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आउट ऑफ एजेंडा एक मसले पर ही भिड़ गए भाजपा और कांग्रेस के पार्षद
अमर उजाला ब्यूरो/अंबाला सिटी
Updated Wed, 21 Sep 2016 12:47 AM IST
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अंबाला सिटी। पांच महीने बाद म्यूनिसिपल कारपोरेशन अंबाला (एमसीए) की बैठक सोमवार को सिटी पंचायत भवन में आयोजित की गई। जलभराव, गंदगी, डेंगू, ठप स्ट्रीट लाइटों इत्यादि समस्याओं से जूझ रही ट्विनसिटी के बाशिंदों को उम्मीद थी कि उनके इलाकों के पार्षद उनका दर्द सदन में उठाएंगे और अफसरों के साथ चर्चा कर उनकी समस्याओं का हल निकालेंगे। साथ ही उनके इलाकों में विकास को लेकर कुछ नई योजनाओं के प्रस्ताव भी पास करवाएंगे।
लेकिन मंगलवार को उस वक्त तमाम पार्षदों ने ट्विनसिटी के बाशिंदों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया, जब वे सभी एक ऐसे मसले पर भिड़ गए, जो मसला एमसीए सदन की बैठक के एजेंडे में ही शामिल नहीं था। इसी आउट ऑफ एजेंडा मसले पर न केवल पार्षदों ने सदन में जबरदस्त हंगामा किया, बल्कि सदन की तमाम गरिमा को ताक पर रखकर जमकर तू-तू, मैं-मैं की।
सदन में मौजूद कांग्रेसी और भाजपा के पार्षद आपस में बंट गए और दोनों ने जमकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर खूब वबाल काटा। अंतत: कांग्रेसी पार्षद सदन का वाकआउट कर पंचायत भवन के बाहर धरने पर बैठ गए।
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उसके बाद एमसीए कमिश्नर ने सदन सो बाहर आकर धरने पर बैठे कांग्रेसियों को समझाया, लेकिन वे नहीं मानें और बाहर कमिश्नर के सामने ही कांग्रेसी और भाजपा पार्षदों की ठन गई। अंतत: एमसीए सदन के दो घंटे इसी आउट ऑफ एजेंडा मसले पर छिड़े विवाद में ही बर्बाद हो गए और बैठक को मंगलवार तक स्थगित कर दिया गया। मंगलवार को भी एमसीए सदन की बैठक इसी विवाद से शुरू होगी, विकास संबंधी एजेंडा बाद में शुरू होगा।
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ये मसला बना विवाद की जड़
करीब पांच महीने पहले एमसीए में आउटसोर्सिंग कर्मचारी रखने के लिए एक टेंडर निकाला गया था। लेकिन मेयर रमेश लाल मल और उनके समर्थक अन्य कांग्रेसी पार्षदों ने इस टेंडर पर सवाल खड़े कर दिए। इन पार्षदों का आरोप था कि बिना एमसीए की फाइनेंस सब कमेटी से अप्रूव करवाए आउटसोर्सिंग कर्मचारी रखने का टेंडर कैसे निकाला गया? खैर, एमसीए ने इसी टेंडर के तहत संबंधित ठेकेदार के अधीन 89 कर्मचारियों को तदर्थ आधार पर काम पर रख लिया गया। बस, इसी बात को लेकर कांग्रेसी पार्षद भड़क गए। उधर, दूसरी ओर एमसीए को तदर्थ आधार पर कर्मचारी उपलब्ध करवाने वाले पुराने ठेकेदार ने इस नए आउटसोर्सिंग ठेके को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी और आज भी मामला हाईकोर्ट में ही विचाराधीन चल रहा है। इसी विवाद का नतीजा यह हुआ कि आज सभी 89 तदर्थ कर्मचारियों का वेतन 5 महीने से ही रूका पड़ा है और वे बिना पगार पांच महीनों से काम करने को मजबूर है।
हालांकि ये विवाद सोमवार को पांच महीने बाद होने वाली एमसीए सदन की बैठक का एजेंडा नहीं था, लेकिन उसके बावजूद सदन की बैठक में एजेंडे पर चरचा करने पहुंचे कांग्रेसी और भाजपा के पार्षद ये कहकर आपस में भिड़ गए कि वे अपने-अपने समर्थक ठेकेदारों को ये टेंडर दिलवाना चाहते हैं। कांग्रेसी पार्षदों ने आरोप लगाया कि नियमों को ताक पर रख भाजपा ने अपने समर्थित ठेकेदार को आउटसोर्सिंग का ठेका दिया, भाजपा पार्षदों का आरोप है कि कांग्रेस समर्थित ठेकेदार को टेंडर नहीं मिला, इसलिए कांग्रेसी पार्षद फडफ़ड़ा रहे हैं। बस, इस विवाद में सदन के दो घंटे बर्बाद हो गए और बैठक की कार्रवाई आगे नहीं चल पाई।
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कमिश्नर लाए थे विवाद का हल, किसी ने नहीं सुनी
मैं इस विवाद पर कुछ महीनों से काम कर रहा हूं। मैं अब इस विवाद का हल सदन में लाया था। लेकिन किसी ने बात ही नहीं सुनी। मैने पांच माह से पगार का इंतजार कर रहे कर्मचारियों के हित का हवाला देकर दोनों ठेकेदारों को बिठाकर इस बात पर सहमत कर लिया था कि फिलहाल मौजूदा ठेकेदार अपने सर्विस चार्ज छोड़कर सिर्फ और सिर्फ कर्मचारियों को पांच महीने की सेलरी पेमेंट करेगा। इसमें कर्मचारियों का ईपीएफ और उसका सर्विस टैक्स शामिल नहीं होगा। उसके बाद उनके विवाद पर हाईकोर्ट जो आदेश देगा, उसके मुताबिक दोनों ठेकेदार अपना एडजस्टमेंट कर लेंगे, कम से कम कर्मचारियों को तो दिक्कत नहीं होगी। दोनों ठेकेदार उनकी बात भी मान गए थे, लेकिन सदन में उनकी बात किसी ने सुनी ही नहीं। मैंने सदन से यह भी कहा था कि यदि पार्षदों को मेरा पहला हल मंजूर न हो तो, एक प्रस्ताव यह कर दिया जाए कि एक साल का ठेका दोनों ठेकेदार आपस में आधा-आधा कर लें, लेकिन इस पर भी कोई राजी नहीं हुआ। लेकिन अगली पेशी में मैं खुद हाईकोर्ट में पेश हूंगा और हाईकोर्ट से प्रार्थना करूंगा कि वे कर्मचारी हित के देखते हुए इस विवाद से परे मुझे (कमिश्नर) को सशर्त कर्मचारियों को पगार देने के आदेश दें। बाकी मसला निपटता रहेगा। समझ, आता जब ठेकेदार राजी है, तो बिना वजह इस हंगामे की जरूरत क्या थी?
