फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Gorakhpur News ›   In Gorakhpur, Serious illness broke, daughter-in-law and daughters came forward as support

Gorakhpur News: गंभीर बीमारी ने तोड़ा, सहारा बन आगे आईं बहू-बेटियां; इनके लिए सेवा, धर्म और कर्म दोनों

Tue, 28 May 2024 11:44 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर Updated Tue, 28 May 2024 11:44 AM IST
विज्ञापन
In Gorakhpur, Serious illness broke, daughter-in-law and daughters came forward as support
शोध में सामने आया कि बहु और बेटी और बहनें, बेटों से ज्यादा सेवा कर रहीं (सांकेतिक फोटो) - फोटो : अमर उजाला
आज के इस आधुनिक युग में भी भारतीय परंपरा अपने जड़ से जुड़ी हुई है। यह हम नहीं कर रहे हैं बल्कि गोरखपुर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. गरिमा सिंह के केस स्टडी में यह तथ्य सिद्ध साबित हुआ है। परिवार में पति, सास या ससुर की गंभीर बीमारी के उपचार में परिवार टूट गया।
विज्ञापन


उनके घर जाने पर भी सेवा भाव जरूरी है। ऐसे में सर्वाधिक मामलों में बहू, बेटी और बहन उनकी सेवा करती मिलीं। लंबे समय से देखभाल के बाद भी उनके मन में पछतावा नहीं था। वह उनकी सेवा को अपने धर्म और कर्म से जोड़कर जोश के साथ सेवा में जुटी हुई हैं।
विज्ञापन


डॉ. गरिमा सिंह ने गंभीर बीमारी से ग्रसित ऐसे लोगों की केस स्टडी पर अध्ययन किया जो लंबे समय से ग्रसित होने के साथ घर पर उनका उपचार चल रहा है। इसमें मधुमेह, कैंसर, हृदय की बीमारी, गठिया, ब्लड प्रेसर, पार्किंसंस की बीमारी, माइग्रेन, थायराइड और स्पाइनल बोन टीबी आदि से ग्रसित लोगों को अपने अध्ययन में शामिल किया। ऐसे 60 मामलों पर अध्ययन कर पाया कि सर्वाधिक मामलों में बहू, पत्नी, बेटी, पोती, मां, बहन, ननद आदि के रूप में सेवा करती मिलीं।
विज्ञापन
विज्ञापन
मरीज तीमारदार केस
सास बहू 12
पति पत्नी 12
मां बेटी 11
दादी पोती 07
पिता बेटी 04
चाचा बेटी 03
दादा पोता 03
बेटी मां 02
चाचा भतीजा 02
बहन बहन 02
भाभी ननद 01
ससुर बहू 01


सहायक आचार्य मनोविज्ञान विभाग, डीडीयू डॉ गरिमा सिंह ने बताया कि पश्चिमी सभ्यता की अपेक्षा भारतीय संस्कृति की जड़ आज भी अपने धरातल से जुड़ी हुई हैं। जहां लंबी बीमारी के बाद लोग ऊब जाते हैं और उसे बोझ समझने लगते हैं, लेकिन अध्ययन में यह सामने आया कि रिश्ते की डोर से बंधे हमारे समाज के लोग उसे अपना धर्म मानते हुए अपने लिए उसे सेवा का अवसर मान पूरे मनोभाव से देखभाल में लगे हुए हैं।
- डॉ. गरिमा सिंह, सहायक आचार्य मनोविज्ञान विभाग, डीडीयू
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed