यूपी के 'मुन्ना भाई MBBS': करते थे जूता पॉलिस... चलवाते थे ट्रक, बाउंसर बन गए मैनेजर; करते हैं इलाज
इलाज के नाम पर इन अस्पतालों में सिर्फ मरीजों को शोषण ही नहीं है, बल्कि मरीजों की मौत के बाद भी लूट खसोट होती है। ज्यादातर सील किए अस्पताल ऐसे हैं जहां लापरवाही में मरीजों की मौत हुई है या फिर इलाज के नाम पर मरीजों को बंधक बना लिया गया।
विस्तार
गोरखपुर के तमाम अस्पतालों का हाल मुन्ना भाई एमबीबीएस फिल्म जैसा है। न डॉक्टर की पढ़ाई की और कोई अनुभव भी नहीं, पर आज अस्पताल के मालिक हैं। रुतबा भी ऐसा है कि डॉक्टर भी इन्हें झुककर सर बुलाते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि मुन्ना भाई एमबीबीएस जैसी धमक बनाने वालों के पास डिग्री तो छोड़िए छोटी कक्षा की पढ़ाई तक नहीं है। इनमें कोई हाईस्कूल फेल होकर छोटे मोटे काम धंधे करता था तो कोई पहले जूता पॉलिश धंधा करता था। एक सज्जन तो ऐसे भी हैं जिन्होंने ट्रक बेचकर अस्पताल खोल दिया। ऐसे 36 मुन्ना भाई आजकल बहुत परेशान हैं। इनके अस्पताल को कुछ दिन पहले सील कर दिया गया था। इनके अस्पतालों के रजिस्ट्रेशन पर डीएम ने रोक लगा दी है। इसके बाद भी ये मुन्ना भाई हिम्मत नहीं हारे हैं, उम्मीद लगाए बैठे हैं आज नहीं तो कल अस्पताल के सील का ताला टूटेगा जरूर और फिर से धंधे को बेखौफ शुरू करेंगे। हालांकि, कई मुन्ना भाई अभी पकड़ से दूर हैं और उनके अस्पतालों में मरीजों का जमकर शोषण हो रहा है।
इलाज के नाम पर इन अस्पतालों में सिर्फ मरीजों को शोषण ही नहीं है, बल्कि मरीजों की मौत के बाद भी लूट खसोट होती है। ज्यादातर सील किए अस्पताल ऐसे हैं जहां लापरवाही में मरीजों की मौत हुई है या फिर इलाज के नाम पर मरीजों को बंधक बना लिया गया। कई मुन्ना भाई अस्पताल का रजिस्ट्रेशन कराने को लेकर परेशान हैं, ताकि प्रशासन सील की कार्रवाई को वापस ले ले। स्वास्थ्य विभाग की संलिप्तता इसी से पकड़ में आती है कि उन्होंने ऐसे लोगों की फाइलें भी डीएम के पास दो बार बढ़ाई है। लेकिन, दोनों बार इनकी दाल नहीं गली और डीएम ने फाइल ही खोलने से मना कर दिया।
बाउंसर बने मैनेजर, इलाज भी करते हैं
तारामंडल, गुलरिहा, पैडलेगंज इलाके में कई ऐसे अस्पताल अभी चल रहे हैं, जो बाउंसर और पीआरओ चला रहे हैं। इनका मैनेजमेंट इतना तगड़ा हो चुका है कि शहर के नए-नए डॉक्टर इन अस्पतालों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसके बदले उन्हें अच्छी खासी रकम भी मिल रही है। कभी-कभार अस्पतालों में डॉक्टरों के न रहने पर ये लोग मरीजों का इलाज भी कर देते हैं। तारामंडल इलाके में एक अस्पताल ऐसा है कि संचालक के बैठने का केबिन, डॉक्टर के बैठने की जगह से अच्छा है। ज्यादातर लोग उसे ही डॉक्टर समझ लेते हैं। इनके अस्पतालों के बोर्डों पर ट्रॉमा सेंटर, न्यूरो, बर्न यूनिट, आईसीयू व स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के लिखे हुए मिल जाएंगे। यहीं नहीं इन अस्पतालों में बड़े ऑपरेशन और डायलिसिस तक की सुविधा मौजूद है। तारामंडल तो ऐसे अस्पतालों का हब बन गया है।
जूता पॉलिश और ट्रक चलाने वालों की नौकरी करते हैं डॉक्टर
