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प्यार दी साहणु गजक खवा दे... यारा ओ पुराने दिन लौटा दे
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लोहड़ी का पर्व आज हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। इस के अवसर पर शहर के चौक-चौराहों पर दुकानें सजी रही। इन दुकानों पर मूंगफली, रेवड़ी, गजक व फूलियां आदि की खरीदारी करते हुए ग्राहक नजर आए। वहीं बुजुर्गों ने अपने जमाने में लोहड़ी मनाने का तरीका और उत्साह के बारे में बताया।
उनका कहना है कि पुराने जमाने में एक साथ बैठकर लोहड़ी का पर्व मनाया जाता था। आज लोग मोबाइल के माध्यम से संदेश भेजकर औपचारिकता पूरी कर लेते हैं। गौरतलब है कि यह त्योहार प्रकृति में होने वाले परिवर्तन होने पर मनाया जाता है। लोहड़ी पर्व में कहा जाता है कि इस दिन वर्ष की सबसे लंबी रात होती है। उसके अगले दिन से धीरे-धीरे दिन बढ़ने लगता है और रात छोटी होने लगती है। यह किसानों के लिए भी हर्षोल्लास का समय माना जाता है। खेतों में अनाज लहलहाने लगते हैं और मौसम भी ठंडक भरा होता है। लोहड़ी पर्व को सभी किसान भी अपने परिवारों के साथ मिलजुल कर मनाते हैं।
कैसे और कहां मनाया जाता है लोहड़ी पर्व
लोहड़ी पर्व विशेष तौर पर पंजाब राज्य में मनाया जाता है। पंजाब में सभी लोग इस पर्व को धूमधाम से डोल नगाड़ों के साथ मनाते हैं। वह सभी इस पर्व को पुराने मनमुटाव भुलाकर एकजुट होकर मनाते हैं। इस दिन विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। लोहड़ी में गजक, रेवड़ी, मूंगफली आदि का विरतरण भी किया जाता है। लोहड़ी की बधाई देते हुए लकड़ी के ढेर पर अग्नि देकर इसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं। सभी के लिए दुआएं मांगते हैं। नव विवाहित जोड़े अपने साथी के साथ परिक्रमा करते हैं। लोहड़ी की अलाव के चारों तरफ बैठकर रेवड़ी, मूंगफली, गजक आदि का सेवन करते हैं।
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लोहड़ी का आधुनिक रूप
बीत जमाने के साथ-साथ लोहड़ी पर्व में बहुत से बदलाव देखने को मिल रहे हैं। बीत जमाने में पूरा गांव एक ही स्थान पर लोहड़ी का पर्व मनाता था। यदि कोई परिवार उस समय वहां नहीं दिखाई देता तो उसके घर जाकर पूरा गांव उसको लोहड़ी के स्थान पर लेकर आते थे। वहीं आज यह सब बीते पलों की बातें हो चुकी हैं। लोगों का लोहड़ी मनाने का तरीका बदल गया है। लोहड़ी पर्व ने जश्न मनाने का रूप ले लिया है। लोग गले मिलने के बजाय मोबाइल और इंटरनेट के जरिए एक दूसरे को बधाई देते हैं।
सरदार सुखविन्द्र सिंह व कुलदीप कौर, निवासी गुरू अर्जुनपुरा कॉलोनी, अंबाला सिटी।
प्रिंसिपल मनिंद्र कौर ने याद की अपने बचपन की लोहड़ी
माया इंटरनेशनल स्कूल की प्रिंसिपल मनिंद्र कौर ने बताया कि एक समय था जब लोहड़ी से कुछ दिन पहले ही गांव के लड़के-लड़कियां टोलियां बनाकर घर-घर जाकर लोहड़ी मांगते थे। लोग उन्हें लोहड़ी के रूप में गुड़, रेवड़ी, मूंगफली, तिल या फिर पैसे देते थे। ये टोलियां रात को अग्नि जलाने के लिए घरों से लकड़ियां, उपले आदि भी इकट्ठा करतीं थीं। लोहड़ी का महत्व पहले बेटे के जन्म या बेटे की शादी वाले परिवार में ज्यादा होता था। जिस घर में पुत्र जन्म लेता था, लोहड़ी के कुछ दिन पहले ही वे पूरे गांव में गुड़ बांटकर लोहड़ी का न्योता देते थे। लोहड़ी की रात सभी उनके घर पर एकत्रित होकर लकड़ियों, उपले आदि से अग्नि जलाते। सभी को गुड़, मूंगफली, रेवड़ी आदि बांटे जाते हैं, जिन्हें अग्नि में अर्पित कर खाया भी जाता है।
कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ उठती आवाज और समाज में बेटे-बेटी के लिए बढ़ते समानता के भाव ने लोगों को बेटियों की लोहड़ी मनाने के लिए प्रेरित किया है, लेकिन इस जश्न के साथ अत्यधिक खर्चीली पार्टियों का प्रचलन हो गया है। आज आलम यह है कि एक सप्ताह पहले ही लोहड़ी की पार्टी का सिलसिला शुरू हो जाता है। नव विवाहित जोड़ी की लोहड़ी में पवित्र अग्नि में तिल आदि अर्पित कर बुजुर्गों से आशीर्वाद लेती है।
वरिष्ठ नागरिक उषा चावला ने अतीत की स्मृतियों को किया ताजा
बराड़ा की वरिष्ठ नागरिक उषा चावला ने बताया कि उनके समय में नवजात बच्चे और नवविवाहित की प्रथम लोहड़ी के अवसर पर मोहल्ला वासी उनके घर के आंगन में अलाव जलाकर उसके इर्द-गिर्द बैठते। इस दौरान वे भांगड़ा, गिद्दा और लोकगीत गाते हुए सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की मंगल कामना करते थे। लोहड़ी के त्योहार को नई रबी की फसल की कटाई का आगाज, शरद ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु के आगमन के रुप में मनाते। मूंगफली, गुड़, तिल भुग्गा, मक्की के फुल्ले आदि अपने इष्ट देवता, अग्नि और सूर्य देवता को अर्पण कर आपस में मिल बैठकर प्रसाद के रूप में बांट कर खाते थे। देर रात तक चलने वाले इस उत्सव में भावनाओं और आपसी प्रेम की ऊर्जा का अनुभव करते थे। तीन पीढ़ियों के लोग आपस में जुड़ कर अपने विचार, दुख दर्द और भावी जीवन, फसल और पारिवारिक गतिविधियों पर एक दूसरे को परामर्श शुभकामना व सहयोग की चर्चा करते थे। अब युवा व बच्चे रेस्तरां और क्लब में लोहड़ी मनाने को प्राथमिकता देते हैं। इस कारण हम वयोवृद्ध लोग केवल अतीत की स्मृतियों और संस्मरण तक ही सीमित रह कर अपने गुजरे जमाने के चित्रों को अवचेतन मन में उकेरने को विवश होते हैं।
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उनका कहना है कि पुराने जमाने में एक साथ बैठकर लोहड़ी का पर्व मनाया जाता था। आज लोग मोबाइल के माध्यम से संदेश भेजकर औपचारिकता पूरी कर लेते हैं। गौरतलब है कि यह त्योहार प्रकृति में होने वाले परिवर्तन होने पर मनाया जाता है। लोहड़ी पर्व में कहा जाता है कि इस दिन वर्ष की सबसे लंबी रात होती है। उसके अगले दिन से धीरे-धीरे दिन बढ़ने लगता है और रात छोटी होने लगती है। यह किसानों के लिए भी हर्षोल्लास का समय माना जाता है। खेतों में अनाज लहलहाने लगते हैं और मौसम भी ठंडक भरा होता है। लोहड़ी पर्व को सभी किसान भी अपने परिवारों के साथ मिलजुल कर मनाते हैं।
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कैसे और कहां मनाया जाता है लोहड़ी पर्व
लोहड़ी पर्व विशेष तौर पर पंजाब राज्य में मनाया जाता है। पंजाब में सभी लोग इस पर्व को धूमधाम से डोल नगाड़ों के साथ मनाते हैं। वह सभी इस पर्व को पुराने मनमुटाव भुलाकर एकजुट होकर मनाते हैं। इस दिन विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। लोहड़ी में गजक, रेवड़ी, मूंगफली आदि का विरतरण भी किया जाता है। लोहड़ी की बधाई देते हुए लकड़ी के ढेर पर अग्नि देकर इसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं। सभी के लिए दुआएं मांगते हैं। नव विवाहित जोड़े अपने साथी के साथ परिक्रमा करते हैं। लोहड़ी की अलाव के चारों तरफ बैठकर रेवड़ी, मूंगफली, गजक आदि का सेवन करते हैं।