- दिनेश यादव, कमिश्नर, एसमीए
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फोटो खिंचवाने पहुंच जाते हैं भाजपा पार्षद
मेयर रमेश लाल मल, सीनियर डिप्टी मेयर दुर्गा सिंह अत्रेय, डिप्टी मेयर सुधीर जयसवाल, दलजीत सिंह भाटिया सीटू, हिम्मत सिंह, रूपम गुगलानी, दर्शना मेहता, पूर्व पार्षद बृजलाल सिंगला, जरनैल सिंह माजरा, दिलीप बिट्टू चावला, परविंद्र सिंह, स्वर्ण कौर, चित्रा सरवारा ने कहा कि विवाद की शुरुआत भाजपा के पार्षदों ने की थी, मेयर बोले, ‘इन्हें तो सिर्फ फोटो खिंचवाने का शौक है...बस...न किसी की समस्या सुननी, न समझनी...बिना वजह चिल्लाना।’
उक्त कांग्रेसी पार्षदों ने कहा कि वे तो सिर्फ इतना कह रहे हैं कि जिस भी एमसीए अफसर ने नियमों को ताक पर रखकर केवल सिटी विधायक के इशारे पर आउटसोर्सिंग का ठेका उन्हीं के खेमे के एक ठेकेदार को दिया है, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए और इस पूरे मसले की जांच विजिलेंस या फिर सीबीआई से करवाई जाए।
उक्त पार्षदों ने कहा कि नियमानुसार जब इस टेंडर को पहले एमसीए की फाइनेंस सब कमेटी से अप्रूव करवाना था तो इसे बिना अप्रूव करवाए कैसे जारी किया गया? उनके अनुसार एक ओर तो पार्षदों को गुमराह करने के लिए एमसीए के संबंधित अफसर ने फाइनेंस सब कमेटी की बैठक कॉल कर दी, उधर, मीटिंग से एक दिन पहले टेंडर जारी कर उसकी बीड भी स्वीकार कर ली। कांग्रेसी पार्षदों के अनुसार वे भी धरने पर इसलिए बैठे हैं कि विवाद तो हाईकोर्ट से ही सुलटता रहेगा, लेकिन अब टेंडर में गड़बड़झाला करने वाला एमसीए सबसे पहले 89 कर्मचारियों को अपने फंड से पांच माह का रूका हुआ वेतन जारी करे। ताकि कर्मचारी आने वाले अपने त्योहार आर्थिक तंग से उभरकर मना सकें।
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सदन में होता है समाधान, सड़क पर राजनीति चमकाने से नहीं
उधर, भाजपा पार्षद सुरेंद्र बिंद्रा डब्बू, जसबीर सिंह जस्सी, पुष्पिंद्र हरीश, राजेश गोयल, सतपाल ढल्ल ने कहा कि भाजपा के विधायक ने किसी को कोई ठेका नहीं दिलवाया है। ठेकेदार ने ऑनलाइन टेंडर देखा और ऑनलाइन ही उसे भर दिया। भाजपा पार्षदों ने कहा कि जब टेंडर जारी हुआ था, तब कांग्रेसी पार्षदों ने हंगामा क्यों नहीं किया? आज पांच महीने बाद पार्षद यहां धरने पर बैठकर खुद को तदर्थ कर्मचारियों का हितैषी बता रहे हैं। उनके अनुसार सदन को बाहर छोड़कर यहां धरना देने से कोई हल निकलने वाला, भाजपा पार्षद और एमसीए कमिश्नर तो कांग्रेसी पार्षदों का सदन में इंतजार कर रहे थे, लेकिन कोई वापस नहीं आया। उन्होंने कहा कि मामला हाईकोर्ट में हैं, वहां से निपट जाएगा, यदि एमसीए पर अपने बजट से रूका वेतन देने का दबाव बनाना है तो ये दबाव सदन में बैठकर बनाया जाएगा, न कि सदन के बाहर सड़क पर धरने पर बैठकर अपनी राजनीति चमकाने से। भाजपा पार्षदों ने कहा कि सभी पार्षद एमसीए अफसरों के साथ बैठकर इस समस्या का हल निकालें तो बेहतर होगा।
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...और सोनिया ने सदन में टंगवा दिया बैनर
