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किसानों-जवानों ने मनवाया लोहा, अब रीति-रिवाज व संस्कृति से छोड़ेंगे छाप
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हरियाणा के किसानों और जवानों ने देश-विदेश में अपना लोहा मनवाया है। यही नहीं भारतीय सिनेमा जगत में भी अपनी पहचान बनाई है, लेकिन आधुनिकता की दौड़ में हमारे लोक-संस्कृति और रिवाज पिछड़ गए। यह मानना है युवा एवं सांस्कृतिक विभाग के निदेशक डा. महा सिंह पूनिया का। उन्होंने कहा कि अब हमारा प्रयास है कि हरियाणा में कल्चर के नाम पर एग्रीकल्चर कहने वालों को जवाब दिया जाए और यहां के सदियों पुराने रीति रिवाजों और लोक संस्कृति की शानदार झलक दिखाई जाए।
उन्होंने कहा कि एक प्रयोग के बाद देश-दुनिया के मंचों पर हरियाणावी आर्केस्ट्रा पहले ही धमाल मचा चुका है और अब बारी रीति रिवाज की है। टैलेंट शो से लेकर जोनल यूथ फेस्टिवल, इंटर जोनल और नेशनल के बाद सार्क फेस्टिवल में भी इसका जलवा दिखे, इस पर पूरा फोकस हरियाणा की एक प्लस ग्रेड कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के युवा एवं सांस्कृतिक विभाग का है।
उन्होंने कहा कि यह खुशी की बात है कि अंबाला के एमडीएसडी कालेज में 23 से 25 तक चलने वाले केयू के जोनल यूथ फेस्टिवल में सबसे ज्यादा 10 टीमें रीति रिवाज में सामने आईं हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि जो युवा पीढ़ी अपने रीति रिवाजों को भूल चुकी है, वह इस तरह के आयोजन में प्रतियोगिता के रूप में फिर से न केवल जुड़ेगी, बल्कि इनका महत्व भी समझ सकेगी।
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हरियाणवी आर्केस्ट्रा में डीसी ने ली रुचि
अंबाला के डीसी विक्रम सिंह ने प्रदेश की लोक संस्कृति में काफी रुचि लेते हुए हरियाणवी आर्केस्ट्रा में कितने वाद्य यंत्र हैं, इनकी पूरी जानकारी डा. महा सिंह पूनिया से हासिल की है। इसमें हरियाणा के प्राचीन लोक वाद्य यंत्रों में ढोल, सारंगी, बैंजू, खड़ताल, अलगोजा, बीन, बांसुली, माचिस, नगाड़ा, नगाड़ी, कलारनेट, झांज, तुरही, शंख, घुंगरु, थाली, बेले, शीशी, घड़वा, दुतारा और इकतारा शामिल हैं, जिनके बारे में नई पीढ़ी को न के बराबर जानकारी है।
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उन्होंने कहा कि एक प्रयोग के बाद देश-दुनिया के मंचों पर हरियाणावी आर्केस्ट्रा पहले ही धमाल मचा चुका है और अब बारी रीति रिवाज की है। टैलेंट शो से लेकर जोनल यूथ फेस्टिवल, इंटर जोनल और नेशनल के बाद सार्क फेस्टिवल में भी इसका जलवा दिखे, इस पर पूरा फोकस हरियाणा की एक प्लस ग्रेड कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के युवा एवं सांस्कृतिक विभाग का है।
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उन्होंने कहा कि यह खुशी की बात है कि अंबाला के एमडीएसडी कालेज में 23 से 25 तक चलने वाले केयू के जोनल यूथ फेस्टिवल में सबसे ज्यादा 10 टीमें रीति रिवाज में सामने आईं हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि जो युवा पीढ़ी अपने रीति रिवाजों को भूल चुकी है, वह इस तरह के आयोजन में प्रतियोगिता के रूप में फिर से न केवल जुड़ेगी, बल्कि इनका महत्व भी समझ सकेगी।
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हरियाणवी आर्केस्ट्रा में डीसी ने ली रुचि
अंबाला के डीसी विक्रम सिंह ने प्रदेश की लोक संस्कृति में काफी रुचि लेते हुए हरियाणवी आर्केस्ट्रा में कितने वाद्य यंत्र हैं, इनकी पूरी जानकारी डा. महा सिंह पूनिया से हासिल की है। इसमें हरियाणा के प्राचीन लोक वाद्य यंत्रों में ढोल, सारंगी, बैंजू, खड़ताल, अलगोजा, बीन, बांसुली, माचिस, नगाड़ा, नगाड़ी, कलारनेट, झांज, तुरही, शंख, घुंगरु, थाली, बेले, शीशी, घड़वा, दुतारा और इकतारा शामिल हैं, जिनके बारे में नई पीढ़ी को न के बराबर जानकारी है।