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कई कहानी समेटे हैं ये हवेलियां, कभी रहती थी यहां अंग्रेजों की धमाचौकड़ी, अब वीरानी में तब्दील

Wed, 24 Jun 2020 12:27 PM IST
vivek shukla संतोष श्रीवास्तव, सिद्धार्थनगर।
संतोष श्रीवास्तव, सिद्धार्थनगर। Published by: vivek shukla Updated Wed, 24 Jun 2020 12:27 PM IST
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story of Old Havelis of Pepe and Burdpur from siddharthnagar
बर्डपुर कस्बे में ब्रिटिश जमींदार पेपे के शासनकाल में निर्मित हवेली। - फोटो : अमर उजाला।

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के उत्तरी क्षेत्र में स्थित विकास खंड बर्डपुर अंतर्गत दुल्हा कोठी, बर्डपुर कस्बा, अलीदापुर जैसे स्थानों पर अंग्रेज जमींदार की बूढ़ी हवेलियां ब्रितानी हुकूमत की अनेक कहानियों को अपने भीतर छुपाए हैं।

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वर्ष 1844 में अलीदापुर क्षेत्र के जमींदार और गोरखपुर के तत्कालीन कमिश्नर पेपे, बर्डपुर स्थित कोठी के तत्कालीन मालिक और गोरखपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी रहे मिस्टर बर्ड से जुड़ी कहानियों को यह हवेलियां आज भी बयां कर रही हैं।
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अंग्रेजों ने अवध की सत्ता हड़पने से पूर्व उत्तर में अनेक जमींदारी प्रथा स्थापित की थी। जिनमें बर्डपुर, नेउरा ग्रांट, दुल्हा कोठी, अलीदापुर, सरौली प्रमुख रही। बर्डपुर कस्बे का नामकरण आज भी अंग्रेज जमींदार आरएन बर्ड (जो 1829 में गोरखपुर के कमिश्नर थे) के नाम से जाना जाता है।

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बर्डपुर वास्तव में अंग्रेज जमींदारों की रियासत थी, जिसमें 14 मौजे थे। आज भी इन मौजों को इनके क्रमांक से जाने जाते हैं। बर्डपुर स्टेट की स्थापना 1832 में की गई थी। जेजे मैकलाचलन इसके जमींदार थे। इनका स्वामित्व 50 वर्ष के लिए एलेक्जेंडर एंड कंपनी कोलकाता को सौंपा गया, पर यह फर्म पट्टे की शर्त को पूरा नहीं कर सकी।

एक मार्च 1934 में यह संपत्ति डब्लू एफ गिब्बन और के काका को बेच दिया। वर्ष 1948 में रियासत का प्रबंध देख रहे एच. गिब्बन की मृत्यु हो गई। उसके एक वर्ष तक उनकी पत्नी ने प्रबंध संभाला। मिसेज गिब्बन ने डब्लू पेपे को रियासत का प्रबंधक बनाया और बाद में फिर उन्हीं से शादी कर ली। बर्डपुर स्टेट के स्वामियों की अंतिम पीढ़ी थी।

दोनों भवनों की देखरेख बर्डपुर और दुल्हा कोठी को क्रमश: सिंचाई और लोक निर्माण विभाग ने अपने कब्जे में ले रखा है। कभी इन भवनों में अंग्रेजी शासकों और जमींदारों की शान में कसीदे पढ़े जाते थे। मौजूदा समय में इन भवनों की दशा जर्जर हो गई है। जय किसान इंटर कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य चंद्रप्रकाश श्रीवास्तव कहते हैं कि इतिहास के साक्षी रहे भवनों को सुरक्षित और संरक्षित करने का काम हो रहा है, पर जिले में ऐतिहासिक हवेलियों पर किसी की नजर नहीं है।

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