वार्ड नंबर एक की पार्षद सोनिया रानी ने इस विवाद से परे एक बड़ा सा बैनर बिना कुछ कहे एमसीए सदन में लाकर एमसीए कमिश्नर, ज्वाइंट कमिश्नर और मेयर की सीट के पीछे टांग दिया। उसके बाद उन्होंने इस बैनर को पूरे सदन में भी घुमाया। पार्षद सोनिया चौधरी ने कहा कि शहर व छावनी डेंगू बुखार, गंदगी, खराब स्ट्रीट लाइटें व अन्य बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। लेकिन हमारे माननीय पार्षद ऐसे विवाद पर उलझ रहे हैं, जो एजेंडे में शामिल ही नहीं हैं। उनके अनुसार ठीक है मामला 89 तदर्थ कर्मचारियों के रूके वेतन का है, लेकिन एमसीए कमिश्नर जब उसका हल सदन में लाए थे, तो क्यों पार्षदों ने उनकी बात नहीं सुनी? सभी पार्षद अपनी-अपनी राजनीति चमकाने में व्यस्त थे। सारी बैठक यूं ही बर्बाद हो गई और जनहित की किसी समस्या पर कोई चरचा नहीं हुई। इसलिए उन्होंने इस बैनर को सदन में टांगा, ताकि अफसरों और पार्षदों को अहसास हो कि अत्यंत जरूरी लाखों लोगों से जुड़े मुद्दों पर ऊर्जा खर्च की जाए तो बेहतर होगा।
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लेकिन मंगलवार को उस वक्त तमाम पार्षदों ने ट्विनसिटी के बाशिंदों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया, जब वे सभी एक ऐसे मसले पर भिड़ गए, जो मसला एमसीए सदन की बैठक के एजेंडे में ही शामिल नहीं था। इसी आउट ऑफ एजेंडा मसले पर न केवल पार्षदों ने सदन में जबरदस्त हंगामा किया, बल्कि सदन की तमाम गरिमा को ताक पर रखकर जमकर तू-तू, मैं-मैं की।
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सदन में मौजूद कांग्रेसी और भाजपा के पार्षद आपस में बंट गए और दोनों ने जमकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर खूब वबाल काटा। अंतत: कांग्रेसी पार्षद सदन का वाकआउट कर पंचायत भवन के बाहर धरने पर बैठ गए।
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उसके बाद एमसीए कमिश्नर ने सदन सो बाहर आकर धरने पर बैठे कांग्रेसियों को समझाया, लेकिन वे नहीं मानें और बाहर कमिश्नर के सामने ही कांग्रेसी और भाजपा पार्षदों की ठन गई। अंतत: एमसीए सदन के दो घंटे इसी आउट ऑफ एजेंडा मसले पर छिड़े विवाद में ही बर्बाद हो गए और बैठक को मंगलवार तक स्थगित कर दिया गया। मंगलवार को भी एमसीए सदन की बैठक इसी विवाद से शुरू होगी, विकास संबंधी एजेंडा बाद में शुरू होगा।
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ये मसला बना विवाद की जड़
करीब पांच महीने पहले एमसीए में आउटसोर्सिंग कर्मचारी रखने के लिए एक टेंडर निकाला गया था। लेकिन मेयर रमेश लाल मल और उनके समर्थक अन्य कांग्रेसी पार्षदों ने इस टेंडर पर सवाल खड़े कर दिए। इन पार्षदों का आरोप था कि बिना एमसीए की फाइनेंस सब कमेटी से अप्रूव करवाए आउटसोर्सिंग कर्मचारी रखने का टेंडर कैसे निकाला गया? खैर, एमसीए ने इसी टेंडर के तहत संबंधित ठेकेदार के अधीन 89 कर्मचारियों को तदर्थ आधार पर काम पर रख लिया गया। बस, इसी बात को लेकर कांग्रेसी पार्षद भड़क गए। उधर, दूसरी ओर एमसीए को तदर्थ आधार पर कर्मचारी उपलब्ध करवाने वाले पुराने ठेकेदार ने इस नए आउटसोर्सिंग ठेके को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी और आज भी मामला हाईकोर्ट में ही विचाराधीन चल रहा है। इसी विवाद का नतीजा यह हुआ कि आज सभी 89 तदर्थ कर्मचारियों का वेतन 5 महीने से ही रूका पड़ा है और वे बिना पगार पांच महीनों से काम करने को मजबूर है।
