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लिटरेरी फेस्ट: ‘इसका, उसका, किसका मीडिया’ पर विमर्श पर वरिष्ठ पत्रकारों ने रखे विचार
Sun, 02 Feb 2020 09:10 PM IST
विजय जैन
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
Published by: विजय जैन
Updated Sun, 02 Feb 2020 09:10 PM IST
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गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट मीडिया विमर्श में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार व उपस्थित लोग।
- फोटो : अमर उजाला
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लिटरेरी फेस्ट के दूसरे दिन के चौथे सत्र में मीडिया विमर्श ‘इसका, उसका, किसका मीडिया’ विषय पर हुआ। मंच पर मौजूद वरिष्ठ पत्रकारों ने जब अपनी व्याख्याएं दीं तो चर्चा का तापमान शिखर पर जा पहुंचा।
वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने कहा कि ‘इसका’ से मतलब सत्ता है। ‘उसका’ से मतलब विपक्ष या टुकड़े-टुकड़े गैंग और ‘किसका’ पर मेरा जवाब है जनता से है। अंजुम ने कहा कि पत्रकारिता अब झुनझुने में बदलती जा रही है। यह झुनझुने की तरह बर्ताव भी कर रही है। यह प्रवृत्ति 2014 के बाद ही नहीं आई। पहले भी इस तरह के पक्षधर पत्रकारिता के किस्से सामने आते रहे हैं लेकिन मौजूदा दौर में यह तेज हुआ है। सरोकार और सरकार के बीच मात्राओं के फर्क को समझने की जरूरत है।
वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत ने कहा कि यह चलन और यह समय दोनों खतरनाक है लेकिन हमें समझना होगा कि यह एक तरफ गलती का मामला नहीं है। समर्थन और समर्पण में अंतर होना चाहिए और इसी तरह विरोध और वैमनस्य में भी। जितना खतरनाक समर्पण है उतना ही खतरनाक वैमनस्य भी है। इस समय विचारों की लड़ाई बहुत तेज है। हर पार्टी ने सोशल मीडिया में अपने फौजी उतार रखे हैं। ऐसे में जरूरी है कि पत्रकार अपने विवेक की आवाज सुने और इस समाज को बनाने में मदद करें।
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वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने कहा कि ‘इसका’ से मतलब सत्ता है। ‘उसका’ से मतलब विपक्ष या टुकड़े-टुकड़े गैंग और ‘किसका’ पर मेरा जवाब है जनता से है। अंजुम ने कहा कि पत्रकारिता अब झुनझुने में बदलती जा रही है। यह झुनझुने की तरह बर्ताव भी कर रही है। यह प्रवृत्ति 2014 के बाद ही नहीं आई। पहले भी इस तरह के पक्षधर पत्रकारिता के किस्से सामने आते रहे हैं लेकिन मौजूदा दौर में यह तेज हुआ है। सरोकार और सरकार के बीच मात्राओं के फर्क को समझने की जरूरत है।
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वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत ने कहा कि यह चलन और यह समय दोनों खतरनाक है लेकिन हमें समझना होगा कि यह एक तरफ गलती का मामला नहीं है। समर्थन और समर्पण में अंतर होना चाहिए और इसी तरह विरोध और वैमनस्य में भी। जितना खतरनाक समर्पण है उतना ही खतरनाक वैमनस्य भी है। इस समय विचारों की लड़ाई बहुत तेज है। हर पार्टी ने सोशल मीडिया में अपने फौजी उतार रखे हैं। ऐसे में जरूरी है कि पत्रकार अपने विवेक की आवाज सुने और इस समाज को बनाने में मदद करें।
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वरिष्ठ पत्रकार कुमार भवेश चंद्र ने कहा एक जमाने में लोग पत्रकारिता में इसलिए भी आते थे क्योंकि उनकी नजर में इससे भौकाल टाइट हो सकता था। यह भौकाल दरअसल समाज, सरकार और दुनिया को बदल देने की ताकत है जिसका हमें हमेशा ख्याल रखना चाहिए। इस समय यह सच है कि मीडिया को प्रभावित करने की लगातार कोशिश की जा रही हैं। यह दौर यकीनन मुश्किल है लेकिन अगर आप प्रभावित होने की जगह जनता को सुनने, समझने और उनकी आकांक्षाओं को स्थान देने का काम करते हैं तो आप पर भरोसा बढ़ेगा।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ योगेश मिश्र ने ढेरों उदाहरणों और वाकयों के जरिए यह कहने की कोशिश की कि असली खतरा भीतर से है। उन्होंने कहा पत्रकारिता जिस भय की बात कर रही है उस की वजह उसकी लालसाएं, अंदरूनी कमजोरियां और इच्छाएं हैं, जिसे आज का राजनीतिज्ञ बखूबी समझता है। खबरें सिर्फ जनता को ध्यान में रखकर लिखी जानी चाहिए।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ योगेश मिश्र ने ढेरों उदाहरणों और वाकयों के जरिए यह कहने की कोशिश की कि असली खतरा भीतर से है। उन्होंने कहा पत्रकारिता जिस भय की बात कर रही है उस की वजह उसकी लालसाएं, अंदरूनी कमजोरियां और इच्छाएं हैं, जिसे आज का राजनीतिज्ञ बखूबी समझता है। खबरें सिर्फ जनता को ध्यान में रखकर लिखी जानी चाहिए।