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इसे कहते हैं गोरखपुर शहर का 'अमीनाबाद', यहां पढ़िए इसका पूरा इतिहास
Wed, 17 Jun 2020 09:13 AM IST
vivek shukla
अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर।
अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Wed, 17 Jun 2020 09:13 AM IST
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शाहमारूफ मजार।
- फोटो : अमर उजाला।
गोरखपुर शहर के प्राचीन मोहल्लों की बात करें तो उनमें शाहमारूफ को सबसे पुराने मोहल्लों में शुमार किया जाता है। इसकी पहचान एक बाजार के रूप में ज्यादा है। रमजान माह के आखिरी दस दिनों में यहां लगने वाला ईद का बाजार इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाता है।
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उस इस समय इसे लोग शहर का अमीनाबाद कहते हैं। यहां ईद-उल-अजहा पर्व के दौरान कुर्बानी के जानवरों का बाजार भी सजता है। इस बाजार में जरुरत की तमाम चीजें थोक व फुटकर दामों में बिकती हैं। यहां कई तारीखी मजारें और मस्जिदें हैं। यहां मुसाफिरों के ठहरने के लिए अलहेरा मुस्लिम मुसाफिर खाना भी है।
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ऐसे पड़ा शाहमारूफ का नाम
शाहमारूफ मोहल्ले के नाम का ताल्लुक एक सूफी संत हजरत सैयद शाह मारूफ अलैहिर्रहमां के नाम से है। इन्ही के नाम पर इस मोहल्लों का नाम पड़ा। सूफी वहीदुल हसन की किताब 'मसायख-ए-गोरखपुर' के पेज संख्या 33, 34 व 35 पर हजरत सैयद शाह मारूफ अलैहिर्रहमां का जिक्र है। वह लिखते हैं कि इस शहर के मशहूर रईसों में रईस बुजुर्ग हजरत सैयद शाह मारूफ अलैहिर्रहमां भी गुजरे हैं। इनका खानदान अरब से आया था।
इनके पिता हजरत सैयद शाह अब्दुर्रहमान मुगल बादशाह मुअज्जम शाह के शासनकाल में गोरखपुर तशरीफ लाए और यहीं बस गए। अभी इनकी 33वीं पीढ़ी चल रही है। मोहल्ले का नाम उनकी शख्सियत की वजह से मशहूर है। उनकी कई चीजें आज भी यहां मौजूद हैं, जिनमें खिरका, रुमाल, पगड़ी, जुब्बा वगैरह के रुप में मौजूद हैं।
मनाया जाता है सालाना उर्स
उनका मजार मोहल्ला शाहमारूफ में है। हर साल उर्स-ए-पाक भी होता है। आपके खानदान की एक शाख मोहल्ला अलीनगर में भी आबाद है। हजरत सैयद शाह मारूफ के खानदान के बारे में मियां साहब सैयद अहमद अली शाह ने अपनी किताब 'महबूब उत तवारीख' में लिखा है।
इनके पिता हजरत सैयद शाह अब्दुर्रहमान मुगल बादशाह मुअज्जम शाह के शासनकाल में गोरखपुर तशरीफ लाए और यहीं बस गए। अभी इनकी 33वीं पीढ़ी चल रही है। मोहल्ले का नाम उनकी शख्सियत की वजह से मशहूर है। उनकी कई चीजें आज भी यहां मौजूद हैं, जिनमें खिरका, रुमाल, पगड़ी, जुब्बा वगैरह के रुप में मौजूद हैं।
मनाया जाता है सालाना उर्स
उनका मजार मोहल्ला शाहमारूफ में है। हर साल उर्स-ए-पाक भी होता है। आपके खानदान की एक शाख मोहल्ला अलीनगर में भी आबाद है। हजरत सैयद शाह मारूफ के खानदान के बारे में मियां साहब सैयद अहमद अली शाह ने अपनी किताब 'महबूब उत तवारीख' में लिखा है।