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प्रवर्धमान योग से खास बनेगी कार्तिक पूर्णिमा
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प्रवर्धमान योग से खास बनेगी कार्तिक पूर्णिमा
गोरखपुर। कार्तिक पूर्णिमा का पर्व 30 नवंबर को श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। इस दिन प्रवर्धमान औदायिक योग बन रहा है। इस योग से श्रद्धालुओं को पूजन-अर्चन का अत्यधिक फल प्राप्त होगा। पूर्णिमा तिथि को सूर्योदय छह बजकर 43 मिनट पर और पूर्णिमा तिथि का मान दिन में दो बजकर 26 मिनट तक एवं रोहिणी नक्षत्र संपूर्ण दिन है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन स्नान और दान से मनोवांछित फल मिलता है।
कार्तिक पूर्णिमा का माहात्म्य
ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार इस दिन गंगा या पवित्र नदियों में स्नान तथा सायंकाल दीप दान का विशेष महत्व है। इसदिन गंगा या पवित्र नदियों में स्नान कर श्रद्धालु अपने पापों से मुक्ति प्राप्त करते हैं। दीप जलाकर ज्ञान और विद्या के प्रकाश का बोध कराते हैं। मान्यताओं के अनुसार कार्तिक माह में किए गए दान, व्रत, तप, जप आदि का लाभ चिरकाल तक बना रहता है। जो श्रद्धालु संपूर्ण मास पूजन-अर्चन न कर सका हो तो कार्तिक मास के आखिरी दिन यानी कार्तिक पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों में स्नान करता है तो उसके लिए काफी फलदायी होता है।
पूजन विधि : पंडित अवधेश मिश्र के अनुसार कार्तिक मास को प्रात:काल पवित्र नदी या गंगा को स्नान कर विधिपूर्वक शालिग्राम की पूजा करनी चाहिए। यदि संभव हो तो सत्यनारायण व्रत कथा का भी आयोजन करे। सायंकाल पूर्णिमा को देव मंदिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों और तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाएं। गंगा के जल या पवित्र नदियों के जल में या नदी के तट पर दीपदान करें। इस तिथि में ब्राह्मणों को दान देने, भोजन कराने, गरीबों को भिक्षा देकर आशीर्वाद प्राप्त करने का विधान है।
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इस दिन देव दिवाली की है परंपरा
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार माना जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा को देवतागण दिवाली मनाने पृथ्वी पर आते हैं। मान्यता है कि त्रिपुर के नाश से प्रसन्न होकर देवताओं ने काशी में पंचगंगा घाट पर दीपोत्सव का आयोजन किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार काशी के राजा देवदास ने अपने राज्य में देवताओं को प्रतिबंधित कर दिया था। कार्तिक पूर्णिमा के दिन रूप बदलकर भगवान शिव काशी के पंचगंगा घाट पर गंगा स्नान और अर्चन किए। जब यह बात राजा देवदास को मालूम हुआ तो उन्होंने प्रतिबंध को समाप्त कर दिया। इस दिन प्रसन्न होकर देवताओं ने दिवाली मनाई। काशी में देव दिवाली का जिक्र ह्वेनसांग ने भी किया है जिसने राजा हर्षवर्धन के समय में भारतवर्ष का दौरा किया था।
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गोरखपुर। कार्तिक पूर्णिमा का पर्व 30 नवंबर को श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। इस दिन प्रवर्धमान औदायिक योग बन रहा है। इस योग से श्रद्धालुओं को पूजन-अर्चन का अत्यधिक फल प्राप्त होगा। पूर्णिमा तिथि को सूर्योदय छह बजकर 43 मिनट पर और पूर्णिमा तिथि का मान दिन में दो बजकर 26 मिनट तक एवं रोहिणी नक्षत्र संपूर्ण दिन है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन स्नान और दान से मनोवांछित फल मिलता है।
कार्तिक पूर्णिमा का माहात्म्य
ज्योतिर्विद पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार इस दिन गंगा या पवित्र नदियों में स्नान तथा सायंकाल दीप दान का विशेष महत्व है। इसदिन गंगा या पवित्र नदियों में स्नान कर श्रद्धालु अपने पापों से मुक्ति प्राप्त करते हैं। दीप जलाकर ज्ञान और विद्या के प्रकाश का बोध कराते हैं। मान्यताओं के अनुसार कार्तिक माह में किए गए दान, व्रत, तप, जप आदि का लाभ चिरकाल तक बना रहता है। जो श्रद्धालु संपूर्ण मास पूजन-अर्चन न कर सका हो तो कार्तिक मास के आखिरी दिन यानी कार्तिक पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों में स्नान करता है तो उसके लिए काफी फलदायी होता है।
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पूजन विधि : पंडित अवधेश मिश्र के अनुसार कार्तिक मास को प्रात:काल पवित्र नदी या गंगा को स्नान कर विधिपूर्वक शालिग्राम की पूजा करनी चाहिए। यदि संभव हो तो सत्यनारायण व्रत कथा का भी आयोजन करे। सायंकाल पूर्णिमा को देव मंदिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों और तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाएं। गंगा के जल या पवित्र नदियों के जल में या नदी के तट पर दीपदान करें। इस तिथि में ब्राह्मणों को दान देने, भोजन कराने, गरीबों को भिक्षा देकर आशीर्वाद प्राप्त करने का विधान है।
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इस दिन देव दिवाली की है परंपरा
पंडित शरद चंद्र मिश्र के अनुसार माना जाता है कि कार्तिक पूर्णिमा को देवतागण दिवाली मनाने पृथ्वी पर आते हैं। मान्यता है कि त्रिपुर के नाश से प्रसन्न होकर देवताओं ने काशी में पंचगंगा घाट पर दीपोत्सव का आयोजन किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार काशी के राजा देवदास ने अपने राज्य में देवताओं को प्रतिबंधित कर दिया था। कार्तिक पूर्णिमा के दिन रूप बदलकर भगवान शिव काशी के पंचगंगा घाट पर गंगा स्नान और अर्चन किए। जब यह बात राजा देवदास को मालूम हुआ तो उन्होंने प्रतिबंध को समाप्त कर दिया। इस दिन प्रसन्न होकर देवताओं ने दिवाली मनाई। काशी में देव दिवाली का जिक्र ह्वेनसांग ने भी किया है जिसने राजा हर्षवर्धन के समय में भारतवर्ष का दौरा किया था।