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Gorakhpur News: होली को खास बनाएगा सिंधी घीयर और कराची समोसा
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घीयर मिठाई।
सिंधी समाज धूमधाम से मनाता है होली का त्योहार
इस बार भी तैयारियों में जुटे हैं समाज के लोग
संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। बंटवारे के बाद पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भारत आए सिंधी समाज ने आज भी अपनी रीति-रिवाज को बचाए रखा है। इनके त्योहार मनाने के तरीकों में आज भी सिंध की झलक नजर आती है। होली करीब है, ऐसे में सिंधी समाज अब होली की तैयारियों में जुट गया है। इस बार सिंधी समाज घीयर और कराची हलवा से बने मीठे समोसे का जायका लेते हुए धूमधाम से होली मनाने की तैयारी में है।
रंग-गुलाल और उमंग के साथ सिंधी समाज भी होली पर्व मनाता है, लेकिन इस समाज ने आज भी सादगी के साथ-साथ सिंध की सभ्यता और परंपरा को कायम रखा है। इनके घरों में होली के दिन विशेष पकवान बनते हैं। इनमें सबसे खास है घीयर और कराची के हलवे का मीठा समोसा।
जटाशंकर निवासी विक्की कुकरेजा ने बताया कि सिंध से बहुत पहले हमारे पूर्वज भारत आए थे, लेकिन सिंधी समाज ने अभी भी अपनी भाषा और सभ्यता को बरकरार रखा है। होली पर सुबह होलिका पूजन के समय पहिंजे शहर जे गुलशन में, ईदों आ होली जो त्योहार.. जैसे पारंपरिक गाने गाते हैं। एक-दूसरे से गले मिलकर होली मनाते हैं। महिलाएं घरों में सिंधी पकवान बनाती हैं। दिन में होली खेलने के बाद शाम को नए कपड़े पहन एक दूसरे के घर जाकर एक दूसरे को बधाई देते हैं।
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साल में सिर्फ एक बार मिलता घीयर व समोसा
सिंधी मिठाई विक्रेता संतोष केशवानी ने बताया कि होली पर कई घरों में तो विशेष रूप से घीयर बनाया जाता है। अब शहर में मिठाई की दुकानों पर भी इसे बनाया जाता है। घीयर मिठाई जलेबी की तरह होती है, लेकिन यह उससे बड़ी और स्वाद में अलग होती है। वहीं कराची हलवा भर मीठा समोसा तैयार किया जाता है। ये दोनों मिठाई साल में सिर्फ एक बार होली पर ही बनाई जाती है।
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साल भर रहता है इस दिन का इंतजार
सिंधी परिवारों में होली का इंतजार रहता है। बच्चे हों या बड़े, एक साथ पूरा परिवार होली मनाता है। घर में विशेष घीयर और कराची के हलवे से समोसा तैयार होता है। इस खास मिठाई को लेकर भी सबको इंतजार रहता है।
- कविता नेभानी, सूर्यकुंड
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त्योहार से मिलता है संस्कार
त्योहार हमें अपनी संस्कृति व सभ्यता से जोड़े रखते हैं। होली के दिन सभी लोग अपने सगे संबंधियों और रिश्तेदारों के घर जाते हैं। इसी बहाने रिश्तों की डोर मजबूत होती है। इसलिए हम इस दिन का विशेष तौर पर आनंद लेते हैं।
- पायल कुकरेजा, जटाशंकर
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इस बार भी तैयारियों में जुटे हैं समाज के लोग
संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। बंटवारे के बाद पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भारत आए सिंधी समाज ने आज भी अपनी रीति-रिवाज को बचाए रखा है। इनके त्योहार मनाने के तरीकों में आज भी सिंध की झलक नजर आती है। होली करीब है, ऐसे में सिंधी समाज अब होली की तैयारियों में जुट गया है। इस बार सिंधी समाज घीयर और कराची हलवा से बने मीठे समोसे का जायका लेते हुए धूमधाम से होली मनाने की तैयारी में है।
रंग-गुलाल और उमंग के साथ सिंधी समाज भी होली पर्व मनाता है, लेकिन इस समाज ने आज भी सादगी के साथ-साथ सिंध की सभ्यता और परंपरा को कायम रखा है। इनके घरों में होली के दिन विशेष पकवान बनते हैं। इनमें सबसे खास है घीयर और कराची के हलवे का मीठा समोसा।
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जटाशंकर निवासी विक्की कुकरेजा ने बताया कि सिंध से बहुत पहले हमारे पूर्वज भारत आए थे, लेकिन सिंधी समाज ने अभी भी अपनी भाषा और सभ्यता को बरकरार रखा है। होली पर सुबह होलिका पूजन के समय पहिंजे शहर जे गुलशन में, ईदों आ होली जो त्योहार.. जैसे पारंपरिक गाने गाते हैं। एक-दूसरे से गले मिलकर होली मनाते हैं। महिलाएं घरों में सिंधी पकवान बनाती हैं। दिन में होली खेलने के बाद शाम को नए कपड़े पहन एक दूसरे के घर जाकर एक दूसरे को बधाई देते हैं।
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साल में सिर्फ एक बार मिलता घीयर व समोसा
सिंधी मिठाई विक्रेता संतोष केशवानी ने बताया कि होली पर कई घरों में तो विशेष रूप से घीयर बनाया जाता है। अब शहर में मिठाई की दुकानों पर भी इसे बनाया जाता है। घीयर मिठाई जलेबी की तरह होती है, लेकिन यह उससे बड़ी और स्वाद में अलग होती है। वहीं कराची हलवा भर मीठा समोसा तैयार किया जाता है। ये दोनों मिठाई साल में सिर्फ एक बार होली पर ही बनाई जाती है।
साल भर रहता है इस दिन का इंतजार
सिंधी परिवारों में होली का इंतजार रहता है। बच्चे हों या बड़े, एक साथ पूरा परिवार होली मनाता है। घर में विशेष घीयर और कराची के हलवे से समोसा तैयार होता है। इस खास मिठाई को लेकर भी सबको इंतजार रहता है।
- कविता नेभानी, सूर्यकुंड
त्योहार से मिलता है संस्कार
त्योहार हमें अपनी संस्कृति व सभ्यता से जोड़े रखते हैं। होली के दिन सभी लोग अपने सगे संबंधियों और रिश्तेदारों के घर जाते हैं। इसी बहाने रिश्तों की डोर मजबूत होती है। इसलिए हम इस दिन का विशेष तौर पर आनंद लेते हैं।
- पायल कुकरेजा, जटाशंकर