हालांकि ये विवाद सोमवार को पांच महीने बाद होने वाली एमसीए सदन की बैठक का एजेंडा नहीं था, लेकिन उसके बावजूद सदन की बैठक में एजेंडे पर चरचा करने पहुंचे कांग्रेसी और भाजपा के पार्षद ये कहकर आपस में भिड़ गए कि वे अपने-अपने समर्थक ठेकेदारों को ये टेंडर दिलवाना चाहते हैं। कांग्रेसी पार्षदों ने आरोप लगाया कि नियमों को ताक पर रख भाजपा ने अपने समर्थित ठेकेदार को आउटसोर्सिंग का ठेका दिया, भाजपा पार्षदों का आरोप है कि कांग्रेस समर्थित ठेकेदार को टेंडर नहीं मिला, इसलिए कांग्रेसी पार्षद फडफ़ड़ा रहे हैं। बस, इस विवाद में सदन के दो घंटे बर्बाद हो गए और बैठक की कार्रवाई आगे नहीं चल पाई।
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कमिश्नर लाए थे विवाद का हल, किसी ने नहीं सुनी
मैं इस विवाद पर कुछ महीनों से काम कर रहा हूं। मैं अब इस विवाद का हल सदन में लाया था। लेकिन किसी ने बात ही नहीं सुनी। मैने पांच माह से पगार का इंतजार कर रहे कर्मचारियों के हित का हवाला देकर दोनों ठेकेदारों को बिठाकर इस बात पर सहमत कर लिया था कि फिलहाल मौजूदा ठेकेदार अपने सर्विस चार्ज छोड़कर सिर्फ और सिर्फ कर्मचारियों को पांच महीने की सेलरी पेमेंट करेगा। इसमें कर्मचारियों का ईपीएफ और उसका सर्विस टैक्स शामिल नहीं होगा। उसके बाद उनके विवाद पर हाईकोर्ट जो आदेश देगा, उसके मुताबिक दोनों ठेकेदार अपना एडजस्टमेंट कर लेंगे, कम से कम कर्मचारियों को तो दिक्कत नहीं होगी। दोनों ठेकेदार उनकी बात भी मान गए थे, लेकिन सदन में उनकी बात किसी ने सुनी ही नहीं। मैंने सदन से यह भी कहा था कि यदि पार्षदों को मेरा पहला हल मंजूर न हो तो, एक प्रस्ताव यह कर दिया जाए कि एक साल का ठेका दोनों ठेकेदार आपस में आधा-आधा कर लें, लेकिन इस पर भी कोई राजी नहीं हुआ। लेकिन अगली पेशी में मैं खुद हाईकोर्ट में पेश हूंगा और हाईकोर्ट से प्रार्थना करूंगा कि वे कर्मचारी हित के देखते हुए इस विवाद से परे मुझे (कमिश्नर) को सशर्त कर्मचारियों को पगार देने के आदेश दें। बाकी मसला निपटता रहेगा। समझ, आता जब ठेकेदार राजी है, तो बिना वजह इस हंगामे की जरूरत क्या थी?
- दिनेश यादव, कमिश्नर, एसमीए
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फोटो खिंचवाने पहुंच जाते हैं भाजपा पार्षद
मेयर रमेश लाल मल, सीनियर डिप्टी मेयर दुर्गा सिंह अत्रेय, डिप्टी मेयर सुधीर जयसवाल, दलजीत सिंह भाटिया सीटू, हिम्मत सिंह, रूपम गुगलानी, दर्शना मेहता, पूर्व पार्षद बृजलाल सिंगला, जरनैल सिंह माजरा, दिलीप बिट्टू चावला, परविंद्र सिंह, स्वर्ण कौर, चित्रा सरवारा ने कहा कि विवाद की शुरुआत भाजपा के पार्षदों ने की थी, मेयर बोले, ‘इन्हें तो सिर्फ फोटो खिंचवाने का शौक है...बस...न किसी की समस्या सुननी, न समझनी...बिना वजह चिल्लाना।’
उक्त कांग्रेसी पार्षदों ने कहा कि वे तो सिर्फ इतना कह रहे हैं कि जिस भी एमसीए अफसर ने नियमों को ताक पर रखकर केवल सिटी विधायक के इशारे पर आउटसोर्सिंग का ठेका उन्हीं के खेमे के एक ठेकेदार को दिया है, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए और इस पूरे मसले की जांच विजिलेंस या फिर सीबीआई से करवाई जाए।
