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Ambala News: हरियाणा वक्फ बोर्ड की तरक्की में विवाद आ रहा आड़े
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अंबाला। करोड़ों रुपये की संपत्ति हाेने के बावजूद हरियाणा वक्फ बोर्ड की आय बढ़ने के बजाय साल दर साल घट रही है। कोराेना के बाद से इसमें गिरावट नजर आ रही है।
यही कारण है कि एक समय ऐसा भी आया कि वक्फ के पास अपने कर्मचारियों और अधिकारियों को वेतन देने के लिए फंड तक नहीं था। बोर्ड की आमदनी पर गौर करें तो वर्ष 2013-14 में 28 करोड़ रुपये होती है। इसके बाद वर्ष 2014-15 में 9.7 करोड़ रुपये, वर्ष 2015-16 में 13.7 करोड़ रुपये की सालाना की आय होती थी। इसके बाद कोरोना के दौरान यह आय घट गई थी। अब वक्फ की स्थिति कुछ ठीक है।
मौजूदा समय में वक्फ बोर्ड हरियाणा को 22 करोड़ रुपये की सालाना आय होती है। हालांकि 12 वर्ष पिछले कार्यकाल की तुलना करें तो अभी तक बोर्ड राजस्व में छह करोड़ रुपये पीछे है। वक्फ की सीमित आय उनकी राह में कई अड़चन उत्पन्न कर रही है। वक्फ बोर्ड के प्रशासक जाकिर हुसैन ने बताया कि वक्फ प्रत्येक वर्ष नियमानुसार पांच प्रतिशत किराया बढ़ाया है। पूर्व के वर्षों की तुलना में स्थिति बेहतर हुई है। इसे और ठीक किया जाएगा।
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संशोधनों के कारण सामने आए विवाद
यूपीए सरकार के आखिरी कार्यकाल में वक्फ कानून में संशोधन किया। इसके बाद से ही वक्फ में विवादों की संख्या बढ़ने लगी। सरकार ने बोली सिस्टम को लागू कर दिया। इसके बाद वर्षों से वक्फ की जमीन पर काबिज किरायेदार बोली सिस्टम पर आपत्ति जताने लगे। कई लोगों ने वक्फ को किराये देने बंद कर दिए। वक्फ नोटिस देता रहा फिर आखिर में कोर्ट में मामलों को ले गया। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हरियाणा वक्फ बोर्ड मौजूदा समय में करीब 1200 डिफॉल्टर मामलों में कोर्ट में केस लड़ रहा है।
हर साल इंजीनियरिंग कॉलेज पर खर्च हो रहे ढाई करोड़
वक्फ बोर्ड हरियाणा मेवात में एक इंजीनियरिंग काॅलेज भी संचालित करता है। जिसमें युवाओं को सस्ती दरों पर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराई जाती है। इस कॉलेज को संचालित करने के लिए हर साल बोर्ड ढाई करोड़ रुपये खर्च करता है। इसके अलावा प्रदेशभर में कर्मचारियों और अधिकारियों का वेतन, वकीलों की फीस, सभी मस्जिदों और अन्य इमारतों के बिजली के बिल पर एक बड़ी धनराशि खर्च होती है। इसके बाद इमामों व अन्य को सम्मान राशि भी दी जाती है। वहीं अंबाला और पानीपत में दो स्कूल भी संचालित किए जाते हैं। बोर्ड की आय का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं खर्चों में चला जाता है।
आजादी के कई साल बाद वक्फ बोर्ड बना
वक्फ में वर्षों कार्य कर सेवानिवृत्त हुए अधिकारी बताते हैं कि वक्फ का मूल काम दान में आई जमीनों को सहेजना है। उन पर धार्मिक कार्य को करना है। वर्ष 1947 के बाद से जो लोग पाकिस्तान गए उनकी भारत में जो जमीनें थी उसमें से कई जमीनें कस्टोडियन विभाग के पास थीं। आजादी के कई वर्ष बाद वक्फ बोर्ड का गठन हुआ और उन्हें यह संपत्तियां दी गईं। तब तक कई जमीनों पर कस्टोडियन विभाग ने ही लीज पर लोगों को जमीन दी हुईं थी। उनके किराये भी तय किए हुए थे।
