हुए और कई घायल हुए।
पानीपत और थानेसर में क्रांति जोरों पर हुई। यमुना किनारे बसे गुर्जरों ने कैथल, असंध और जलमाना के जाटों ने कोल, पिपली तथा अमीन के रोड़ों, कुरुक्षत्र के सैनियों, लाडवा के सिखों ने अंग्रेजों को हराकर क्षेत्रों पर कब्जा किया। पटियाला से डेढ़ हजार सैनिक चर तोपें, जींद नरेश ने 400 सैनिक, कुंजपुरा और करनाल के शासकों ने 500 सैनिक भेजे। अंग्रेजों ने बड़ी मुश्किल से इन पर काबू पाया।
यह भी रहा महत्वपूर्ण
28 जून 1857 को अंबाला में बंदी सैनिकों ने संघर्ष किया।
- कांग्रेस स्थापना में सदस्य रहे अंबाला के लाला मुरलीधर ने लोगों को एकजुट किया।
- महात्मा गांधी अंबाला में 8 मार्च 1921 अंबाला आए और आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित किया, इसी तरह वे 17 फरवरी 1921 को रोहतक भी आए।
- महात्मा गांधी जी दिल्ली व पंजाब (मौजूदा हरियाणा समेत) रोलेट एक्ट के तहत पलवल पहुंचे, तो उनको गिरफ्तार किया गया।
- खिलाफत आंदालेन में अंबाला में अब्दुल रशीद, गुलाम भीख नैरंग जैसे वकील और खान अब्दुल्ल गफ्फार खान ने संघर्ष आगे बढ़ाया।
- व्यक्तिगत सत्याग्रह
आजादी के संघर्ष में व्यक्तिगत सत्याग्रह के तहत अंबाला में 120, गुरुग्राम में 32, हिसार में 77, करनाल में 36 तथा रोहतक में 251 गिरफ्तारियां दी गईं। इसके अलावा उक्त जिलों से 43 अन्य तरह की गिरफ्तारियां रहीं।
- आजाद हिंद फौज में यह रहा योगदान
आजाद हिंद फौज में रोहतक से 149 अफर, 724 सैनिक, करनाल से14 अफसर व 105 सैनिक, जींद से 53 अफसर व 296 सैनिक, हिसार से 61 अफसर व 478 सैनिक, गुरुग्राम से 106 अफसर व 580 सैनिक, महेंद्रगढ़ से 14 अफसर व 104 सैनिक तथा अंबाला से एक अफसर व 30 सैनिक शामिल हुए। इन में से 348 शहीद हुए।
विदेशी सामान का बहिष्कार
स्वदेशी को अपनाने के लिए विदेशी सामान का बहिष्कार भी किया गया। इस में 1905 में जहां 25 हजार रुपये का सामान अंबाला में खरीदा गया था, वहीं 1907 में यह महज दस हजार रह गया। इसी तरह करनाल में 16 हजार से आठ हजार, हिसार में दस हजार से चार हजार तथा रोहतक व गुरुग्राम में पूर्ण बहिष्कार रहा।
- 1857 से लेकर आजादी मिलने तक देश के वीरों ने काफी कुर्बानियां दीं। इतिहास पर नजर मारें, तो हरियाणा में तमाम लोगों ने बलिदान दिया, जबकि अंबाला व पानीपत में भी ऐसी कई घटनाएं हुईं, जिसने देश की आजादी के संघर्ष को काफी बढ़ाया।
- डा. अतुल यादव, इतिहासकार, प्रो. राजकीय कालेज अंबाला कैंट।