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Gorakhpur News: एम्स में झाइयों के मरीजों पर शोध शुरू

Mon, 29 May 2023 12:15 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 29 May 2023 12:15 AM IST
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Research on freckle patients started in AIIMS, samples taken for 85 freckle-afflicted girls and women
झाईं से 85 पीड़ित युवतियों और महिलाओं के लिए गए नमूने
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चर्म रोग और माइक्रोबायोलॉजिस्ट दोनों विभाग कर रहे मरीजों पर मिलकर शोध
कुल 206 युवतियों और महिलाओं के लिए जाएंगे नमूने
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। पूर्वांचल में झाइयों (हाईपर प्रिग्मेंटेशन) से परेशान युवतियों और महिलाओं के लिए राहत भरी खबर है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टर इस गंभीर बीमारी से निजात की तलाश में जुट गए हैं। इसके लिए एम्स ने झाईं से पीड़ित मरीजों पर शोध शुरू किया है। इसके तहत 85 झाईं पीड़ित युवतियों और महिलाओं के रक्त के नमूने लिए हैं। चर्म रोग विभाग की देखरेख में शुरू हुए नमूनों की जांच एम्स के माइक्रोबायोलॉजी विभाग ने शुरू कर दी है।
महिलाओं के चेहरे पर दाग और धब्बे तो किसी तरह मिट जाते हैं, लेकिन एक बार झाईं होने पर यह समस्या कई वर्षों तक रहती है, जो जल्दी ठीक नहीं होती है। इस तरह के मरीजों की संख्या चर्म रोग विशेषज्ञों के पास बढ़ती जा रही है। एम्स के चर्म रोग विभाग की ओपीडी में हर 10 में तीन से चार मरीज झाईं के इलाज के लिए आ रही हैं। इसे देखते हुए चर्म रोग विभाग ने शोध शुरू कर दिया है। एम्स के चर्म रोग विशेषज्ञ डॉ. सुनील कुमार गुप्ता ने बताया कि पूर्वांचल की महिलाओं में यह समस्या आम हो गई है। साइंस की भाषा में इस बीमारी को हाईपर प्रिग्मेंटेशन कहते हैं। इसके होने के कई कारण है। पहला कारण सूर्य की रोशनी में अल्ट्रारेज किरणें निकलती हैं, जो रंग बनाने वाली कोशिकाओं को बढ़ा देती है। इसके कारण चेहरे पर काले रंग का धब्बा बनने लगता है, जिसे झाई कहते हैं। दूसरा बड़ा प्रोजेस्ट्रोन हार्माेंस में बदलाव है। तीसरा कारण थायरायड भी है। लेकिन, पूर्वांचल में महिलाओं के चेहरे पर झाईं होने का बड़ा कारण मिलेनोसाइट इंडेक्शन ट्रांसफार्मिंग फैक्टर है। इसमें महिलाओं के जीन में बदलाव के कारण सबसे ज्यादा असर उनके चेहरों पर पड़ रहा है। शोध में यह जानने की कोशिश की जा रही है कि इन युवतियों और महिलाओं में जीन का स्तर कितना बढ़ा हुआ मिला है। इसी के अनुसार उन युवतियों और महिलाओं की दवाएं चलाई जाएंगी।
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दवा बंद करने पर फिर हो जाता है झाईं
डॉ. सुनील कुमार गुप्ता ने बताया कि झाईं की दवा है। इस पर अच्छी खासी रकम भी लोग खर्च करते हैं, लेकिन दवा बंद होने के बाद फिर से यह समस्या शुरू हो जाती है। रंग बनाने वाली कोशिकाएं और जीन में हो रहे बदलाव का असर दवा बंद करते ही अपना असर दिखाना शुरू कर देता है। शोध के बाद यह तय होगा कि किस तरह की दवा उनके चेहरे पर चलनी चाहिए, जिससे की दोबारा झाईं न हो।
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106 लोगों के और लिए जाएंगे नमूने
एम्स के माइक्रोबायोलॉजिस्ट विभागाध्यक्ष डॉ. शैलेंद्र द्विवेदी ने बताया कि 85 युवतियों और महिलाओं के रक्त के नमूने अभी लिए गए हैं। कुल 206 नमूने लेने हैं। इसमें 103 झाईं से पीड़ित और 103 सामान्य महिलाओं के रक्त के नमूने लिए जाएंगे। शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि इनमें हार्माेनल इनबैलेंस, जेनेटिक फैक्टर में बदलाव मिला है। अभी जांच चल रही है, तो अन्य तथ्य भी निकलकर सामने आएंगे।

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एम्स के डॉक्टर कई तरह के शोध कार्य कर रहे हैं। इसमें चर्म रोग विभाग भी शामिल है। डॉक्टरों ने कुछ नमूने लिए हैं, जिस पर काम चल रहा है। एक से दो माह के अंदर इसकी रिपोर्ट भी आ जाएगी। इसके बाद उसी अनुसार मरीजों को दवा दी जाएगी, जिससे की दोबारा उन्हें झाईं की समस्या न होने पाए।
डॉ. सुरेखा किशोर, निदेशक, एम्स
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