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डाक टिकट का अजब-गजब इतिहास
ब्यूरो/अंबाला/अमर उजाला
Updated Sat, 04 Feb 2017 12:24 AM IST
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dak ticket
- फोटो : अमर उजाला
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सन 1840 से पहले खतों को आदान-प्रदान जारी था। इंग्लैंड ने बाकायदा इसके लिए एक पोस्टल विभाग की भी व्यवस्था कर रखी थी। उस वक्त इंग्लैंड में प्रथा यह थी कि जो भी व्यक्ति किसी का खत रिसीव करेगा, उसे ही डाक खर्च देना होगा। यानी जो व्यक्ति खत भेज रहा है उसे कोई डाक खर्च नहीं देना पड़ता था, बल्कि डाक खर्च उससे लिया जाता था, जिसे संबंधित डाक रिसीव हो रही है।
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टिकट का इस रोचक इतिहास का शुक्रवार को अंबाला के एसडी कॉलेज में लगाई गई डाक टिकट प्रदर्शनी में प्रदर्शित हुआ। सीनियर डाक टिकट संग्रहकर्ता अबनाश सिंह लूथरा ने बताया कि इंग्लैंड के लोगों को फ्री में डाक भेजने की ये व्यवस्था बहुत अच्छी लगी, जिससे उनकी भावनाएं भी बेकाबू होने लगीं। वे अपने परिचितों, संबंधियों, दोस्तों को ढेरों खत लिखते और उसे पोस्ट कर देते। लेकिन अब होने ये लगा कि डाक रिसीव करने वाला व्यक्ति डाकिये से डाक लेकर उसे पढ़ लेता था और रिसीव करने की बजाय वापस कर देता था, इससे वे डाक खर्च से बच जाता था। क्योंकि उस वक्त डाक ओपन हुआ करती थी, एनवेलप सिस्टम डेवलप नहीं हुआ था।
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इससे इंग्लैंड सरकार को खासा नुकसान होने लगा, क्योंकि पोस्ट की गई डाक को गंतव्य तक पहुंचाने में पूरा सिस्टम काम करता था। सरकार को जब इस नुकसान की चिंता होने लगी, तो उन्होंने इंग्लैंड के ही एक विख्यात अंग्रेजी स्कूल टीचर सर रॉलैंड हिल की ड्यूटी लगाई कि वे इस नुकसान से बचने का रास्ता सुझाए। उसके बाद सर रॉलैंड हिल ने एक पोस्टल रिफार्मर के तौर पर काम करते हुए डाक टिकट जारी करने का फैसला लिया।
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इसी दौरान 1 मई 1840 को इंग्लैंड में पैनी ब्लैक के नाम से पहला डाक टिकट जारी किया गया। जिसमें क्विन विक्टोरिया का फोटो अंकित किया गया। तभी ये भी फैसला लिया गया कि अब डाक रिसीव करने वाला डाक खर्च नहीं देगा, बल्कि डाक भेजने वाला संबंधित टिकट खरीदेगा और उसे डाक पर चस्पा करेगा, उसके बाद ही उसकी डाक को गंतव्य तक डिलीवर किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
इस पहल से अनावश्यक खत लिखने वालों की भावनाओं पर भी लगाम लगी और नुकसान की भी भरपाई होने लगी। बाद में जरूरतों के हिसाब से इस टिकट का रंग भी बदला गया और इस पर लगनी वाली मुहर का रंग भी बदला गया। इस तरह पहली डाक टिकट की शुरुआत दुनिया में हुई।
‘सिंध डाक’ का पहला एशिया टिकट
भारत पर इंग्लैंड का कब्जा था और ब्रिटेन में डाक टिकट का प्रचलन शुरू हो चुका था। लिहाजा अंग्रेज चाहते थे कि जिन देशों पर उनका कब्जा है, वहां भी डाक टिकट प्रचलन शुरू किया जाए। इसके लिए उन्होंने एशिया में सबसे पहला देश भारत को चुना। उन्होंने संयुक्त भारत के सिंध प्रांत में (अब पाकिस्तान में) अंग्रेजों ने तत्कालीन सिंध गवर्नर को आदेश देकर वहां भी डाक सिस्टम की शुरुआत करवाई। सिंध डाक के नाम से पहली टिकट 1852 में तैयार की गई। आधे आना इसकी कीमत रखी गई और ये इंडिया, बर्मा समेत एशिया के उन देशों में चलती थी, जहां अंग्रेजों का राज था, लेकिन अंग्रेजों के आदेश पर इसे जल्दबाजी में शुरू किया गया था, इसलिए ये सील मैटिरियल की होती थी, जो दरककर टूट जाती थी, काफी समय बाद इसे बदला गया। आज ये पूरी दुनिया में बहुत ही ज्यादा दुर्लभ है।
डाक संग्रहण का इतिहास भी रोचक
लाजिमी है जहां से पहली डाक टिकट का उदय हुआ, उसे देश से संग्रहण का शौक भी पैदा होने ही था। चूंकि उन दिनों इंडिया में ब्रिटेन का राज था, लिहाजा ये शौक इंडिया भी पहुंचा। सीनियर डाक टिकट संग्रहकर्ता अबनाश सिंह लूथरा के अनुसार ब्रिटेन में एक दिन एक महिला अपने ड्रेसिंग टेबल के सामने खत पढ़ रही थी। इसके बाद उसने खत से डाक टिकट उतारा और ड्रेसिंग टेबल के शीशे पर चस्पा दिया। इस तरह जो भी डाक उसे रिसीव होती, उसके टिकट वे ड्रेसिंग टेबल के शीशे पर आकर्षक रूप से चारों ओर चस्पा करती रहती। बस, धीरे-धीरे उसका ये शौक जब विकसित होने लगा तो अन्य लोगों ने भी ऐसा करना शुरू किया। इस तरह डाक संग्रहण का शौक विकसित हुआ।