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Ambala News: बाबा मोहर सिंह के वीरगति स्थल को पहचान दिलाने की गुहार

Thu, 05 Jun 2025 01:38 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Thu, 05 Jun 2025 01:38 AM IST
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A plea to recognise the martyrdom place of Baba Mohar Singh
शहर किंगफिशर रिजॉर्ट के कोने में बनी समाध के पास बाबा मोहर सिंह के वीरगति स्थल। स्वयं
अंबाला सिटी। बाबा मोहर सिंह का इतिहास लिखने वाले सेवानिवृत्त पीसीएस अधिकारी तेजिंद्र सिंह वालिया ने मेयर शैलजा सचदेवा को पत्र लिखा। उन्होंने 1857 की क्रांति में ऐतिहासिक भूमि पर प्राण न्योछावर करने वाले बाबा मोहर सिंह के वीरगति स्थल को पहचान दिलाने की गुहार लगाई। समाज की कई संस्थाओं ने मिलकर पांच जून को बाबा मोहर सिंह आहलूवालिया की वीरगति को स्मरण करने के लिए नीलकंठ मन्दिर में कार्यक्रम भी रखा है।
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बाबा ने अंग्रेजों के खिलाफ किया था विद्रोह
1857 की क्रांति के समय बाबा मोहर सिंह आहलुवालिया अंग्रेजी शासन के दमन के विरुद्ध एक योद्धा बनकर खड़े हुए। इसमें उनके साथी अंबाला के कांवला जंडली के लोहार जागीरू और मौली जगरां गांव के जोगा सिंह समेत कई क्रांतिकारी नौजवान शामिल थे, जो उनके साथ एक मजबूत ढाल बनकर खड़े थे। बाबा मोहर सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर विद्रोह कर दिया और उनका प्रभाव पूरे इलाके में फैलने लगा था। उनके बढ़ते प्रभाव को खत्म करने के लिए अंबाला के डिप्टी कमिश्नर टीडी फोरसिथ ने कैप्टन गार्डन की ड्यूटी लगाई थी।
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एक ही दिन में दे दी थी फांसी
अंग्रेज सैनिकों की सहायता से बाबा मोहर सिंह को रोपड़ के जंगलों से उनके कई साथियों के साथ गिरफ्तार कर अंबाला लाया गया था। जिन भारतीय सैनिकों ने बाबा मोहर सिंह की सहायता करने की कोशिश की थी, उन्हें पकड़ कर काली पलटन अंबाला छावनी के ग्राउंड में सरेआम गोलियों से भून दिया था। अगले दिन 5 जून 1857 को बाबा मोहर सिंह आहलुवालिया व उनके तीन साथियों पर राजद्रोह का मुकदमा चला। जिसकी सुनवाई उसी दिन सुबह हुई। उसी दिन इन चारों को राजद्रोह के मुकदमें में दोपहर को फांसी की सजा सुना दी गई और शाम को ही बाबा मोहर सिंह आहलुवालिया और जंडली कांवला के जागीरू लौहार को काली पलटन से दो कोस दूर पश्चिम की ओर धूलकोट गांव के पास वटवृक्ष पर टांग कर फांसी पर लटका दिया गया। अंग्रेजों ने उन पर लंबा मुकदमा न चलाकर एक ही दिन में फैसला सुनाया था।
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किंगफिशर रिजॉर्ट के कोने में बनी समाध के पास है स्थान
जिस स्थान पर बाबा मोहर सिंह और उनके साथियों को फांसी पर लटका कर अंग्रेजों की ओर से शहीद किया। वह स्थान अब भी अंबाला शहर के किंगफिशर रिजॉर्ट के कोने में बने समाध के नजदीक है। अंबाला के बहुत ही कम लोग 1857 की क्रांति के इस अमर शहीद के बारे में जानते हैं, क्योंकि अंग्रेजों से आजादी के बाद भी पिछले 75 वर्ष में सरकार इस भूमि को पहचान देने में असमर्थ रही है।
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