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Vinod Upadhyay: पूर्व मंत्री ने रखा सिर पर हाथ तो कीं ताबड़तोड़ वारदातें; 2005 में एनकाउंटर से बच गया था विनोद

Sat, 06 Jan 2024 10:02 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर Published by: शाहरुख खान Updated Sat, 06 Jan 2024 10:02 AM IST
सार

Vinod Upadhyay Gorakhpur: पूर्व मंत्री ने माफिया विनोद के सिर पर हाथ रखा तो उसने ताबड़तोड़ वारदातें कीं। माफिया ने श्रीप्रकाश के करीबी सत्यव्रत को भी साधकर वारदातों को अंजाम दिया। 2005 में पूर्व मंत्री की मदद से ही विनोद एनकाउंटर से बच गया था।

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Vinod Upadhyay Gorakhpur News Vinod was saved from encounter in 2005 with help of former minister
vinod upadhyay - फोटो : Social media

विस्तार

कुख्यात माफिया श्रीप्रकाश शुक्ला के एनकाउंटर के बाद विनोद ने उसके साथी सत्यव्रत राय को साध लिया। दोनों में खूब पटने लगी। 1999 में दोनों के खिलाफ एक के बाद एक दो केस गोरखनाथ थाने में दर्ज हो गए। कुछ सालों बाद रुपये के लेनदेन को लेकर सत्यव्रत से विनोद की ठन गई। बाहुबली पूर्व मंत्री का हाथ विनोद के सिर पर था, इसलिए वह अपराध के बाद भी बच जाता था।
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बताया जाता है कि 2005 में संतकबीरनगर में डबल मर्डर के बाद पुलिस ने विनोद की घेराबंदी कर ली थी। एनकाउंटर भी हो सकता था, लेकिन पूर्व मंत्री ने पैरवी की और पुलिस घेराबंदी छोड़ लौट आई थी।
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धर्मशाला बाजार से ऑटो चलवाने के साथ ही विनोद ने सूद के कारोबार को कई अन्य जिलों में फैला लिया था। ऐसे में सूद के अन्य धंधेबाजाें से विनोद और उसके परिवार की अदावत हो गई। इसके बाद विनोद गोरखपुर विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में दखल देने लगा। खुद चुनाव लड़ने की बजाय वह गोरखपुर यूनिवर्सिटी में अपने लोगों को चुनाव मैदान में उतारने लगा।
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2002 में गोरखपुर यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ महामंत्री के पद पर अपने एक साथी को लड़वाया। वह चुनाव जीत गया। यहां से विनोद की पहुंच राजनीति में बड़े-बड़े लोगों से हो गई। 2004 में फिर से एक प्रत्याशी उतारा, लेकिन लिंगदोह समिति के तय नियमों की वजह से वह चुनाव नहीं लड़ सका। लोग बताते हैं कि प्रत्याशी की उम्र अधिक थी।

माफिया विनोद उपाध्याय को एसटीएफ ने किया ढेर
आपको बता दें कि गोरखपुर व बस्ती मंडल में आतंक का पर्याय बने माफिया विनोद उपाध्याय को एसटीएफ ने मुठभेड़ में मार गिराया। सुल्तानपुर के कोतवाली देहात थाना क्षेत्र के हनुमानगंज में बाईपास के पास शुक्रवार तड़के साढ़े तीन बजे एसटीएफ से बचने के लिए उसने फायरिंग कर दी। जवाबी कार्रवाई में वह घायल हो गया। मेडिकल कॉलेज में चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। विनोद प्रदेश के टॉप-61 माफिया की सूची में शामिल था, उसके पास से कारबाइन, पिस्टल, कारतूस व कार बरामद हुई है।

 

मूलरूप से अयोध्या के महाराजगंज थाना क्षेत्र के उपाध्याय का पुरवा निवासी विनोद गोरखपुर के रेल विहार कॉलोनी, शाहपुर और धर्मशाला बाजार क्षेत्र में रहता था। उसके खिलाफ गोरखपुर, बस्ती और लखनऊ में चार हत्याओं, हत्या के प्रयास व रंगदारी सहित 45 केस दर्ज हैं। वह 2007 में बसपा के टिकट पर गोरखपुर शहर क्षेत्र से विधानसभा चुनाव भी लड़ चुका था जिसमें उसे करारी हार मिली थी। 

 

शासन स्तर से जारी टॉप-61 माफिया की सूची में शामिल ज्यादातर बदमाश सरेंडर कर चुके हैं, वहीं विनोद उपाध्याय को पुलिस तलाश रही थी। बृहस्पतिवार को लखनऊ एसटीएफ पुलिस उपाधीक्षक दीपक कुमार सिंह के नेतृत्व में सुल्तानपुर पहुंची। सूचना मिली थी कि विनोद कोतवाली देहात क्षेत्र में किसी से मिलने आ रहा है। एसटीएफ ने कोतवाली देहात थाने की मदद से हनुमानगंज बाईपास के पास घेराबंदी की।

 

शुक्रवार तड़के लखनऊ की ओर से आती कार में सवार विनोद को एसटीएफ ने रोकने का प्रयास किया तो वह बाईपास की तरफ भागने लगा। करीब तीन किमी. आगे जाकर सर्विस लेन के पत्थर से टकराकर उसकी कार रुक गई। विनोद ने मिट्टी के टीले का सहारा लेकर फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी फायरिंग में उसे तीन गोलियां लगीं। एसटीएफ ने कोतवाली देहात थाने में विनोद के खिलाफ जानलेवा हमले और आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज कराया।

जेल में थप्पड़ खाने के बाद बना माफिया
विनोद उपाध्याय पहले गोरखपुर में ऑटो चलवाता था। उसने पिता के सूदखोरी के धंधे में भी हाथ आजमाया। ऑटो स्टैंड के विवाद में पहली बार 1999 में जेल गया। वहां से निकला तो ठेकेदारी में पांव जमाने की कोशिश करने लगा। 2004 में विनोद फिर एक मामले में जेल गया तो वहां नेपाल के बदमाश जीत नारायण मिश्र ने खाने के विवाद में उसे थप्पड़ मार दिया।

2005 में इसका बदला विनोद ने लिया। कार से लखनऊ जा रहे जीत नारायण मिश्रा और उसके बहनोई गोरेलाल को संतकबीरनगर जिले के बखिरा में गोली मारकर हत्या कर दी। यह विनोद के माफिया बनने का पहला कदम था। वह नेपाल से फर्जी वीजा पर विदेश भी गया था।
 
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