{"_id":"67e79f2403cc9ffa700dfe5b","slug":"preparations-for-chaitra-navratri-are-in-full-swing-in-gorakhpur-too-navratri-will-start-from-sunday-2025-03-29","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"चैत्र नवरात्र: गोरखपुर में भी तैयारियां जोरों पर, चैत्र नवरात्र रविवार से... हाथी पर होगा माता का आगमन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
चैत्र नवरात्र: गोरखपुर में भी तैयारियां जोरों पर, चैत्र नवरात्र रविवार से... हाथी पर होगा माता का आगमन
Sat, 29 Mar 2025 12:50 PM IST
रोहित सिंह
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो
Published by: रोहित सिंह
Updated Sat, 29 Mar 2025 12:50 PM IST
सार
तियाहाता हनुमान मंदिर के महंत आचार्य राम नारायण त्रिपाठी ने बताया कि चैत्र नवरात्र में कलश स्थापना का विशेष महत्व है। कलश स्थापना रविवार को पूरे दिन हो सकती है। इसका सर्वश्रेष्ठ समय सुबह 11:36 से दोपहर 12:24 बजे तक अभिजीत मुहूर्त में है। प्रतिपदा तिथि दोपहर 2:14 बजे तक रहेगी, इसलिए इससे पहले कलश स्थापना करना उत्तम होगा।
विज्ञापन
चैत्र नवरात्रि के भक्तिमय शुभकामना संदेश
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
चैत्र नवरात्र का शुभारंभ 30 मार्च रविवार से होगा। समापन छह अप्रैल को हवन के साथ किया जाएगा। इस बार माता दुर्गा का आगमन और प्रस्थान दोनों हाथी पर हो रहा है, जिसे अत्यंत शुभ और समृद्धिदायक माना जा रहा है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस वर्ष नवरात्र ऐंद्र योग और प्रवर्धमान नामक औदायिक योग में शुरू हो रहा है। यह वर्षा, समृद्धि और उन्नति का संकेत देता है।
बेतियाहाता हनुमान मंदिर के महंत आचार्य राम नारायण त्रिपाठी ने बताया कि चैत्र नवरात्र में कलश स्थापना का विशेष महत्व है। कलश स्थापना रविवार को पूरे दिन हो सकती है। इसका सर्वश्रेष्ठ समय सुबह 11:36 से दोपहर 12:24 बजे तक अभिजीत मुहूर्त में है। प्रतिपदा तिथि दोपहर 2:14 बजे तक रहेगी, इसलिए इससे पहले कलश स्थापना करना उत्तम होगा।
उन्होंने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दिन में ही कलश स्थापना करनी चाहिए, रात्रि में नहीं। सही मुहूर्त में कलश स्थापित करने से देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है, जिससे सुख-समृद्धि और शुभ फल की प्राप्ति होती है। इस बार नवरात्र आठ दिनों का होगा, जिसमें देवी के नौ रूपों की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाएगी। कुष्मांडा देवी और स्कंदमाता की पूजा एक ही दिन, दो अप्रैल को होगी। इस दिन चतुर्थी और पंचमी तिथियों का संयोग रहेगा।
विज्ञापन
श्रद्धालु देवी दुर्गा के नौ रूपों की करते हैं आराधना
गोरखनाथ मंदिर संस्कृत विद्यापीठ के ज्योतिष विभागाध्यक्ष डॉ. दिग्विजय शुक्ल ने बताया कि नवरात्र में श्रद्धालु कलश स्थापना कर देवी दुर्गा की आराधना करते हैं। सुबह स्नान कर लाल वस्त्र पहनें और पूजन स्थल को स्वच्छ करें।
फिर कलश में जल भरकर, उसमें आम के पत्ते, नारियल, सुपारी और दूर्वा डालें। देवी की मूर्ति या चित्र के समक्ष दीप जलाएं और गंध, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य अर्पित करें। भक्तजन नवदुर्गा के मंत्रों का जाप, दुर्गा सप्तशती पाठ और आरती करें। उपवास रखने वाले श्रद्धालु एक समय फलाहार लें।
यदि संभव न हो तो केवल जल व पुष्प अर्पित कर भी माता की पूजा कर सकते हैं। जो पूर्ण उपवास नहीं कर सकते, वे सप्तमी, अष्टमी और नवमी को व्रत रख सकते हैं। अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन कर उन्हें भोजन और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। नौ दिनों तक अखंड दीपक जलाने की परंपरा है, जिससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
अष्टमी पांच अप्रैल व नवमी छह अप्रैल को होगी। नवमी के दिन ही हवन व कन्या पूजन होगा। इस दिन जय योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का संयोग बन रहा है, जिससे हवन का फल कई गुना बढ़ जाता है।
विज्ञापन
बेतियाहाता हनुमान मंदिर के महंत आचार्य राम नारायण त्रिपाठी ने बताया कि चैत्र नवरात्र में कलश स्थापना का विशेष महत्व है। कलश स्थापना रविवार को पूरे दिन हो सकती है। इसका सर्वश्रेष्ठ समय सुबह 11:36 से दोपहर 12:24 बजे तक अभिजीत मुहूर्त में है। प्रतिपदा तिथि दोपहर 2:14 बजे तक रहेगी, इसलिए इससे पहले कलश स्थापना करना उत्तम होगा।
विज्ञापन
उन्होंने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दिन में ही कलश स्थापना करनी चाहिए, रात्रि में नहीं। सही मुहूर्त में कलश स्थापित करने से देवी दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है, जिससे सुख-समृद्धि और शुभ फल की प्राप्ति होती है। इस बार नवरात्र आठ दिनों का होगा, जिसमें देवी के नौ रूपों की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाएगी। कुष्मांडा देवी और स्कंदमाता की पूजा एक ही दिन, दो अप्रैल को होगी। इस दिन चतुर्थी और पंचमी तिथियों का संयोग रहेगा।
विज्ञापन
श्रद्धालु देवी दुर्गा के नौ रूपों की करते हैं आराधना
गोरखनाथ मंदिर संस्कृत विद्यापीठ के ज्योतिष विभागाध्यक्ष डॉ. दिग्विजय शुक्ल ने बताया कि नवरात्र में श्रद्धालु कलश स्थापना कर देवी दुर्गा की आराधना करते हैं। सुबह स्नान कर लाल वस्त्र पहनें और पूजन स्थल को स्वच्छ करें।
फिर कलश में जल भरकर, उसमें आम के पत्ते, नारियल, सुपारी और दूर्वा डालें। देवी की मूर्ति या चित्र के समक्ष दीप जलाएं और गंध, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य अर्पित करें। भक्तजन नवदुर्गा के मंत्रों का जाप, दुर्गा सप्तशती पाठ और आरती करें। उपवास रखने वाले श्रद्धालु एक समय फलाहार लें।
यदि संभव न हो तो केवल जल व पुष्प अर्पित कर भी माता की पूजा कर सकते हैं। जो पूर्ण उपवास नहीं कर सकते, वे सप्तमी, अष्टमी और नवमी को व्रत रख सकते हैं। अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन कर उन्हें भोजन और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। नौ दिनों तक अखंड दीपक जलाने की परंपरा है, जिससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
अष्टमी पांच अप्रैल व नवमी छह अप्रैल को होगी। नवमी के दिन ही हवन व कन्या पूजन होगा। इस दिन जय योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का संयोग बन रहा है, जिससे हवन का फल कई गुना बढ़ जाता है।