पैडलेगंज में तो जूता पालिश और हाईस्कूल फेल व्यक्ति भी अस्पताल का संचालक बन बैठा है। इसके अलावा एक ट्रक चालक भी अस्पताल का मालिक है। इन अस्पतालों में बड़े-बड़े डॉक्टरों के नाम के बोर्ड भी लगाए गए हैं। जबकि, ये डॉक्टर उसे अस्पतालों में इलाज के लिए जाते भी नहीं है। कई डॉक्टरों के नाम ऐसे हैं, जो रहते लखनऊ में हैं, लेकिन उनके नाम का बोर्ड तारामंडल इलाके के कई अस्पतालों में चस्पा है।
बीआरडी का डॉक्टर जा चुका है जेल
भटहट के सत्यम हॉस्पिटल में मरीज की मौत के मामले में बीआरडी का एक डॉक्टर जेल जा चुका है। डॉक्टर सुनील कुमार सरोज पर आरोप है कि उसके नाम पर अस्पताल का स्थायी पंजीकरण था। लेकिन, वह अस्पताल में न बैठकर दिल्ली में पीजी की पढ़ाई कर रहा था। जबकि, उसके नाम पर अस्पताल में मुन्ना भाई मरीजों का ऑपरेशन कर रहा था।
एंबुलेंस चालकों के गठजोड़ से पनप रहे मुन्ना भाई
बीआरडी मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेंटर के ठीक सामने निजी एंबुलेंस स्टाफ नर्स, वार्ड ब्वॉय की मिलीभगत से मरीजों को निजी अस्पताल में पहुंचाया जा रहा है। इस बात का खुलासा भी हो चुका है। मामले में गुलरिहा थाना पुलिस ने पहली बार बीआरडी के स्टाफ नर्स और वार्ड ब्वॉय के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया है। केस दर्ज होने के बाद पूछताछ में यह बात सामने आ चुकी है कि मुन्ना भाइयों के हॉस्पिटल में एक मरीज पहुंचने पर अच्छी खासी रकम दी जाती है। अगर मरीज की बड़ी सर्जरी है तो 15 से 20 हजार रुपये मुन्ना भाई देते हैं।
केस-एक
मुन्ना भाई ने की बवासीर की सर्जरी तो हो गई मौत
खोराबार थाना क्षेत्र के कुसम्ही मोतीराम अड्डा मार्ग पर आयुष नाम का एक अस्पताल चंदन नाम का एक मुन्ना भाई चला रहा था। बंगाली क्लीनिक के नाम से इस अस्पताल में बवासीर और भगंदर से लेकर सभी तरह की फोड़ा-फुंसी के ऑपरेशन किए जाते थे। चंदन ने ही खोराबार थाना क्षेत्र के जंगल रामगढ़ उर्फ रजही निवासी राम आशीष का बवासीर का ऑपरेशन किया था। ऑपरेशन के बाद आशीष की मौत हो गई।
केस-दो
नाखून दबा तो मुन्ना भाई ने दो इंजेक्शन लगाए, हो गई मौत
कैंट थाना क्षेत्र में स्थित एक अस्पताल में कंदराई निवासी लाल चंद यादव का 12 वर्षीय बेटे प्रिंस यादव को इलाज के लिए लेकर आए थे। प्रिंस के पैर में के दाएं अंगूठे का नाखून दब रहा था। आरोपी मुन्ना भाई विजय यादव ने प्रिंस के ऑपरेशन से पहले दो इंजेक्शन लगाए। इंजेक्शन लगाने के थोड़ी ही देर बाद प्रिंस के मुंह से झाग निकलने लगा। थोड़ी ही देर बाद उसकी मौत हो गई। परिजनों ने हंगामा किया तो विजय फरार हो गया। मामले में पुलिस ने हत्या का केस दर्ज किया।
चकाचौंध ने इलाज का खर्च बढ़ाया
