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गोरखपुर विश्वविद्यालय का कमरा नंबर 100 था खास, इसके लिए चली थीं गोलियां, एक को जिंदा जला दिया गया
Sun, 07 Jun 2020 08:34 AM IST
vivek shukla
राजन राय, गोरखपुर।
राजन राय, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Sun, 07 Jun 2020 08:34 AM IST
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DDU Gorakhpur
- फोटो : अमर उजाला
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गोविवि के संतकबीर हॉस्टल का कमरा नंबर 100, यहां रहने के लिए चलती थीं गोलियां रहने वाला खुद को प्रभावशाली मानता था। इस कमरे के आवंटन को लेकर जमकर मारामारी होती थी। गोलियां भी चलीं और बंटू सिंह छात्रनेता को जिंदा जला भी दिया गया था। बाद में विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस हॉस्टल के कमरों का नंबर ही बदलवा दिया। तब जाकर हॉस्टल में गुंडागर्दी बंद हुई।
1970 से 1990 तक यह हॉस्टल पढ़ने वाले छात्रों के लिए काफी मुफीद था। लेकिन इसके बाद यहां अपराधियों का जमावड़ा होने लगा। 100 नंबर कमरा अंक के लिहाज से वीआईपी था। इसमें रहने वाले की अलग पहचान होती थी। हॉस्टल में आए दिन गोलियां चलती थीं। कई बार पुलिस ने छापा भी मारा।
इसी हॉस्टल कमरा नंबर 100 में आशु सिंह रहता थीं, जिसकी हत्या कर दी गई थी। बाद में छात्रनेता सत्यपाल सिंह ने अपने सहयोगी बंटू सिंह को दिला दिया। बंटू सिंह और छात्रनेता राजकपूर राय से अदावत हो गई। 2008 में बंटू सिंह को 100 नंबर में ही जला दिया गया।
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इसी वजह से सत्यपाल की भी हत्या हो गई। तत्कालीन छात्रसंघ महामंत्री नीरज शाही कहते हैं, उस कमरे को लेकर लोग भयभीत रहते थे। आगजनी की घटना के बाद यह कमरा सील कर दिया गया। कई साल बाद सभी कमरों का नंबर बदल दिया गया। तब जाकर 100 नंबर के वर्चस्व की जंग समाप्त हुई।
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1970 से 1990 तक यह हॉस्टल पढ़ने वाले छात्रों के लिए काफी मुफीद था। लेकिन इसके बाद यहां अपराधियों का जमावड़ा होने लगा। 100 नंबर कमरा अंक के लिहाज से वीआईपी था। इसमें रहने वाले की अलग पहचान होती थी। हॉस्टल में आए दिन गोलियां चलती थीं। कई बार पुलिस ने छापा भी मारा।
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इसी हॉस्टल कमरा नंबर 100 में आशु सिंह रहता थीं, जिसकी हत्या कर दी गई थी। बाद में छात्रनेता सत्यपाल सिंह ने अपने सहयोगी बंटू सिंह को दिला दिया। बंटू सिंह और छात्रनेता राजकपूर राय से अदावत हो गई। 2008 में बंटू सिंह को 100 नंबर में ही जला दिया गया।
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इसी वजह से सत्यपाल की भी हत्या हो गई। तत्कालीन छात्रसंघ महामंत्री नीरज शाही कहते हैं, उस कमरे को लेकर लोग भयभीत रहते थे। आगजनी की घटना के बाद यह कमरा सील कर दिया गया। कई साल बाद सभी कमरों का नंबर बदल दिया गया। तब जाकर 100 नंबर के वर्चस्व की जंग समाप्त हुई।