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लोहड़ी का आधुनिक रूप
बीत जमाने के साथ-साथ लोहड़ी पर्व में बहुत से बदलाव देखने को मिल रहे हैं। बीत जमाने में पूरा गांव एक ही स्थान पर लोहड़ी का पर्व मनाता था। यदि कोई परिवार उस समय वहां नहीं दिखाई देता तो उसके घर जाकर पूरा गांव उसको लोहड़ी के स्थान पर लेकर आते थे। वहीं आज यह सब बीते पलों की बातें हो चुकी हैं। लोगों का लोहड़ी मनाने का तरीका बदल गया है। लोहड़ी पर्व ने जश्न मनाने का रूप ले लिया है। लोग गले मिलने के बजाय मोबाइल और इंटरनेट के जरिए एक दूसरे को बधाई देते हैं।
सरदार सुखविन्द्र सिंह व कुलदीप कौर, निवासी गुरू अर्जुनपुरा कॉलोनी, अंबाला सिटी।
प्रिंसिपल मनिंद्र कौर ने याद की अपने बचपन की लोहड़ी
माया इंटरनेशनल स्कूल की प्रिंसिपल मनिंद्र कौर ने बताया कि एक समय था जब लोहड़ी से कुछ दिन पहले ही गांव के लड़के-लड़कियां टोलियां बनाकर घर-घर जाकर लोहड़ी मांगते थे। लोग उन्हें लोहड़ी के रूप में गुड़, रेवड़ी, मूंगफली, तिल या फिर पैसे देते थे। ये टोलियां रात को अग्नि जलाने के लिए घरों से लकड़ियां, उपले आदि भी इकट्ठा करतीं थीं। लोहड़ी का महत्व पहले बेटे के जन्म या बेटे की शादी वाले परिवार में ज्यादा होता था। जिस घर में पुत्र जन्म लेता था, लोहड़ी के कुछ दिन पहले ही वे पूरे गांव में गुड़ बांटकर लोहड़ी का न्योता देते थे। लोहड़ी की रात सभी उनके घर पर एकत्रित होकर लकड़ियों, उपले आदि से अग्नि जलाते। सभी को गुड़, मूंगफली, रेवड़ी आदि बांटे जाते हैं, जिन्हें अग्नि में अर्पित कर खाया भी जाता है।
कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ उठती आवाज और समाज में बेटे-बेटी के लिए बढ़ते समानता के भाव ने लोगों को बेटियों की लोहड़ी मनाने के लिए प्रेरित किया है, लेकिन इस जश्न के साथ अत्यधिक खर्चीली पार्टियों का प्रचलन हो गया है। आज आलम यह है कि एक सप्ताह पहले ही लोहड़ी की पार्टी का सिलसिला शुरू हो जाता है। नव विवाहित जोड़ी की लोहड़ी में पवित्र अग्नि में तिल आदि अर्पित कर बुजुर्गों से आशीर्वाद लेती है।
वरिष्ठ नागरिक उषा चावला ने अतीत की स्मृतियों को किया ताजा
बराड़ा की वरिष्ठ नागरिक उषा चावला ने बताया कि उनके समय में नवजात बच्चे और नवविवाहित की प्रथम लोहड़ी के अवसर पर मोहल्ला वासी उनके घर के आंगन में अलाव जलाकर उसके इर्द-गिर्द बैठते। इस दौरान वे भांगड़ा, गिद्दा और लोकगीत गाते हुए सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की मंगल कामना करते थे। लोहड़ी के त्योहार को नई रबी की फसल की कटाई का आगाज, शरद ऋतु की समाप्ति और ग्रीष्म ऋतु के आगमन के रुप में मनाते। मूंगफली, गुड़, तिल भुग्गा, मक्की के फुल्ले आदि अपने इष्ट देवता, अग्नि और सूर्य देवता को अर्पण कर आपस में मिल बैठकर प्रसाद के रूप में बांट कर खाते थे। देर रात तक चलने वाले इस उत्सव में भावनाओं और आपसी प्रेम की ऊर्जा का अनुभव करते थे। तीन पीढ़ियों के लोग आपस में जुड़ कर अपने विचार, दुख दर्द और भावी जीवन, फसल और पारिवारिक गतिविधियों पर एक दूसरे को परामर्श शुभकामना व सहयोग की चर्चा करते थे। अब युवा व बच्चे रेस्तरां और क्लब में लोहड़ी मनाने को प्राथमिकता देते हैं। इस कारण हम वयोवृद्ध लोग केवल अतीत की स्मृतियों और संस्मरण तक ही सीमित रह कर अपने गुजरे जमाने के चित्रों को अवचेतन मन में उकेरने को विवश होते हैं।