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कोरोना से जंग: बेचैनी और नींद की समस्या से जूझ रहे कोविड मरीज, संक्रमितों का मनोबल बढ़ा रही ये खास टीम

Mon, 10 May 2021 01:16 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Mon, 10 May 2021 01:16 PM IST
सार

अस्पतालों में भर्ती हो रहे मरीज बेचैनी, अकेलापन, नींद न आना, मृत्यु का भय सताने जैसी मानसिक समस्याओं से ग्रस्त हो रहे हैं। अस्पताल में लंबे समय तक परिजनों से दूर रहने, दूसरे बेड पर पड़े मरीज की हालत बिगड़ने या मृत्यु होने आदि पर इन रोगियों की मन:स्थिति पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। 

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Special team of psychiatrists boosting morale of Covid patients in BRD medical college Gorakhpur
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

कोरोना संक्रमण के कारण अस्पतालों में भर्ती हो रहे मरीज बेचैनी, अकेलापन, नींद न आना, मृत्यु का भय सताने जैसी मानसिक समस्याओं से ग्रस्त हो रहे हैं। अस्पताल में लंबे समय तक परिजनों से दूर रहने, दूसरे बेड पर पड़े मरीज की हालत बिगड़ने या मृत्यु होने आदि पर इन रोगियों की मन:स्थिति पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। मरीजों को इससे उबारने के लिए और उन्हें मानसिक रूप से स्वस्थ रखने के लिए उनकी काउंसलिंग भी की जा रही है।
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बीआरडी मेडिकल कॉलेज के 300 बेड के कोरोना अस्पताल में ऐसे मरीजों की काउंसलिंग के लिए मानसिक रोग विभाग की एक टीम भी लगी हुई है। विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अमिल हयात खान बताते हैं कि कोविड अस्पताल में भर्ती मरीज की बीमारी की गंभीरता के आधार पर इसे तीन वर्गों में बांटा गया है। पहले वर्ग में वे मरीज हैं, जिन्हें सर्दी, बुखार, खांसी के साथ सांस लेने में दिक्कत हो रही है और ब्लड ऑक्सीजन कम है। ऑक्सीजन देने पर इनकी हालत स्थिर है। 
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दूसरे प्रकार के मरीज वे हैं, जिन्हें इन दिक्कतों के अलावा ऑक्सीजन देने पर भी ब्लड ऑक्सीजन का स्तर नहीं सुधर रहा है। ऐसे मरीजों को वेंटिलेटर पर भेजा जा सकता है। तीसरे मरीज वे हैं, जो वेंटिलेटर पर हैं। तीनों ही तरह के मरीजों में मानसिक समस्याएं देखी जा रही हैं। हर वर्ग के मरीज में नींद न आना, अकेलापन, चिंता और घबराहट के लक्षण हैं।
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भय और आशंका में रहते हैं अधिकतर मरीज

प्रो. एएच खान बताते हैं कि कोरोना अस्पताल में भर्ती मरीज लंबे समय तक परिजनों से दूर रहता है। ऐसे में उसे परिवार वालों की यादें बेचैन करती हैं। ऑक्सीजन, दवाएं आदि लगी होने के कारण मरीज  बेड पर ज्यादा हिलडुल नहीं पाता। उठ-बैठ भी नहीं पाता तो वह घबराहट और बेचैनी का सामना करता है। अगल-बगल के बेड के मरीज की हालत बिगड़ने पर उसके आसपास के मरीज भी भयग्रस्त होकर, अस्थायी रूप से अवसाद में आ जाते हैं। किसी मरीज की मृत्यु होने पर वार्ड के अधिकतर मरीज भी देर सबेर मौत होने के डर से तनाव, घबराहट और बेचैनी महसूस करते हैं। अस्पताल में भर्ती होने वाले लगभग सभी मरीजों में नींद न आने की समस्या आम है।

ऐसे बढ़ाते हैं मनोबल
डॉ. एएच खान बताते हैं कि तनाव, घबराहट, चिंता आदि होने के कारण मरीज को रिकवर होने में ज्यादा समय लग सकता है। मरीजों को इस स्थिति से उबारने के लिए मानसिक रोग विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रभात अग्रवाल और डॉ. दीपा लगातार काउंसलिंग करते हैं। टीम इन मरीजों से व्यक्तिगत रूप से मिलती है। मरीज को उसकी सेहत में होने वाले सुधार के बारे में बताया जाता है। अधिकतर मरीज अपनी हालत जानने को उत्सुक रहते हैं, उन्हें पिछली जांच और नई जांच के बीच होने वाले फायदों की जानकारी दी जाती है।

बताया जाता है कि उनके भाई, बेटे, मां, बहन आदि हालचाल पूछने आए थे। वह लोग आपके स्वस्थ होने पर घर लौटने का इंतजार कर रहे हैं। किसी मरीज की मृत्यु होने पर अन्य मरीज भयभीत हो जाते हैं। उन्हें बताया जाता है कि जिसकी मृत्यु हुई उसमें जो समस्याएं हुई थीं, वह आपमें नहीं हैं। आपकी रिपोर्ट बेहतर होती जा रही है। उनका अकेलापन दूर करने के लिए दिन में कई बार जाकर हाल-चाल लिया जाता है। उनकी इच्छा पूछी जाती है और खुश रहने के लिए प्रेरित किया जाता है।

वेंटिलेटर के मरीजों का रखा जाता है ज्यादा ध्यान
डॉ. एएच खान ने बताया कि वेंटिलेटर से लौटे मरीजों में नींद न आना और घबराहट की ज्यादा शिकायत रहती है। ऐसे मरीजों को यह भय रहता है कि कहीं दोबारा उस स्थिति से न गुजरना पड़े। ऐसे मरीजों को ठीक होने के बाद भी तीन से पांच दिन ऑब्जर्वेशन में रखा जाता है। काउंसलिंग के साथ ही जरूरत पड़ने पर प्रशांतक दवाएं (ट्रैंक्विलाइजर) देकर उन्हें मानसिक शांति देने का प्रयास किया जाता है।
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