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अंबाला लोकसभा सीट का अनोखा इतिहास: यहां से जीतने वाली पार्टी ने बनाई केंद्र में सरकार, 26 साल बाद टूटी परंपरा

Sat, 08 Jun 2024 11:19 AM IST
नवीन दलाल माई सिटी रिपोर्टर, अंबाला (हरियाणा)
माई सिटी रिपोर्टर, अंबाला (हरियाणा) Published by: नवीन दलाल Updated Sat, 08 Jun 2024 11:19 AM IST
सार

हरियाणा में आए लोकसभा चुनाव के परिणामों ने अंबाला सीट की 26 साल की परंपरा को तोड़ दिया है। माना जाता है कि जिस पार्टी का उम्मीदवार इस सीट से जीता है, उस पार्टी ने केंद्र में सरकार बनाई है। लेकिन इस बार यहां से चुने सांसद को संसद में विपक्ष में बैठना पड़ेगा।

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Unique history of Ambala Lok Sabha seat, party won from here formed government at center, tradition broken
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

18 वीं लोकसभा आम चुनाव के नतीजों में अंबाला (एससी आरक्षित) लोकसभा सीट से पूरे 15 वर्षों के बाद कांग्रेस पार्टी की जीत हुई है। इससे पूर्व वर्ष 2009 में अंबाला लोस सीट से कांग्रेस की कुमारी सैलजा सांसद बनी थीं। वहीं इस बार कांग्रेस के उम्मीदवार वरुण चौधरी ने जीत हासिल की है। अब 26 साल बाद ऐसा हो रहा है कि अंबाला की जनता ने जिसको चुना है, उसकी सरकार केंद्र में नहीं होगी।

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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट अधिवक्ता और चुनावी विश्लेषक हेमंत कुमार बताते हैं कि 26 सालों बाद एक बार फिर ऐसा होगा कि अंबाला लोकसभा सीट से निर्वाचित सांसद भारतीय संसद में विपक्षी बेंचों पर बैठेंगे। गत पांच लोकसभा आम चुनावों ( वर्ष 1999 से 2019 तक) में अंबाला लोकसभा सीट से निर्वाचित सांसद की ही पार्टी की केंद्र में सरकार बनी थी।
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वर्ष 1999 में जब भाजपा से रतन लाल कटारिया पहली बार अंबाला से लोकसभा सांसद बने तब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की अगुवाई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन- राजग (एनडीए) की सरकार बनी थी। इसी प्रकार वर्ष 2004 और 2009 में लगातार दो बार कांग्रेस से कुमारी सैलजा अंबाला सीट से सांसद बनी, तब केंद्र में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए गठबंधन - प्रथम एवं द्वितीय सत्तासीन रहा।
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सैलजा 10 वर्षों तक केंद्र सरकार में मंत्री भी रहीं थी। उसके बाद वर्ष 2014 और 2019 में जब रतन लाल कटारिया निरंतर दो बार अंबाला से सांसद बने, तो केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई। उन्होंने बताया कि गत 72 वर्षों में केवल पांच बार ऐसा हुआ जब अंबाला लोकसभा सीट से उस राजनीतिक पार्टी का सांसद निर्वाचित हुआ और उसकी पार्टी की केंद्र में सरकार नहीं बन पाई।

ये हैं पांच बार के पूर्व सांसद, जो विपक्ष में बैठे

  • वर्ष 1967 में जब चौथी लोकसभा आम चुनाव हुए, तब अंबाला लोकसभा सीट से भारतीय जन संघ के उम्मीदवार सूरज भान ने कांग्रेस पार्टी की प्रत्याशी पी. वती को करीब नौ हजार वोटों के अंतर से हराकर पहली बार इस सीट से सांसद निर्वाचित हुए थे। तब लोकसभा आम चुनाव के बाद देश में हालांकि इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी थी।
  • वर्ष 1980 में सातवीं लोकसभा आम चुनाव में भी अंबाला संसदीय सीट से जनता पार्टी के उम्मीदवार सूरज भान ने कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी सोमनाथ को करीब दो हजार वोटों के अंतर से हराकर दूसरी बार इस सीट से सांसद निर्वाचित हुए थे। उस समय भी केंद्र में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की सरकार ही बनी थी।
  • वर्ष 1989 में नौवीं लोकसभा आम चुनाव में अंबाला लोकसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार राम प्रकाश ने भाजपा के सूरज भान को करीब 23 हजार वोटों के अंतर से हराकर तीसरी बार इस सीट से सांसद निर्वाचित हुए थे। उस समय केंद्र में वीपी सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा-वाम मोर्चा की सरकार बनी थी जिसे भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया था।
  • चौथी बार वर्ष 1996 लोकसभा आम चुनाव में जब अंबाला सीट से भाजपा के सूरज भान कांग्रेस के शेर सिंह को 87 हजार वोटों से हराकर चौथी बार सांसद निर्वाचित हुए तो केंद्र में अटल बिहार वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में आई, परन्तु यह सरकार केवल 13 दिन ही चल पाई थी। जून, 1996 में पहले एचडी देवगौड़ा और फिर अप्रैल, 1997 में आईके गुजराल के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा की सरकार केंद्र में बनी।
  • पांचवीं बार वर्ष 1998 में हुए बारहवीं लोकसभा आम चुनाव में बसपा के अमन कुमार नागरा ने भाजपा के सूरज भान को मात्र 2864 वोटों से पराजित कर पहली बार अंबाला लोकसभा सीट से सांसद बने थे। उस समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में और भाजपा की अगुवाई में पहली राजग (एनडीए) सरकार बनी थी जो 13 महीने ही चल सकी थी।
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