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Ambala News: बदलते दौर में माताओं के लिए बढ़ रहीं चुनौतियां

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 09 May 2024 03:06 AM IST
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Challenges for mothers are increasing in the changing times
सुनीता सैनी, ​शि​क्षिका ।
अंबाला। छावनी की रंगिया मंडी स्थित राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में अपराजिता कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें प्रिंसिपल, छात्राओं और शिक्षिकाओं ने विचार रखे। इसमें तेजी से बदल रही जीवन शैली माताओं के लिए अनूठे दबाव पैदा कर रही है।
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व्यस्तता के बीच आज के दौर में कामकाजी माताओं के साथ मातृत्व आसान नहीं रह गया। उन्हें अपने कार्य क्षेत्र के अलावा रोजाना नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में परिवार की देख-रेख के अलावा बच्चों को अच्छे संस्कार देना उनकी शिक्षा-दीक्षा का ध्यान रखना सब माताओं पर ही निर्भर है। ऐसे में इस बदलते परिवेश में माताओं की जिम्मेदारी अहम हो जाती है। बेशक उन्हें कई प्रकार की समस्याओं से जूझना पड़ता है, लेकिन वो अपने मातृत्व का फर्ज बखूबी निभा रही हैं। जहां एक तरफ प्रौद्योगिकी का जाल फैल रहा है।
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बच्चे मोबाइल से सभी अहम जानकारियां हासिल कर रहे हैं। वहीं मोबाइल में कुछ ऐसी एप भी हैं जो बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर रही हैं। ऐसे में बच्चों की मनोवैज्ञानिक स्थिति को समझकर, उसे अच्छे-बुरे की शिक्षा देना मातृत्व का एक अहम हिस्सा है। ऐसे में इस समस्या से निपटने के दौरान माताओं को कई जटिलताओं का भी सामना करना पड़ता है। वहीं बच्चों में हो रहे शारीरिक बदलाव भी हिंसक प्रवृति को बढ़ावा देता है। इसलिए बच्चों को सही समय पर सही जानकारी देकर उनकी जिज्ञासा को शांत किया जा सकता है।
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मां बेटी को बाहर की दुनिया से का सामना करना सिखाती है, इसके लिए वह उसकी घर पर ही तैयारी करा वह उसे हर स्थिति में कामयाब होते देखना चाहती हैं। इसी के साथ वह दूसरों का सम्मान करना भी सिखाती हैं।



सुनीता सैनी, शिक्षिका।

मेरी माता खुद एक शिक्षिका थीं जो दिन में स्कूल में पढ़ाती थी और शाम को घर पर हमें पढ़ाती थी। मेरे माता पिता के संस्कार और शिक्षा के कारण ही आज मैं भी शिक्षिका हूं।



कोमल, शिक्षिका।

मेरी माता गृहिणी थी उनका सपना था कि हम बहने बड़ी होकर कामयाब बने, आज के समय में शिक्षा सबसे जरूरी है, शादी ब्याह तो बाद की बात है सबसे पहले बेटी को पढ़ाकर इस काबिल बनाती है मां कि बेटी अपनी जीवन में कामयाबी के शिखर को चूमे।



नेहा गोयल, शिक्षिका

मेरी माता दिव्यांग है उसके बावजूद वह हर समय मुस्कराती रहती है चाहे किसी भी तरह की स्थिति हों। वह हमेशा पूरा ध्यान रखती हैं और वह मुझे हर समय कुछ न कुछ सिखाती हैं।

मेघा, छात्रा।



मां बचपन से ही हर तरह से सहयोग देकर संस्कार बनाकर जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। अच्छी शिक्षा और संस्कार देकर पैरों पर खड़ा होने के काबिल बनाती है। मां का ऋण कभी भी नहीं चुकाया जा सकता।

सुमन, छात्रा।



मैं अपनी मां के सबसे ज्यादा करीब हूं, मुझे कहीं भी घूमने जाना होता है तो मैं अपनी मां को सबसे पहले बताती हूं,इसके बाद मेरी माता पिता से परमिशन ले लेती हैं।

यशप्रीत कौर, छात्रा



मेरी मां मेरी मां होने के साथ साथ वह अच्छी मित्र है और मुझे वह अच्छे और बुरे का ज्ञान करवाती है। बच्चे की सबसे पहली गुरू मां होती है, क्योंकि मां जन्म से बड़ा होने तक साथ रहती है। इसके बाद शिक्षकों का नंबर आता है,

अनामिका, छात्रा।



उस वक्त बेटी को आपके सहारे और समझ की बहुत जरूरत होती है। आपको भी उसके व्यवहार में आए बदलाव को समझना जरूरी है। ऐसे समय में आप अपना रवैया उसके प्रति दोस्ताना रखें, जिससे कि वह खुलकर अपनी समस्या आपसे शेयर कर सके। मां नहीं उसकी सहेली बन जाएं।


कविता जैन, प्रिंसिपल, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय रंगिया मंडी।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

सुनीता सैनी, शिक्षिका ।

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