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शॉकवेव: बाईपास सर्जरी के बाद राहत मिलने में लगता है लंबा समय, खर्च कुछ ज्यादा मगर तकलीफ और खतरे बहुत कम

Wed, 28 Jun 2023 05:51 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Wed, 28 Jun 2023 05:51 PM IST
सार

70 से 80 फीसदी गंभीर मरीजों को शॉकवेव इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक के जरिये कोरोनरी आर्टरी डिजीज के गंभीर मरीजों के कैल्शियम को तोड़ा जाता है। इसके बाद उसी तार के जरिये स्टेंट डाल दिया जाता है। इसके बाद ब्लॉकेज की आशंका महज 15 से 20 प्रतिशत ही रह जाती है।

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Shockwave takes a long time to get relief after bypass surgery
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल की धर्मनियों में जमे कैल्शियम को हटाने में इस्तेमाल शॉकवेव इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी अन्य तकनीकों से बेहतर है। जानकारों की मानें तो इसमें संक्रमण का खतरा न के बराबर है।

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राहत की बात यह है कि इसमें अगले दिन ही मरीज को घर जाने की सलाह दे दी जाती है। जबकि बाईपास सर्जरी में कई दिन अस्पताल में भर्ती करने के बाद महीनों आराम भी करना पड़ता है। संक्रमण का बड़ा खतरा भी रहता है।
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70 से 80 फीसदी गंभीर मरीजों को शॉकवेव इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक के जरिये कोरोनरी आर्टरी डिजीज के गंभीर मरीजों के कैल्शियम को तोड़ा जाता है। इसके बाद उसी तार के जरिये स्टेंट डाल दिया जाता है। इसके बाद ब्लॉकेज की आशंका महज 15 से 20 प्रतिशत ही रह जाती है।
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सामान्य तौर पर मरीज को तीन से पांच दिनों तक भर्ती करना पड़ता है। हालांकि, शॉकवेव तकनीक का खर्चा ज्यादा है। इसके फायदे भी कई हैं। लेकिन अन्य तकनीकों में लंबे इलाज, दवा और आराम में ठीकठाक हिसाब बन जाता है। बाईपास सर्जरी में मोटे खर्च के साथ संक्रमण का खतरा भी ज्यादा है।

 

बीआरडी मेडिकल कॉलेज के सुपर स्पेशियलिटी विभाग के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. कुणाल सिंह ने बताया कि शॉकवेव तकनीक को इसलिए बेहतर माना जाता है, क्योंकि इसमें मरीज को ज्यादा दर्द नहीं होता और न ही चीरा और टांका लगाना पड़ता है। बस मरीजों को एक हल्का झटका सहना होता है, जो ज्यादा दर्द नहीं देता।

बताया कि अक्सर देखा गया है कि मरीज के अर्टरी में बार-बार कैल्शियम (ब्लॉकेज) जमा हो जाता है और उसमें डाले गए स्टेंट (छल्ला) कैल्शियम के कारण टूट जाते हैं। ऐसे मरीजों को सीधे बाईपास सर्जरी करानी पड़ती है। इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। अगर बाईपास सर्जरी नहीं हुई तो मरीज की मौत तय है। लेकिन इस तकनीक ने इसे बेहद कम कर दिया है।


 

दो और तकनीक से तोड़े जाते हैं कैल्शियम

70 से 80 फीसदी गंभीर को ज्यादा दर्द मरीजों को शॉकवेव इंट्रावैस्कुलर लिथोट्रिप्सी तकनीक के जरिये कोरोनरी आर्टरी डिजीज के गंभीर मरीजों के कैल्शियम को तोड़ा जाता है। इसके बाद उसी तार के जरिये स्टेंट डाल दिया जाता है। इसके बाद ब्लॉकेज की आशंका महज 15 से 20 प्रतिशत ही रह जाती है।

डॉ. कुणाल सिंह ने बताया कि शॉकवेव के अलावा दो और तकनीक से कैल्शियम तोड़े जाते हैं। पहली लेजर एथरेक्टॉमी तकनीक है। इस तकनीक में धमनियों की दिवालों को क्षति पहुंचने की आशंका रहती है। इसी तरह रोटाब्लेशन तकनीक है। इसमें रोटाब्लेटर का उपयोग एक तरह की कैथेटर-आधारित आशंका प्रक्रिया में किया जाता है। इसमें दर्द ज्यादा होता है

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