15 से 20 साल पहले बड़े बिजनेस मैन अस्पताल संचालन में घुसे तो चकाचौंध का खेल शुरू हो गया। इसी चकाचौंध ने इलाज की कीमत को बढ़ा दिया। बिजनेस मैन के साथ काम करने वाले लोगों ने देखा कि इस काम में रुपये ज्यादा हैं तो उन्होंने इसे अपने पेशे के तौर पर अपना लिया और अस्पताल के धंधे में उतर आए। मरीजों को लगता है कि जहां पर अस्पताल में अच्छी रंगाई-पुताई और रंग बिरंगी लाइटें होंगी, वहां इलाज अच्छा होगा। जबकि, मरीजों को डॉक्टरों के एक्सपीरियंस को देखना चाहिए और उसके बारे में पता करके ही इलाज के लिए जाना चाहिए। सामाजिक दृष्टि से ऐसे अस्पतालों की शासन और प्रशासन को ग्रेडिंग करानी चाहिए, जिससे की मरीजों को सही जानकारी हो सके। -डॉ. वीएन अग्रवाल, पूर्व सचिव, आईएमए
करोड़ों रुपये खर्च कर बन रहे डॉक्टर, वसूल रहे रुपये
1980 में शहर में इक्का-दुक्का नर्सिंगहोम थे। सभी तरह के मरीज जिला अस्पताल और बीआरडी मेडिकल कॉलेज इलाज के लिए जाते थे। वहां पर मरीजों को निशुल्क इलाज मिलता था। कम पैसे में एमबीबीएस की पढ़ाई हो जाती थी। लेकिन, अब दौर बदल गया। निजी मेडिकल कॉलेज खुलने लगे और एक सीटे की कीमत करोड़ाें रुपये में हो गई। करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद सरकारी अस्पतालों में ऐसे डॉक्टरों को नौकरी नहीं मिल पा रही है। इन सबके बीच जो डॉक्टरों के यहां कर्मी काम करते थे। उन्हें काम-काम करते थोड़ी जानकारी हुई तो उन्होंने अपने अस्पताल खोल लिए और नए-नए डॉक्टरों को पकड़कर मरीजों के शोषण में जुट गए। जबकि, पहले ऐसा नहीं था। डॉक्टर इलाज करते थे और मरीज भी उन्हें अपना भगवान मानते थे। अब स्थिति इतनी बदल गई है कि डॉक्टरों को भी लोग संदेश की नजर से देखते हैं। -डॉ. आरपी त्रिपाठी, पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष, आईएम
डॉक्टर के साथ अब साहब गायब... क्षरण का यह सामाजिक प्रभाव
अब लोगों के सामाजिक सोच के केंद्र में लाभ व लोभ आ गया है। लोक कल्याण की अवधारणा लाभ कमाना नहीं है। डॉक्टर और शिक्षक दोनों की समाज में बहुत आदर और सम्मान रहा है। दोनों का काम समाज निर्माण है। लेकिन, अब तो लोगों के दिमाग में पैसा कमाना है। चिकित्सा पेशा भी इससे अछूता नहीं है। हाल यह है कि जिसने डॉक्टर की पढ़ाई की नहीं है वह अस्पताल का मालिक है। डॉक्टर लोग पैसे के लालच में उनके पीछे हैं। यही कारण है कि अब डॉक्टर शब्द से साहब गायब हो गया है। यह शब्द गायब नहीं हुआ है बल्कि, इस पेशे में हुए क्षरण के सामाजिक प्रभाव काे दर्शाता है। इससे सबसे ज्यादा नुकसान तो आम जनता का हुआ है। वैसे भी, अब देखा जाए तो अस्पताल शोषण की जगह बना गया है। इस शोषण में अधिकारी भी शामिल हैं। बिना उनके अस्पताल चल ही नहीं सकता है। अगर शासन-प्रशासन सख्ती बरते तो तभी अंकुश लग सकता है। जो लोग इसमें शामिल हैं उनकी प्रैक्टिस पर रोक लग जाए। परंतु एक बड़ा सवाल यह भी कि जिन्हें एक्शन लेना है वही इस खेल में शामिल हैं। ऐसे में सरकार पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह एक सख्त नियम बनाकर पालन कराए। -प्रो. चितरंजन मिश्र, चिंतक एवं पूर्व विभागाध्यक्ष गोरखपुर विश्वविद्यालय
झोलाछाप के खिलाफ लगातार अभियान चलाकर कार्रवाई की गई है। 90 से अधिक अस्पतालों पर कार्रवाई हो चुकी है। अब जो भी अस्पताल खुल रहे हैं, वह मानकों को ध्यान में रखकर ही खोले जा रहे हैं। अभियान चलाकर झोलाछापों पर कार्रवाई भी की जाएगी। -डॉ. आशुतोष कुमार दूबे, सीएमओ