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बदलता लाइफ स्टाइल और खानपान दे रहा है इस बीमारी को आमंत्रण
अमर उजाला ब्यूरो/अंबाला सिटी
Updated Wed, 12 Oct 2016 12:23 AM IST
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अंबाला कैंट। आर्थराइटिस यानी गठिया, एक ऐसी बीमारी जो अब उस उम्र के लोगों को भी चपेट में ले रही है, जो कभी इस बीमारी से दूर थे। पहले जहां 60-65 साल की उम्र में यह रोग लोगों को चपेट में लेता था, वहीं अब यह बीमारी चालीस साल के बाद कभी भी दस्तक दे सकती है। इसका सबसे बड़ा कारण लोगों का बदलता लाइफ स्टाइल और खानपान की गलत आदतें इसका सबसे बड़ा कारण हैं।
यह है स्थिति
चिकित्सकों के अनुसार आर्थराइटिस यानी गठिया की बीमारी 60 या 65 साल के बाद की अवस्था में ज्यादा देखी जाती थी। लेकिन अब स्थिति यह है कि 40 साल के बाद ही इस बीमारी के लक्षण लोगों में दिख रहे हैं। कुछ मामले तो इससे भी कम उम्र के सामने आए हैं, लेकिन इनकी संख्या काफी कमी है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों को मानें, तो विश्व भर में आर्थराइटिस से पीड़ित मरीजों की संख्या 350 मिलियन है। सिर्फ जोड़ों का दर्द ही आर्थराइटिस नहीं है, जबकि इसके भी कई स्टेज या फिर कहें कि रूप हैं। डाक्टर ही तय करता है कि यह दर्द किस कारण से है और क्या लाइन आफ ट्रीटमेंट होगा।
यह हैं आर्थराइटिस के लक्षण
यदि किसी को आर्थराइटिस है, तो पहले यह जानना होगा कि यह किस कारण से है। चिकित्सकों के अनुसार इसे इनफलेमेटरी आर्थराइटिस, डीजेनरेटिव या मैकेनिकल आर्थराइटिस, साफ्ट टिशू मसलोस्केलेटल पेन, बैक पेन, कनेक्टिव टिशू डिसीज, इनफेक्शियस आर्थराइटिस, मेटाबॉलिक आर्थराइटिस के रूप में मरीजों में यह सामने आता है। अधिकतर मामलों में इसके लक्षण सामान हो सकते हैं। इन में जोड़ों में सूजन, जोड़ों का एरिया लाल हो जाना, जोड़ों का अकड़ना, जोड़ों में बदलाव आना, अनीमिया यानी खून की कमी, बुखार, थकान आदि दिखाई देते हैं।
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इस तरह से करें इलाज और बचाव
- फिजियोथैरेपिस्ट डा. मिलन दास का कहना है कि आर्थराटिस यदि पहले या दूसरे स्टेज का है, तो फिजियोथैरेपी से राहत मिलती है
- यदि आरंभिक अवस्था है, तो नियमित रूप से एक्सरसाइज करें
- आरामदायक जीवन शैली को त्याग करकें और शारीरिक श्रम करें
- इसके लिए कुछ दवाओं का सहारा ले सकते हैं, लेकिन इसे चिकित्सक की सलाह से ही लें
- कुछ मामलों में जोड़ों को बदलने की नौबत आ सकती है
- सबसे जरूरी है कि व्यक्ति जीवन में अपने खानपान का ध्यान अवश्य रखे
यह कहते हैं चिकित्सक
डॉ. संजीव कौशिक, डा. करनैल सिंह का कहना है कि गठिया यानी आर्थराइटिस काफी गंभीर बीमार है। अब तो युवा अवस्था में भी इसके लक्षण दिखाई देने लगे हैं, जबकि पहले यह बुजुर्गों में ज्यादा होता था। शुरुआत में ही इसका इलाज कराया जाए तो राहत है, नहीं तो फिर काफी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। कई मामलों में तो मरीज बिस्तर तक ही रह जाता है।
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यह है स्थिति
चिकित्सकों के अनुसार आर्थराइटिस यानी गठिया की बीमारी 60 या 65 साल के बाद की अवस्था में ज्यादा देखी जाती थी। लेकिन अब स्थिति यह है कि 40 साल के बाद ही इस बीमारी के लक्षण लोगों में दिख रहे हैं। कुछ मामले तो इससे भी कम उम्र के सामने आए हैं, लेकिन इनकी संख्या काफी कमी है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों को मानें, तो विश्व भर में आर्थराइटिस से पीड़ित मरीजों की संख्या 350 मिलियन है। सिर्फ जोड़ों का दर्द ही आर्थराइटिस नहीं है, जबकि इसके भी कई स्टेज या फिर कहें कि रूप हैं। डाक्टर ही तय करता है कि यह दर्द किस कारण से है और क्या लाइन आफ ट्रीटमेंट होगा।
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यह हैं आर्थराइटिस के लक्षण
यदि किसी को आर्थराइटिस है, तो पहले यह जानना होगा कि यह किस कारण से है। चिकित्सकों के अनुसार इसे इनफलेमेटरी आर्थराइटिस, डीजेनरेटिव या मैकेनिकल आर्थराइटिस, साफ्ट टिशू मसलोस्केलेटल पेन, बैक पेन, कनेक्टिव टिशू डिसीज, इनफेक्शियस आर्थराइटिस, मेटाबॉलिक आर्थराइटिस के रूप में मरीजों में यह सामने आता है। अधिकतर मामलों में इसके लक्षण सामान हो सकते हैं। इन में जोड़ों में सूजन, जोड़ों का एरिया लाल हो जाना, जोड़ों का अकड़ना, जोड़ों में बदलाव आना, अनीमिया यानी खून की कमी, बुखार, थकान आदि दिखाई देते हैं।
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इस तरह से करें इलाज और बचाव
- फिजियोथैरेपिस्ट डा. मिलन दास का कहना है कि आर्थराटिस यदि पहले या दूसरे स्टेज का है, तो फिजियोथैरेपी से राहत मिलती है
- यदि आरंभिक अवस्था है, तो नियमित रूप से एक्सरसाइज करें
- आरामदायक जीवन शैली को त्याग करकें और शारीरिक श्रम करें
- इसके लिए कुछ दवाओं का सहारा ले सकते हैं, लेकिन इसे चिकित्सक की सलाह से ही लें
- कुछ मामलों में जोड़ों को बदलने की नौबत आ सकती है
- सबसे जरूरी है कि व्यक्ति जीवन में अपने खानपान का ध्यान अवश्य रखे
यह कहते हैं चिकित्सक
डॉ. संजीव कौशिक, डा. करनैल सिंह का कहना है कि गठिया यानी आर्थराइटिस काफी गंभीर बीमार है। अब तो युवा अवस्था में भी इसके लक्षण दिखाई देने लगे हैं, जबकि पहले यह बुजुर्गों में ज्यादा होता था। शुरुआत में ही इसका इलाज कराया जाए तो राहत है, नहीं तो फिर काफी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। कई मामलों में तो मरीज बिस्तर तक ही रह जाता है।