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यही कारण है कि एक समय ऐसा भी आया कि वक्फ के पास अपने कर्मचारियों और अधिकारियों को वेतन देने के लिए फंड तक नहीं था। बोर्ड की आमदनी पर गौर करें तो वर्ष 2013-14 में 28 करोड़ रुपये होती है। इसके बाद वर्ष 2014-15 में 9.7 करोड़ रुपये, वर्ष 2015-16 में 13.7 करोड़ रुपये की सालाना की आय होती थी। इसके बाद कोरोना के दौरान यह आय घट गई थी। अब वक्फ की स्थिति कुछ ठीक है।
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मौजूदा समय में वक्फ बोर्ड हरियाणा को 22 करोड़ रुपये की सालाना आय होती है। हालांकि 12 वर्ष पिछले कार्यकाल की तुलना करें तो अभी तक बोर्ड राजस्व में छह करोड़ रुपये पीछे है। वक्फ की सीमित आय उनकी राह में कई अड़चन उत्पन्न कर रही है। वक्फ बोर्ड के प्रशासक जाकिर हुसैन ने बताया कि वक्फ प्रत्येक वर्ष नियमानुसार पांच प्रतिशत किराया बढ़ाया है। पूर्व के वर्षों की तुलना में स्थिति बेहतर हुई है। इसे और ठीक किया जाएगा।
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संशोधनों के कारण सामने आए विवाद
यूपीए सरकार के आखिरी कार्यकाल में वक्फ कानून में संशोधन किया। इसके बाद से ही वक्फ में विवादों की संख्या बढ़ने लगी। सरकार ने बोली सिस्टम को लागू कर दिया। इसके बाद वर्षों से वक्फ की जमीन पर काबिज किरायेदार बोली सिस्टम पर आपत्ति जताने लगे। कई लोगों ने वक्फ को किराये देने बंद कर दिए। वक्फ नोटिस देता रहा फिर आखिर में कोर्ट में मामलों को ले गया। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हरियाणा वक्फ बोर्ड मौजूदा समय में करीब 1200 डिफॉल्टर मामलों में कोर्ट में केस लड़ रहा है।
हर साल इंजीनियरिंग कॉलेज पर खर्च हो रहे ढाई करोड़
वक्फ बोर्ड हरियाणा मेवात में एक इंजीनियरिंग काॅलेज भी संचालित करता है। जिसमें युवाओं को सस्ती दरों पर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराई जाती है। इस कॉलेज को संचालित करने के लिए हर साल बोर्ड ढाई करोड़ रुपये खर्च करता है। इसके अलावा प्रदेशभर में कर्मचारियों और अधिकारियों का वेतन, वकीलों की फीस, सभी मस्जिदों और अन्य इमारतों के बिजली के बिल पर एक बड़ी धनराशि खर्च होती है। इसके बाद इमामों व अन्य को सम्मान राशि भी दी जाती है। वहीं अंबाला और पानीपत में दो स्कूल भी संचालित किए जाते हैं। बोर्ड की आय का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं खर्चों में चला जाता है।
आजादी के कई साल बाद वक्फ बोर्ड बना
वक्फ में वर्षों कार्य कर सेवानिवृत्त हुए अधिकारी बताते हैं कि वक्फ का मूल काम दान में आई जमीनों को सहेजना है। उन पर धार्मिक कार्य को करना है। वर्ष 1947 के बाद से जो लोग पाकिस्तान गए उनकी भारत में जो जमीनें थी उसमें से कई जमीनें कस्टोडियन विभाग के पास थीं। आजादी के कई वर्ष बाद वक्फ बोर्ड का गठन हुआ और उन्हें यह संपत्तियां दी गईं। तब तक कई जमीनों पर कस्टोडियन विभाग ने ही लीज पर लोगों को जमीन दी हुईं थी। उनके किराये भी तय किए हुए थे।