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Ambala News: कलावड़ गांव में मनेगी दिवाली, सौ साल पुरानी परंपरा को निभाएंगे सभी धर्माें के लोग
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मुलाना। कलावड़ गांव में छड़ियों की परंपरा को सौ सालों से ज्यादा का समय हो गया है और यह परंपरा आज भी जारी है। इसके साथ ही प्राचीन समय से चली आ रही रोशनी की परंपरा आज कलावड़ की दिवाली के नाम से जानी जाती है। गोगा माड़ी पर लगने वाले मेले में लोग अगाध श्रद्धा प्रेम से छड़ियां चढ़ाते हैं।
इस दिन पूरा गांव जात-पात का भेदभाव भूलकर एक सूत्र में बंध जाता है। कलावड़ की दिवाली के नाम से पुकारे जाने वाला यह मेला आसपास के क्षेत्रों में काफी विख्यात है। दूरदराज के क्षेत्रों से लोग इस मेले में मन्नतें मांगने के लिए आते हैं। यह मेला दो दिनों के लिए आयोजित होता है। इस वर्ष मेले का आयोजन 10 व 11 सितंबर को होगा। गोगा माड़ी के सेवक विकास ने बताया कि कलावड़ में दो गोगा माड़ी हैं। यहां उत्तर प्रदेश, पंजाब व हिमाचल प्रदेश से भी श्रद्धालु मत्था टेकने आते हैं।
निशान की पूरे गांव में होती है परिक्रमा
दोनों गोगा माड़ी पर गोगा महाराज के प्रतीक निशान को पूरे गांव की परिक्रमा के बाद गोगा माड़ी प्रांगण में स्थापित कर दिया जाता है। मेले के दौरान गोगा महाराज की पावन हजूरी पर श्रद्धालुओं द्वारा मत्था टेक शीश नवाया जाता है। निशान साहिब की शोभायात्रा निकालने के बाद रात को मशाल निकाली जाती है। जिसके पीछे ग्रामीण गोगा महाराज के जयकारे लगाते हुए चलते हैं। जिसे रोशनी कहा जाता है। रोशनी व निशान साहिब ढोल नगाड़ों के साथ गांव की मुख्य गलियारों से होते हुए गोगा माड़ी पर पहुंचते हैं। मेले में गीत, कबड्डी व दंगल का आयोजन होता है। इस साल आठ व नौ सितंबर को निशान साहिब की शोभायात्रा होगी। नौ सितंबर की रात को रोशनी, 10 सितंबर को गोगा माड़ी पर श्रद्धालुओं द्वारा छड़ियां चढ़ाई जाएंगी।
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यह है मेले की खासियत
दोनों गोगा माड़ी पर करीब 60-60 फुट के निशानों को स्थापित किया जाता है। सबसे खास बात यह भी है कि इस निशान को एक व्यक्ति द्वारा एक ही समय में उठाया जाता है। गांव के लोगों के अनुसार आसपास के क्षेत्रों में केवल कलावड़ में ही यह नजारा देखने को मिलता है। निशान ढोल नगाड़ों के साथ गोगा माड़ी प्रांगण में स्थापित किए जाते हैं।
इसलिए है दिवाली
गांव में मेले की पहली रात गोगा माड़ी पर सभी ग्रामीण हाथ में दीपक लेकर एक मशाल के पीछे-पीछे चलते हैं। यह सभी श्रद्धालु नंगे पैर गोगा पीर के जयकारे लगाते हुए चलते हैं, जिसे रोशनी कहा जाता है। इस कारण से गोगा माड़ी पर हर वर्ष लगने वाले इस मेले को गांव कलावड़ की दिवाली का नाम भी दिया जाता है।
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इस दिन पूरा गांव जात-पात का भेदभाव भूलकर एक सूत्र में बंध जाता है। कलावड़ की दिवाली के नाम से पुकारे जाने वाला यह मेला आसपास के क्षेत्रों में काफी विख्यात है। दूरदराज के क्षेत्रों से लोग इस मेले में मन्नतें मांगने के लिए आते हैं। यह मेला दो दिनों के लिए आयोजित होता है। इस वर्ष मेले का आयोजन 10 व 11 सितंबर को होगा। गोगा माड़ी के सेवक विकास ने बताया कि कलावड़ में दो गोगा माड़ी हैं। यहां उत्तर प्रदेश, पंजाब व हिमाचल प्रदेश से भी श्रद्धालु मत्था टेकने आते हैं।
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निशान की पूरे गांव में होती है परिक्रमा
दोनों गोगा माड़ी पर गोगा महाराज के प्रतीक निशान को पूरे गांव की परिक्रमा के बाद गोगा माड़ी प्रांगण में स्थापित कर दिया जाता है। मेले के दौरान गोगा महाराज की पावन हजूरी पर श्रद्धालुओं द्वारा मत्था टेक शीश नवाया जाता है। निशान साहिब की शोभायात्रा निकालने के बाद रात को मशाल निकाली जाती है। जिसके पीछे ग्रामीण गोगा महाराज के जयकारे लगाते हुए चलते हैं। जिसे रोशनी कहा जाता है। रोशनी व निशान साहिब ढोल नगाड़ों के साथ गांव की मुख्य गलियारों से होते हुए गोगा माड़ी पर पहुंचते हैं। मेले में गीत, कबड्डी व दंगल का आयोजन होता है। इस साल आठ व नौ सितंबर को निशान साहिब की शोभायात्रा होगी। नौ सितंबर की रात को रोशनी, 10 सितंबर को गोगा माड़ी पर श्रद्धालुओं द्वारा छड़ियां चढ़ाई जाएंगी।
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यह है मेले की खासियत
दोनों गोगा माड़ी पर करीब 60-60 फुट के निशानों को स्थापित किया जाता है। सबसे खास बात यह भी है कि इस निशान को एक व्यक्ति द्वारा एक ही समय में उठाया जाता है। गांव के लोगों के अनुसार आसपास के क्षेत्रों में केवल कलावड़ में ही यह नजारा देखने को मिलता है। निशान ढोल नगाड़ों के साथ गोगा माड़ी प्रांगण में स्थापित किए जाते हैं।
इसलिए है दिवाली
गांव में मेले की पहली रात गोगा माड़ी पर सभी ग्रामीण हाथ में दीपक लेकर एक मशाल के पीछे-पीछे चलते हैं। यह सभी श्रद्धालु नंगे पैर गोगा पीर के जयकारे लगाते हुए चलते हैं, जिसे रोशनी कहा जाता है। इस कारण से गोगा माड़ी पर हर वर्ष लगने वाले इस मेले को गांव कलावड़ की दिवाली का नाम भी दिया जाता है।