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सांसारिक मोह-लोभ त्याग कर ही परमात्मा की प्राप्ति होती है
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अंबाला सिटी। कलियुग में परमात्मा की भक्ति करना भक्तों के लिए बहुत सरल है, लेकिन भक्तों को सांसारिक मोह का त्याग करके ही परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग प्राप्त होता है। सांसारिक मोह के कारण भक्त परमात्मा के करीब होकर भी बहुत दूर हो जाते हैं। जब वही सांसारिक वस्तुएं मनुष्य को छोड़ने लगती हैं तब मनुष्य को परमात्मा की शक्ति का अनुभव होता है। परमात्मा ने मनुष्य को बहुमूल्य जीवन दिया है, मगर अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण पड़ाव सांसारिक मोह के लालच में व्यर्थ कर देता है, जिस कारण मनुष्य की परमात्मा से दूरी बनी रहती है। यह सद्विचार कथा व्यास सनातन आचार्य चैतन्य महाराज ने सिटी के लक्ष्मी नगर स्थित श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर धर्मशाला में चल रहे श्रीमद्भागवत सप्ताह अमर कथा के दौरान कहे।
चैतन्य महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की सुंदर बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए कहा कि कलियुग में भक्ति का मार्ग बहुत सरल है, परंतु उसके लिए अपने मन पर संयम कायम रखना अति आवश्यक है। मनुष्य निस्वार्थ भक्ति कर भगवान के चरणों में अपने आप को संपूर्णता से समर्पित करे तो भगवान के समर्पण का एहसास हो जाता है। आज सभी भक्तों को भलीभांति मालूम है कि सृष्टि को चलाने वाला ही परमात्मा है इसलिए ग्रंथों में भी बताया गया है कि सांसारिक मोह लोभ का त्यागकर अपने मन को प्रभु चरणों में लगाना चाहिए। जीवन में आने वाले सभी प्रकार के संकट परमात्मा को सौंप देना चाहिए, उन संकट व कष्टों का निर्वाण भगवान स्वयं ही कर देते हैं।
हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप राक्षस की कथा का वर्णन करते हुए कथा व्यास चैतन्य महाराज ने कहा कि मनुष्य के अंदर लोभ और अभिमान जैसे राक्षस विराजमान है। इस कारण मनुष्य अपनी आत्मा का मिलन परमात्मा से करवाने में सक्षम नहीं है।
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दक्ष प्रजापति को भी मैं का अभिमान हो गया था इसलिए भगवान शंकर ने उसके सिर को काटकर बकरे का सिर लगाया था, क्योंकि बकरे का स्वभाव ही मैं-मैं करना है। कथा के दौरान महाराज चैतन्य द्वारा प्रस्तुत किए गए भजनों से पूरा पंडाल भक्तिमय हो गया। जिस पर पर सभी भक्तजन मंत्रमुग्ध होकर झूमते हुए दिखाई दिए। इस अवसर पर श्री राधे श्याम परिवार सेवा समिति के सदस्य शिव शंकर चौरसिया ने बताया कि कथा व्यास पीठ व सनातन आचार्य चैतन्य महाराज को पुष्प मालाएं अर्पण की गई। कथा के समापन पर सभी भक्तों भगवान श्रीकृष्ण की आरती की व प्रसाद ग्रहण किया।
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चैतन्य महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की सुंदर बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए कहा कि कलियुग में भक्ति का मार्ग बहुत सरल है, परंतु उसके लिए अपने मन पर संयम कायम रखना अति आवश्यक है। मनुष्य निस्वार्थ भक्ति कर भगवान के चरणों में अपने आप को संपूर्णता से समर्पित करे तो भगवान के समर्पण का एहसास हो जाता है। आज सभी भक्तों को भलीभांति मालूम है कि सृष्टि को चलाने वाला ही परमात्मा है इसलिए ग्रंथों में भी बताया गया है कि सांसारिक मोह लोभ का त्यागकर अपने मन को प्रभु चरणों में लगाना चाहिए। जीवन में आने वाले सभी प्रकार के संकट परमात्मा को सौंप देना चाहिए, उन संकट व कष्टों का निर्वाण भगवान स्वयं ही कर देते हैं।
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हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप राक्षस की कथा का वर्णन करते हुए कथा व्यास चैतन्य महाराज ने कहा कि मनुष्य के अंदर लोभ और अभिमान जैसे राक्षस विराजमान है। इस कारण मनुष्य अपनी आत्मा का मिलन परमात्मा से करवाने में सक्षम नहीं है।
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दक्ष प्रजापति को भी मैं का अभिमान हो गया था इसलिए भगवान शंकर ने उसके सिर को काटकर बकरे का सिर लगाया था, क्योंकि बकरे का स्वभाव ही मैं-मैं करना है। कथा के दौरान महाराज चैतन्य द्वारा प्रस्तुत किए गए भजनों से पूरा पंडाल भक्तिमय हो गया। जिस पर पर सभी भक्तजन मंत्रमुग्ध होकर झूमते हुए दिखाई दिए। इस अवसर पर श्री राधे श्याम परिवार सेवा समिति के सदस्य शिव शंकर चौरसिया ने बताया कि कथा व्यास पीठ व सनातन आचार्य चैतन्य महाराज को पुष्प मालाएं अर्पण की गई। कथा के समापन पर सभी भक्तों भगवान श्रीकृष्ण की आरती की व प्रसाद ग्रहण किया।