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इस वजह से आंदोलन में कूदे थे शहीद अब्दुल्लाह, जानिए क्या है इनकी चूड़ी बेचने से विद्रोही बनने तक की कहानी

Thu, 04 Feb 2021 12:33 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Thu, 04 Feb 2021 12:33 PM IST
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special struggle story of Shaheed Abdullah in chauri chaura kand
चौरीचौरा शताब्दी समारोह - फोटो : अमर उजाला।
चौरीचौरा घटना में शहीद हुए राजधानी गांव निवासी क्रांतिकारी अब्दुल्लाह के जीवन संघर्ष को नाटक के जरिये उकेरा गया। बताया गया कि कैसे टोकरी में कांच की चूड़ियां लेकर गांव-गांव बेचने वाले अब्दुल्लाह विद्रोही हो गए। जब उन्हें फांसी दी गई तो उनके बेटे की उम्र करीब चार साल थी। पत्नी को आंखों से दिखाई नहीं देता था। पत्नी के तमाम प्रयासों के बावजूद उनके शव को गांव नहीं लाया जा सका था।
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नाटक में दिखाया गया कि गांव-गांव चूड़ी बेचकर परिवार पालने वाले अब्दुल्लाह कैसे आजादी के आंदोलन से प्रभावित हुए और इसमें शामिल हो गए। असहयोग आंदोलन की चर्चा हुई तो वह फरवरी 1921 में महात्मा गांधी का भाषण सुनने भगवान अहीर, विक्रम और नजर अली के साथ गोरखपुर गए थे। इसके बाद पत्नी तीलिया और करीब तीन साल के बेटे रसूल को छोड़कर अहमदाबाद कमाने चले गए।
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दिसंबर 1921 में अहमदाबाद के कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने स्वयं सेवक के रूप में काम किया। अधिवेशन में हुई चर्चा से काफी प्रभावित हो गए। यहीं पर उन्हें रूसी क्रांति और मजदूरों-किसानों के राज्य की स्थापना की जानकारी मिली। इसके बाद मजदूर-किसान के राज का स्वप्न लिए अब्दुल्लाह अपने गांव आ गए।
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गांव आने के बाद अब्दुल्लाह विक्रम अहीर, भगवान अहीर और कोमल पहलवान के संपर्क में आकर आजादी के आंदोलन में सक्रिय हो गए। अब्दुल्लाह और कोमल की अपने इलाके के जमींदारों से अदावत थी। यह सामंतों के उत्पीड़न के शिकार थे। लाल मोहम्मद, नजर अली, भगवान अहीर सबसे पहले नेशनल कार्यकर्ता बन गए। राजधानी मंडल के अध्यक्ष अब्दुल्लाह थे।

13 जनवरी 1922 को डूमरी खुर्द में मंडल स्थापना के बाद दूसरी मीटिंग चार फरवरी को होनी थी। भगवान अहीर की थानेदार गुप्तेश्वर सिंह से पिटाई के बाद स्वयंसेवक आहत थे। चार फरवरी को दोपहर एक बजे किसानों के नेतृत्व में दो हजार से ज्यादा गांव वालों ने थाने को घेर लिया। ब्रिटिश सत्ता के लंबे अपमान और उत्पीड़न की प्रतिक्रिया में उन्होंने थाना भवन में आग लगा दी, जिसमें 24 सिपाही जल कर मर गए। इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत ने जबरदस्त दमन और उत्पीड़न शुरू किया और एक-एक करके सभी विद्रोही गिरफ्तार हुए।

अदालती कार्यवाही के बाद 19 आंदोलनकारियों को सजा-ए-मौत के बाद विभिन्न जेलों में फांसी दी गई। तमाम को विभिन्न तरह की सजाएं हुईं। मुकदमा अब्दुल्लाह व अन्य बनाम ब्रिटिश हुकूमत के नाम से चला। अब्दुल्लाह की गिरफ्तारी के समय उनके बेटे रसूल की उम्र 4-5 साल की थी। पत्नी तीलिया की आंखों की रोशनी धीरे-धीरे चली गई। उनका और घर परिवार का जबरदस्त उत्पीड़न हुआ।

अब्दुल्लाह की फांसी बाराबंकी के जिला कारागार में तीन जुलाई 1923 को प्रात: छह बजे हुई थी। फांसी के बाद तीलियां बाराबंकी गईं थीं, लेकिन शहीद पति की लाश गांव नहीं ला सकीं। नाटक में ऐसे मार्मिक दृश्य देखकर लोगों की आंखों में आंसू आ गए।
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