फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   Ambala News ›   राकेट लगने से चली गई थी रोशनी, आज जाना-माना नाम

राकेट लगने से चली गई थी रोशनी, आज जाना-माना नाम

Tue, 04 Dec 2018 12:51 AM IST
Updated Tue, 04 Dec 2018 12:51 AM IST
विज्ञापन
राकेट लगने से चली गई थी रोशनी, आज जाना-माना नाम
राकेट लगने से चली गई थी आंखों की रोशनी, क्रिकेट खेल की नई पारी की शुरुआत
विज्ञापन

फोटो नंबर------1 तारीख का 11 नंबर
ब्लाइंड भारतीय टीम के उपकप्तान और हरियाणा के कप्तान हैं सोनीपत के दीपक मलिक
आठ साल की उम्र में आंखों की रोशनी जाने के बाद भी नहीं हारी हिम्मत
बचपन से ही क्रिकेटर बनने का था सपना, देर रात तक करते थे प्रैक्टिस
आलोक सिंह रघुवंशी
अंबाला कैंट। बचपन से ही क्रिकेटर बनने का सपना था, पर सिर्फ आठ साल की उम्र में ही आंखों की रोशनी चली गई। उनके आगे की रंग-बिरंगी दुनिया अंधकार में डूब गई, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। दिल्ली के ब्लाइंड स्कूल में पढ़ाई के दौरान अपने क्रिकेट के शौक को फिर से जिंदा किया और आज वह ब्लाइंड क्रिकेट की दुनिया का जाना-माना नाम हैं। हम बात कर रहे हैं ब्लाइंड टीम इंडिया के उपकप्तान सोनीपत के भैंसवाल गांव के रहने वाले दीपक मलिक की।
दीपक अंबाला में रणजी ट्रॉफी के तहत हो रहे मुकाबले में हरियाणा के कप्तान हैं। विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि 2004 में दिवाली के दिन राकेट चलाते हुए हादसा हुआ और आंखों की रोशनी चली गई। परिवार इतना समर्थ नहीं था कि इलाज बड़े अस्पताल में करा सके। पेशे से ट्रक ड्राइवर पिता हवा सिंह और गृहिणी मां सुदेश ने जहां तक संभव हुआ उनका इलाज कराया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें बता दिया कि अब वह छह मीटर तक ही मुश्किल से देख पाएगा। दीपक ने बताया कि अचानक हुए इस हादसे ने उसकी खुशियां छीन लीं और वह गहरे सदमे में चला गया। करीब चार साल बाद गांव के जिस स्कूल में वह पढ़ने जाता था, वहीं के किसी शिक्षक ने दिल्ली के ब्लाइंड स्कूल के बारे में बताया और पिता ने वहां दाखिला करवाया। यहां से उसने अपने जीवन की नई पारी की शुरुआत की।
विज्ञापन

नेत्रहीन बच्चों को क्रिकेट खेलते देख मिली नई ऊर्जा
दीपक बताते हैं कि जब वह ब्लाइंड स्कूल पहुंचे तो वहां देखा कि नेत्रहीन बच्चे भी क्रिकेट खेल रहे हैं। उन्होंने अपने एक शिक्षक से पूछा कि क्या दृष्टिहीन बच्चे भी देश के लिए खेल सकते हैं। हां में जवाब मिलने के बाद दीपक ने उसी दिन से दोबारा क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया और स्कूल की टीम के अहम सदस्य बन गए।
विज्ञापन
विज्ञापन

देर रात तक करते थे प्रैक्टिस
क्रिकेट के अपने जुनून के बारे में दीपक ने बताया कि जब सभी बच्चे रात को सो जाते थे तो वह अकेले ही दीवार पर बॉल मारकर प्रैक्टिस करते। कई बार ज्यादा रात होने पर प्रिंसिपल डांटते भी थे, लेकिन उनकी लगन को देखकर हौसलाफजाई भी करते। आज उसी स्कूल की बदौलत पहले दीपक का चयन राज्य की टीम के लिए हुआ और फिर 2013 में नेशनल टीम के लिए। दीपक दृष्टिहीन क्रिकेट में बी-3 कैटेगरी के खिलाड़ी हैं। इस कैटेगरी में एक टीम में चार खिलाड़ी होते हैं।

वर्ल्ड कप, टी-20 व एशिया कप में खेल चुके
ब्लाइंड क्रिकेट में भारतीय टीम को वर्ल्ड कप चैंपियन बनाने के अलावा दीपक ने टीम को एशिया चैंपियन और टी-20 चैंपियन बनाने में भी अहम योगदान दिया। जनवरी में खेले गए वर्ल्ड कप में दीपक एक बार भी आउट नहीं हुए और फाइनल में तो नाबाद 179 रनों की पारी खेली। उन्हें इसके लिए मैन ऑफ द सीरीज से नवाजा गया। इसी तरह 2014 के वर्ल्ड कप में भी उन्हें बेस्ट प्लेयर का अवार्ड मिल चुका है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed