इस जिले के शख्स को भारतेंदु जी ने दिया था महाकवि की उपाधि, ऐसी थी उनकी कहानी
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आज से करीब डेढ़ सौ साल पूर्व संतकबीरनगर जिले के नगर पंचायत हरिहरपुर में जन्में ब्रजभाषा के काव्य रचनाकार कवि रंगपाल को उनकी उत्कृष्ट रचना के चलते हिंदी साहित्य के पुरोधा भारतेंदु हरिश्चंद जी ने उन्हें महाकवि की उपाधि से अलंकृत किया था।
यूं तो कवि रंगपाल की कालजयी रचनाएं देशभक्ति और वीरों की अनेक गाथा समेटे हुए हैं फिर भी उनकी फाग बिधा के गीतों की लोकप्रियता अपने देश में ही नहीं विदेशों में रह रहे पूर्वांचल के हिंदीभाषी लोगों को अपनी मिट्टी का एहसास कराते हैं।
कवि रंगपाल रीति कालीन परंपरा के पोषक आश्रयदाता कवियों में गिने जाते हैं। उनकी फाग रचनाओं में जहां श्रृंगार रस की प्रधानता है तो वहीं देशभक्ति के गीतों में वीर रस का समावेश है। उनके देशभक्ति के गीतों में महान सपूतों और वीरांगनाओं की वीरता का रोमांचक वर्णन है।
कवि रंगपाल का जन्म सन् 1864 में नगर पंचायत हरिहरपुर में हुआ था। कवि के बचपन का नाम रंग नारायण पाल जूदेव था। उनके पिता विश्वेश्वर बक्श पाल जमींदार थे। माता सुशीला देवी संस्कृत और हिंदी की विद्वान थीं। कवि पर अपनी माता का प्रभाव गहरा था। वही उनके बचपन की गुरु थीं।
कवि की रचनाओं में देशभक्ति के गीत भी शामिल
आगे कवि ने स्वाध्याय से अपनी उर्जा गीत की रचना करने में लगा दी। उन्होंने दर्जन भर से अधिक काव्य संग्रह लिखे। हालांकि कई पुस्तकें आज तक प्रकाशित नहीं हो सकी। सन् 1936 में कवि अपनी कालजयी रचनाओं को लोगों को समर्पित कर दुनिया से विदा ले लिया। लेकिन आज भी फागुन मास में जब गायक फाग गीतों की सुरलहरियां छेड़ते हैं। तो कवि की रचनाएं रंगो की फुहार बनकर श्रोताओं पर बरसने लगती हैं।
लोग कवि रंगपाल को फाग कवि के नाम से ही ज्यादा जानते हैं। लेकिन फाग गीतों के बावजूद उन्होने देशभक्ति, खेमटा, दादरा, कजरी, सोहर, तितला, ठुमरी, झपताल आदि गीतों की भी रचना की है। कवि का पूरा जीवन उस समय बीता जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था।
इसलिए कवि के गीतों में गुलामी की टींस दिखाई देती है। उनकी रचनाओं में छत्रसाल की वीरता और महारानी पद्मावत की वीरगाथा है। देशभक्ति की रचनाओं में ....मौलमणि सब देशों का हिंद। इस गीत में देश के सौंदर्य का बड़ा मनोरम वर्णन है।
हरिहरपुर में रंगपाल के समकालीन कवि
हर साल बीस फरवरी को नगर में मनाई जाती है कवि की जयंती
कवि रंगपाल की जयंती हर साल बीस फरवरी को मनाई जाती है। पाल सेवा संस्थान द्वारा आयोजित कवि की जयंती पर दूर दराज से आए गायक कवि के लिखे फाग के राग से समां बांध देते हैं। पाल सेवा संस्थान के अध्यक्ष व पूर्व चेयरमैन बृजेश पाल की अगुआई में दिनभर कवि के गीतों का लोग आनंद उठाते हैं।
कवि की रचनाएं जो नहीं हो सकी प्रकाशित
डाक्टर मुनिलाल उपाध्याय "सरस" के अनुसार कवि रंगपाल रीति कालीन परंपरा के पोषक कवि थे । उनकी रचनाओं में रीतिबद्ध श्रंगार और श्रंगारबद्ध भक्ति का प्रयोग है । उनकी प्रकाशित रचनाओं में अंगादर्श,रसिकानंद,सज्जनानंद,प्रेम लतिका,शांत रसार्णव,रंग उमंग,गीत सुधानिधि आदि हैं । उनकी कई रचनाएं आज तक प्रकाशित नहीं हुई जिनमें रंग महोदधि,ऋतु रहस्य,नीति चंद्रिका,छत्रपति शिवाजी,वीर विरूद,गो दुर्दशा,दोहावली,दर्पण,खगनामा,फूलनामा मित्तू विरह आदि हैं।