उक्त पार्षदों ने कहा कि नियमानुसार जब इस टेंडर को पहले एमसीए की फाइनेंस सब कमेटी से अप्रूव करवाना था तो इसे बिना अप्रूव करवाए कैसे जारी किया गया? उनके अनुसार एक ओर तो पार्षदों को गुमराह करने के लिए एमसीए के संबंधित अफसर ने फाइनेंस सब कमेटी की बैठक कॉल कर दी, उधर, मीटिंग से एक दिन पहले टेंडर जारी कर उसकी बीड भी स्वीकार कर ली। कांग्रेसी पार्षदों के अनुसार वे भी धरने पर इसलिए बैठे हैं कि विवाद तो हाईकोर्ट से ही सुलटता रहेगा, लेकिन अब टेंडर में गड़बड़झाला करने वाला एमसीए सबसे पहले 89 कर्मचारियों को अपने फंड से पांच माह का रूका हुआ वेतन जारी करे। ताकि कर्मचारी आने वाले अपने त्योहार आर्थिक तंग से उभरकर मना सकें।
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सदन में होता है समाधान, सड़क पर राजनीति चमकाने से नहीं
उधर, भाजपा पार्षद सुरेंद्र बिंद्रा डब्बू, जसबीर सिंह जस्सी, पुष्पिंद्र हरीश, राजेश गोयल, सतपाल ढल्ल ने कहा कि भाजपा के विधायक ने किसी को कोई ठेका नहीं दिलवाया है। ठेकेदार ने ऑनलाइन टेंडर देखा और ऑनलाइन ही उसे भर दिया। भाजपा पार्षदों ने कहा कि जब टेंडर जारी हुआ था, तब कांग्रेसी पार्षदों ने हंगामा क्यों नहीं किया? आज पांच महीने बाद पार्षद यहां धरने पर बैठकर खुद को तदर्थ कर्मचारियों का हितैषी बता रहे हैं। उनके अनुसार सदन को बाहर छोड़कर यहां धरना देने से कोई हल निकलने वाला, भाजपा पार्षद और एमसीए कमिश्नर तो कांग्रेसी पार्षदों का सदन में इंतजार कर रहे थे, लेकिन कोई वापस नहीं आया। उन्होंने कहा कि मामला हाईकोर्ट में हैं, वहां से निपट जाएगा, यदि एमसीए पर अपने बजट से रूका वेतन देने का दबाव बनाना है तो ये दबाव सदन में बैठकर बनाया जाएगा, न कि सदन के बाहर सड़क पर धरने पर बैठकर अपनी राजनीति चमकाने से। भाजपा पार्षदों ने कहा कि सभी पार्षद एमसीए अफसरों के साथ बैठकर इस समस्या का हल निकालें तो बेहतर होगा।
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...और सोनिया ने सदन में टंगवा दिया बैनर
वार्ड नंबर एक की पार्षद सोनिया रानी ने इस विवाद से परे एक बड़ा सा बैनर बिना कुछ कहे एमसीए सदन में लाकर एमसीए कमिश्नर, ज्वाइंट कमिश्नर और मेयर की सीट के पीछे टांग दिया। उसके बाद उन्होंने इस बैनर को पूरे सदन में भी घुमाया। पार्षद सोनिया चौधरी ने कहा कि शहर व छावनी डेंगू बुखार, गंदगी, खराब स्ट्रीट लाइटें व अन्य बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। लेकिन हमारे माननीय पार्षद ऐसे विवाद पर उलझ रहे हैं, जो एजेंडे में शामिल ही नहीं हैं। उनके अनुसार ठीक है मामला 89 तदर्थ कर्मचारियों के रूके वेतन का है, लेकिन एमसीए कमिश्नर जब उसका हल सदन में लाए थे, तो क्यों पार्षदों ने उनकी बात नहीं सुनी? सभी पार्षद अपनी-अपनी राजनीति चमकाने में व्यस्त थे। सारी बैठक यूं ही बर्बाद हो गई और जनहित की किसी समस्या पर कोई चरचा नहीं हुई। इसलिए उन्होंने इस बैनर को सदन में टांगा, ताकि अफसरों और पार्षदों को अहसास हो कि अत्यंत जरूरी लाखों लोगों से जुड़े मुद्दों पर ऊर्जा खर्च की जाए तो बेहतर होगा।