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जब अमेरिका में बजा हिंदुस्तानी ढोल का ढंका
अंबाला
Updated Sun, 17 Nov 2013 04:23 PM IST
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अमेरिका में भी हिंदुस्तान के गढ़वाली ढोल की पूरी धूम है। आज भी वहां इस गढ़वाली ढोल के वादन का इस्तेमाल विभिन्न अमेरिकी आयोजनाें में किया जाता है और लोग इस गढ़वाली ढोल की थाप पर खूब झूमते हैं।
गढ़वाल के दो ढोल वादक अमेरिका की सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी में बाकायदा प्रोफेसर बनकर अमेरिकियों को को ढोल बजाना भी सिखा चुके हैं। दरअसल इस बात का खुलासा हुआ है देश की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘संगीत’ में छपे अंबाला निवासी और सुविख्यात साहित्यकार स्वामी वाहिद काजमी के शोध लेख में है।
‘अमेरिका में ढोल’ शीर्षक से छपे इस लंबे चौड़े लेख में इस घटना का रोचक विवरण प्रस्तुत किया गया है। लेख में बताया गया कि अमेरिका में आज भी गढ़वाली ढोल के वादन को बहुत ज्यादा पसंद किया जाता है।
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अमेरिका को प्रो. फियोल की देन है ढोल
साहित्यकार स्वामी वाहिद काजमी ने बताया कि सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी के म्यूजिक विभाग के प्रोफेसर स्टीफन फियोल कुछ समय पहले हिंदुस्तान के लोक वाद्यों पर शोध करने के लिए यहां आए थे। उन्होंने हिंदुस्तान में कुछ समय बिता कर विभिन्न प्रांत के लोक वाद्यों पर गहनता से शोध किया।
वह उत्तराखंड के गढ़वाल इलाके में गए और वहां उन्होंने दो ढोल वादकों सोहनलाल और सुरकादास को गढ़वाली ढोल पर शानदार प्रस्तुति देते हुए सुना। वाहिद काजमी के अनुसार उन्हें गढ़वाली ढोल की धुन और बजाने का स्टाइल इतना भाया कि वह दोनों वादकों के कायल हो गए।
अमेरिकियों को सिखाया ढोल बजाना
अमेरिका वापस पहुंचने के बाद वहां की यूनिवर्सिटी की अनुमति के बाद प्रोफेसर फियोल ने दोनों ढोल वादकों सोहनलाल और सुरकादास को गढ़वाली ढोल समेत अमेरिका में बतौर विजिटिंग प्रोफेसर बुलवाने की व्यवस्था करवाई। वहां यूनिवर्सिटी में रहकर दोनों ढोल वादकों ने न केवल इस शानदार ढोल की प्रस्तुति दी, बल्कि अमेरिकी छात्राें को ढोल बजाना और उसकी धुुनों के बारे में भी ज्ञान दिया। आज भी अमेरिका में इस गढ़वाली ढोल की धुनों पर लोग थिरकते और झूमते हैं।
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गढ़वाल के दो ढोल वादक अमेरिका की सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी में बाकायदा प्रोफेसर बनकर अमेरिकियों को को ढोल बजाना भी सिखा चुके हैं। दरअसल इस बात का खुलासा हुआ है देश की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘संगीत’ में छपे अंबाला निवासी और सुविख्यात साहित्यकार स्वामी वाहिद काजमी के शोध लेख में है।
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‘अमेरिका में ढोल’ शीर्षक से छपे इस लंबे चौड़े लेख में इस घटना का रोचक विवरण प्रस्तुत किया गया है। लेख में बताया गया कि अमेरिका में आज भी गढ़वाली ढोल के वादन को बहुत ज्यादा पसंद किया जाता है।
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अमेरिका को प्रो. फियोल की देन है ढोल
साहित्यकार स्वामी वाहिद काजमी ने बताया कि सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी के म्यूजिक विभाग के प्रोफेसर स्टीफन फियोल कुछ समय पहले हिंदुस्तान के लोक वाद्यों पर शोध करने के लिए यहां आए थे। उन्होंने हिंदुस्तान में कुछ समय बिता कर विभिन्न प्रांत के लोक वाद्यों पर गहनता से शोध किया।
वह उत्तराखंड के गढ़वाल इलाके में गए और वहां उन्होंने दो ढोल वादकों सोहनलाल और सुरकादास को गढ़वाली ढोल पर शानदार प्रस्तुति देते हुए सुना। वाहिद काजमी के अनुसार उन्हें गढ़वाली ढोल की धुन और बजाने का स्टाइल इतना भाया कि वह दोनों वादकों के कायल हो गए।
अमेरिकियों को सिखाया ढोल बजाना
अमेरिका वापस पहुंचने के बाद वहां की यूनिवर्सिटी की अनुमति के बाद प्रोफेसर फियोल ने दोनों ढोल वादकों सोहनलाल और सुरकादास को गढ़वाली ढोल समेत अमेरिका में बतौर विजिटिंग प्रोफेसर बुलवाने की व्यवस्था करवाई। वहां यूनिवर्सिटी में रहकर दोनों ढोल वादकों ने न केवल इस शानदार ढोल की प्रस्तुति दी, बल्कि अमेरिकी छात्राें को ढोल बजाना और उसकी धुुनों के बारे में भी ज्ञान दिया। आज भी अमेरिका में इस गढ़वाली ढोल की धुनों पर लोग थिरकते और झूमते हैं।