UP Nikay Chunav 2023: प्रत्याशी भी नहीं सहेज पाई सपा, कहीं टिकट के लिए रार, किसी ने लेने से किया इन्कार
भाजपा प्रत्याशी को छोड़ बाकी दलों या निर्दल के तौर पर भी किसी ने दावेदारी नहीं की है मगर, सपा प्रत्याशी का कदम खींच लेना ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है। यहां से भाजपा नेता छोटू सिंह की पत्नी पूनम सिंह का निर्विरोध निर्वाचन तय है जो कि नगर निगम के चुनाव में नया इतिहास भी बनने जा रहा है।
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निकाय चुनाव के लिए नामांकन की समय सीमा बीत जाने के बाद भी समाजवादी पार्टी में टिकट को लेकर मची घमासान जारी है। पार्टी कार्यालय और नेताओं-कार्यकर्ताओं के घरों से होते हुआ आरोप-प्रत्यारोप का दौर सोशल मीडिया पर शुरू हो गया रहा है। बाकायदा दावों को सच साबित करने के लिए साक्ष्य भी दिए जा रहे हैं। किसी वार्ड में टिकट के नाम पर मची रार जारी है तो किसी ने टिकट लेने से इन्कार कर दिया है। वहीं, वार्ड नंबर 80 में हुए खेल ने तो टिकट बंटवारे की व्यवस्था पर सवाल और गहरा दिया हैं।
टिकट मिलने के बाद भी पार्टी प्रत्याशी नम्रता सिंह ने नामांकन ही नहीं किया। यूं तो इस वार्ड से भाजपा प्रत्याशी को छोड़ बाकी दलों या निर्दल के तौर पर भी किसी ने दावेदारी नहीं की है मगर, सपा प्रत्याशी का कदम खींच लेना ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है। यहां से भाजपा नेता छोटू सिंह की पत्नी पूनम सिंह का निर्विरोध निर्वाचन तय है जो कि नगर निगम के चुनाव में नया इतिहास भी बनने जा रहा है।
ऐन मौके पर पार्टी प्रत्याशी नम्रता सिंह के हाथ खड़े कर नामांकन से पीछे हट जाने का मामला लखनऊ तक पहुंच गया है। कई पार्टी पदाधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। सोशल मीडिया पर पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं ने नम्रता की सदस्यता का कार्ड पोस्ट किया है। इसपर उनकी सदस्यता की तिथि, निकाय चुनाव के लिए नामांकन शुरू होने से सिर्फ दो दिन पहले यानी नौ अप्रैल दर्ज है।
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सवाल किए जा रहे हैं कि वार्ड से पुराने सक्रिय कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज कर महज दो दिन पहले पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने वाले पर इतनी मेहरबानी क्यों? सोशल मीडिया के जरिए निवर्तमान महानगर अध्यक्ष पर आरोपों की झड़ी तो लग ही रही है, अब इस कहानी से जिलाध्यक्ष भी लपेटे में आ रहे हैं।
भद पिटने का सिलसिला यही नहीं थमा। वार्ड नंबर 69 श्रीराम चौक से पार्टी प्रत्याशी घोषित की गईं सपा व्यापारी नेता दिनेश गुप्ता की पत्नी लाली गुप्ता, पार्टी पदाधिकारियों की मनमानी से इतनी आहत हुईं कि उन्होंने सिंबल लेने के बाद भी रविवार को निर्दल प्रत्याशी के तौर पर नामांकन किया।
उनके पति दिनेश गुप्ता का कहना है कि शीर्ष नेतृत्व की तरफ से सिंबल जारी किए जाने के बाद भी जिले के पदाधिकारियों ने सिंबल के नाम पर उन्हें इतना दौड़ाया कि अब पार्टी के प्रति उनकी भावना ही बदल गई। यही वजह रही कि बाद में सिंबल मिलने के बाद भी आहत होकर उन्होंने पत्नी का पर्चा, निर्दल प्रत्याशी के तौर पर दाखिल कराया। उन्होंने इसकी शिकायत शीर्ष नेतृत्व से भी की है।
जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में भी प्रत्याशी नहीं सहेज सकी थी सपा
करीब डेढ़ साल पहले ही संपन्न हुए ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में पार्टी खुद के प्रत्याशी तक नहीं सहेज सकी थी और औंधे मुंह गिर गई। पार्टी ने जिसे प्रत्याशी घोषित किया वह दो दिन पहले ही मोबाइल स्वीच ऑफ कर नदारद हो गया और तलाशने के बाद भी नहीं मिला। आरोप लगे थे कि एक पदाधिकारी के जरिए रुपये की डील हो गई और उसने कदम पीछे कर लिए थे। पार्टी ने नामांकन के आखिरी दिन जिसे आनन-फानन में दोबारा प्रत्याशी घोषित किया, उसे भी वह पर्चा ही नहीं दाखिल करा सकी और भाजपा प्रत्याशी साधना सिंह निर्विरोध निर्वाचित हो गईं।
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सपा नेता दिनेश गुप्ता ने कहा कि मैं पार्टी का पुराना कार्यकर्ता हूं। मेरी, सक्रियता, निष्ठा को देखते हुए ही शीर्ष नेतृत्व ने वार्ड नंबर 69 श्रीराम चौक से मेरी पत्नी लाली गुप्ता को प्रत्याशी घोषित किया। रविवार को ही सिंबल आ गए मगर मुझे दौड़ाया जाता रहा। रात 11 मुझे फोन आया कि आकर अपना सिंबल ले जाइए। साथ ही बुलेटिन मेंबर, सक्रिय सदस्यता, वोटर लिस्ट की कॉपी भी लेते आइए।
कहा कि मैं क्षेत्र में प्रचार-प्रसार में जुटा था। आग्रह किया कि सिंबल अभी दे दीजिए, सुबह सारी औपचारिकता पूरी कर दूंगा। मैं पार्टी से कबसे जुड़ा हूं, यह किसी से छिपा नहीं है। बावजूद इसके मुझे परेशान किया गया। अगले दिन सुबह मुझे सिंबल दिया गया मगर मैं इतना आहत हो चुका था कि मैंने उसका इस्तेमाल नहीं किया और अपनी पत्नी से निर्दल प्रत्याशी के तौर पर पर्चा भराया।
एक दौर वह था, तमाम कसौटियों पर कसे जाने के बाद तय होते थे उम्मीदवार
सपा के पूर्व मंत्री डॉ. मोहसिन खान ने कहा कि एक कहावत है। मनोबल और इच्छा शक्ति ऊंची हो तो बंदूक वाले को भी चइला (लकड़ी के छोटे से टुकड़े) से खदेड़ा जा सकता है। 1993 में मैं विधायक रहा। मंत्री बना। 1996 और 2014-15 में दो-दो बार जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली है। 1996 में पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव के आह्वान पर 37 दिन तक यहां जेल भरो आंदोलन चला था। मैं ही नहीं बाकी साथी कार्यकर्ता भी दौड़कर जाते थे गिरफ्तारी देने। लाठियां खाने से कभी गुरेज नहीं की। कई बार लाठी खाकर अस्पताल गए।
कहा कि अब इस मनोबल या इच्छा शक्ति का पार्टी में अभाव दिखता है। आज तो गेट पर ही गिरफ्तारी हो जा रही है। तमाम कसौटियों पर कसे जाने के बाद टिकट या किसी पद की जिम्मेदारी मिलती थी। नारे लगते थे। एक पैर रेल में एक जेल में। प्रदेश में कहीं भी आंदोलन होता था हम हिस्सा लेते थे। सक्रियता, निष्ठा, ईमानदारी के पैमाने पर टिकट मिलता था। अब तो टिकट के लिए कई तरह के गुणा-भाग लगाए जा रहे हैं। पार्टी नेता-कार्यकर्ता आपस में भिड़ जा रहे। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। यह ठीक नहीं हैं। दु:ख होता है।
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सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष चंद्रबली यादव ने कहा कि हमारे समय में जितने वरिष्ठ नेता होते थे, सभी को बैठाकर सहमति से टिकट का बंटवारा होता था। कई तरह के मानक थे, जिन्हें पूरा करने के बाद ही टिकट मिल पाता था। किसी भी पद पर चयन के लिए भी पार्टी की कसौटियों पर खरा उतरना पड़ता था। अब ऐसा नहीं है। एक-दो दिन पहले सदस्यता ग्रहण करने वालों को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल जा रही है। निकाय चुनाव में चल रहे आरोप -प्रत्यारोप और बिना लड़ाई के ही किसी वार्ड में दूसरे को जीत समर्पित कर देने की घटनाओं से एक बात तो तय है कि हमारी तैयारी में कहीं न कहीं कमी है। जो पर्चा भर रहे हैं, उन्हें कौन ले आया, कब उनकी सदस्यता हुई, ऐसे कई मूल सवालों के जवाब को तलाशे जाने जरूरी हैं।
कहा कि वर्ष 2004 से 2007 तक जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा चुका हूं। पहले पार्टी की रीति और नीति से काम होता था। अब काफी कुछ बदल गया है, जो ठीक नहीं है। किसी वार्ड में टिकट के लिए मार मची है तो कोई टिकट ही लौटा दे रहा है। जिसे मिल रहा, वह नामांकन नहीं कर रहा। एक वार्ड में तो सुबह किसी और को और शाम को किसी और को सिंबल दे दिया गया। नतीजतन पर्चों की जांच में एक प्रत्याशी निर्दल हो गया। ये सभी घटनाएं बताती हैं कि कहीं न कहीं योजनाएं बनाने में चूक हुई है।