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Gorakhpur News: रजाई में छिपकर खेलता है गेम...रोकने पर झल्ला उठता है बच्चा

Thu, 02 Jul 2026 03:00 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Thu, 02 Jul 2026 03:00 AM IST
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The child plays games hidden under the blanket...gets irritated when stopped

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- कोरियन लव गेम : बच्चों में ऑनलाइन गेम की लत, डिप्रेशन और एंग्जाइटी के हो रहे शिकार

- बीआरडी मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में हो रही बच्चों की काउंसिलिंग

- लैपटॉप और मोबाइल फोन के अधिक इस्तेमाल से हो रही परेशानी

अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। बच्चों में ऑनलाइन गेमिंग एप्स की लत बढ़ती जा रही है। गाजियाबाद में बुधवार को ऑनलाइन गेम (कोरियन लव गेम) की लत में पड़ी तीन बहनों ने खुदकुशी कर ली थी। गोरखपुर में भी कई बच्चे ऑनलाइन गेम्स की लत की वजह से खतरे की जद में हैं। अभिभावकों का कहना है कि ये रजाई में मुंह डालकर गेम खेलते रहते हैं। टोकने पर झल्ला उठते हैं। कोरियन वेबसाइट्स देखने की लती लड़कियां तो कोरियन शब्द बोलने लगती हैं। वहीं, कुछ बच्चे नींद में भी धांय-धांय बोलना शुरू कर देते हैं। कुछ अभिभावक इस लत से छुटकारा पाने के लिए अब काउंसिलिंग करवा रहे हैं।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल की ओपीडी में 30 से ज्यादा बच्चों की काउंसलिंग हो रही है। इसके अलावा मनोवैज्ञानिकों के पास भी अभिभावक ऐसे बच्चों को लेकर काउंसिलिंग के लिए पहुंच रहे हैं। डॉक्टरों का कहना कि गेम की लत लग जाने के बाद ऐसे बच्चों को कुछ और अच्छा नहीं लगता। यदि उनको कोई इससे दूर करने की कोशिश करे तो वे झल्ला जाते हैं। इस लत को दूर करने के लिए काउंसिलिंग की जरूरत होती है। लैपटॉप और मोबाइल फोन के अधिक इस्तेमाल की वजह से ही ऐसी समस्या आती है।
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केस एक
बीआरडी मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में 12 साल का एक बच्चा आया था। माता-पिता उसे काउंसिलिंग के लिए ले आए थे। उसने ऑनलाइन गेम की लत में मां के खाते से करीब सात लाख रुपये उड़ा डाले। गेम के लिए वह पेमेंट करता रहा। मां ने अचानक खाता चेक किया तो रुपये गायब हो चुके थे। तब उन्हें इस बारे में पता चला। मेडिकल कॉलेज में काउंसिलिंग हुई से लत छूटी।
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केस दो
जिला अस्पताल की ओपीडी में अभिभावक एक बच्चे को लेकर आए थे। उनका कहना था कि बच्चा रजाई में मुंह डालकर गेम खेलता रहता है। मना करने वह वह झल्लाहट में चिल्लाने लगता है। उसका स्वभाव भी बदल गया है। दिनभर गेम में ही लगा रहता है। डॉक्टर ने काउंसिलिंग और इलाज किया तब उसके स्वभाव में बदलाव आया और मां-बाप ने भी राहत महसूस की।



12 से 16 साल तक के बच्चों में ज्यादा समस्या
ऑनलाइन गेम की लत ज्यादातर 12 से 16 वर्ष की उम्र के बच्चों में है। ये फायरफाल, बीजीएमआई और कोरियन गेम में लगे रहते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि गेम के लती बच्चे छह से आठ घंटे तक इसे खेलते हैं। इससे बचाव के लिए इनकी दिनचर्या में बदलाव जरूरी है। अभिभावकों को भी इस पर खास ध्यान देने की जरूरत है। वे भी कई बार अपने काम में व्यस्त हो जाते हैं। इस वजह से बच्चों में धीरे-धीरे गेम की लत लग जाती है।



बच्चों से करें खुलकर बात
डॉक्टरों का कहना है कि ऑनलाइन गेम बच्चों के लिए मनोरंजन का साधन हैं लेकिन इनका अत्यधिक और असंतुलित उपयोग नुकसानदेह हो सकता है। बच्चों को ऑनलाइन गेम से बचाने के लिए माता-पिता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। बच्चों से खुलकर बात करें और जानें कि वे कौन-से गेम खेलते हैं। खेलने के लिए प्रतिदिन एक निश्चित समयसीमा तय करें, ताकि पढ़ाई, नींद और शारीरिक गतिविधियां प्रभावित न हों। मोबाइल और कंप्यूटर में पैरेंटल कंट्रोल का उपयोग कर उम्र के अनुसार कंटेंट ही उपलब्ध कराएं। बच्चों को समझाएं कि वे अपनी निजी जानकारी किसी अनजान व्यक्ति से साझा न करें। हिंसक और जुए जैसे गेम से दूर रखें और शैक्षिक व रचनात्मक गेम्स को बढ़ावा दें। खेलकूद, किताबें और पारिवारिक समय जैसी ऑफलाइन गतिविधियों को प्रोत्साहित करें।



वर्जन
ओपीडी में अक्सर ऐसे केस आते हैं जिनमें बच्चे ऑनलाइन गेमिंग के एडिक्टेड हो जाते हैं। शुरुआत में यह कम समय देते हैं जो बाद में बढ़ता जाता है। जितना ज्यादा समय देंगे उतनी परेशानी होगी। इतना कोटा नहीं मिलने पर उन्हें बेचैनी होती है। ऐसे बच्चों की काउंसिलिंग की जाती है। गेम से दूर रखने के दो तरीके हैं। एक तरीका अचानक बंद करना है। ऐसा मुश्किल होता है लेकिन जल्द सुधार होता है। दूसरे में धीरे-धीरे गेम के समय को कम करना होता है, काउंसिलिंग और दवाओं से सुधार देखने को मिलता है।

- डॉ. तापस आइच, विभागाध्यक्ष, मानसिक रोग विभाग, बीआरडी मेडिकल कॉलेज



बच्चों में ऑनलाइन गेम की लत बढ़ी है। इसकी वजह से पारिवारिक कलह के मामले सामने आते हैं। अक्सर दो से तीन बच्चे आते हैं। कोई रात में रजाई में मोबाइल ऑन कर लेता है और रोकने पर झल्ला जाता है तो किसी ने मां का अकाउंट ही खाली कर दिया है। इनकी काउंसिलिंग की जाती है और दवाएं भी दी जाती हैं जिससे इनका चिड़चिड़ापन कम हो। स्कूलों में भी टीम जाकर बच्चों को जागरूक करती है। माता-पिता को भी ध्यान देने की जरूरत है। बच्चों की दिनचर्या अनुशासित रखें। लॉन्ग टर्म में यही कारगर होगा।
- डॉ. अमित शाही, मनोचिकित्सक, जिला अस्पताल
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