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Gorakhpur News: घर के दरवाजे पर गाय जरूर रखें, गोशाला आज की व्यवस्था...समाधान नहीं
Sat, 26 Sep 2026 02:47 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
Updated Sat, 26 Sep 2026 02:47 AM IST
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गोरखपुर। वृंदावन से आए कथा व्यास जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने श्रद्धालुओं को जीवन, मृत्यु, संत-महिमा और गोसेवा का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि घर के दरवाजे पर गाय जरूर रखें। गाय को हृदय में बसाएं। गोशाला तो आज की व्यवस्था है, यह गो-रक्षा व सेवा का समाधान नहीं है। धर्माचार्य निश्चय करें कि जहां गाय है वहीं जाएंगे तो बिना कानून गो रक्षा जरूर होगी। वह दिन भारत का सौभाग्य होगा, जब देश के प्रत्येक मंत्री, सचिव और अधिकारी के घर में गाय की सेवा होने लगेगी।
गोरखनाथ मंदिर में ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ और ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की पुण्य स्मृति में आयोजित साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन शुक्रवार को मलूकपीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य श्रद्धालुओं को कथा सुना रहे थे। कथा व्यास ने कथा प्रारंभ करने से पहले गीतावली ग्रंथ के उत्तरकांड के पदों का गायन किया। उन्होंने सुनाया कि लक्ष्मण, राम के निर्देश पर जानकी को महर्षि वाल्मिकी के आश्रम में पहुंचाकर वापस आ रहे हैं। लक्ष्मण का गला उस समय भरा हुआ था, वह बोल नहीं पा रहे थे।
माता सीता को आश्रम छोड़कर सिर झुका कर वह रोते हुए वापस जा रहे थे। लक्ष्मण को वनगमन के दिन याद आ रहे थे। लक्ष्मण सोच रहे थे कि वनवास में असुरों से लड़ना पड़ा, फिर भी इतना दुख नहीं हुआ जो आज हो रहा है। वह खुद को कोस रहे थे कि सीता हरण का कारण भी मैं बना। आज माता को यहां छोड़ने भी मैं ही आया हूं। कथा व्यास ने आगे सुनाया कि महर्षि वाल्मिकी ने सीता से कहा कि इसे अपने पिता का घर समझिए। मन में कोई शंका न रखें। रधुनाथ आपके पति हैं, फिर भी विपरीत स्थिति मिल रही है, लेकिन इसमें बहुत बड़ा आदर्श छिपा है। महर्षि वाल्मिकी ने सीता को बताया कि आपकी दो संतान होंगी। उन्होंने गंगा की कथा सुनाई फिर सीता का मन शांत हुआ।
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कथा वाचक ने भजन के माध्यम से कहा कि संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है। यह संसार मुर्दों का गांव है। यहां वही जीवित है, जो नित्य परमात्मा से स्वयं को जोड़ता है। जो संत स्वयं भगवान के आश्रित होकर अपने शरणागतों का आश्रय बनते हैं, वे अमर हो जाते हैं। शुकदेव की कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि शुकदेव ऐसे महान संत थे, जिन्होंने पृथ्वी का अन्न-जल ग्रहण नहीं किया। वह केवल वायु का सेवन कर रहते थे।
संत के माथे पर तिलक न लगाकर चरणों की पूजा करते हैं बंगाली
उन्होंने बंगाली समाज की तारीफ करते हुए कहा कि बंगाली समाज का भोजन सभी जानते हैं, लेकिन संतों के आने पर वह बहुत ही ज्यादा सम्मान का भाव रखते हुए संतों के अनुसार ही भोजन बनाते हैं। वह संत को तिलक नहीं लगाते। कहते हैं कि इनके माथे को स्पर्श करने की ताकत हममें नहीं है, वह संत के चरणों पर अधिकार रखते हैं चरण की ही पूजा करते हैं।
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गाय हमारे घरों से, खेतों से व हृदय से भी निकल गई
गोसेवा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कथा व्यास ने कहा कि आज गाय हमारे घरों से निकल गई, खेतों से निकल गई और अब हमारे हृदय से भी निकल गई है। इसी कारण गोरक्षा का प्रश्न खड़ा हो रहा है। उन्होंने कहा कि हमारा नियम है कि हम उसी घर में जाएंगे, जिस घर में गाय होगी। इस नियम के कारण हजारों घरों में गोसेवा शुरू हुई है।
मृत्यु के भय से मुक्ति देती है भागवत
कथा व्यास जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने कहा कि भगवान की माया इतनी विचित्र है कि मनुष्य प्रतिदिन किसी न किसी को मृत्यु को प्राप्त होते देखता है, फिर भी स्वयं को अमर मानकर भगवान के बजाय सांसारिक पदार्थों में लगा रहता है। जो लोग संसार की उपलब्धियों पर हंस रहे हैं, उन्हें अनंत काल तक रोना पड़ सकता है, लेकिन जिसने भगवान के लिए रो लिया, उसका मरना भी मरण-महोत्सव बन जाता है।
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सिद्ध संतों के कारण भारतवर्ष की आध्यात्मिक परंपरा सुरक्षित
उन्होंने कहा कि भारत में ऐसी अनेक गौरवशाली परंपराएं रही हैं, जहां संतों ने जीवित समाधि ली। जीवित समाधि वही ले सकता है, जिसके भीतर शरीर और संसार के प्रति मैं और मेरा का भाव समाप्त हो गया हो। इन्हीं सिद्ध संतों के कारण भारतवर्ष की आध्यात्मिक परंपरा सुरक्षित है। मृत्यु उसी की होती है, जिसमें मैं-मेरा और देहात्मभाव रहता है। जिसमें देहात्मभाव समाप्त हो जाता है, वह अमर हो जाता है।
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जीव ईश्वर का अंश
उन्होंने कहा कि जीव ईश्वर का अंश है, लेकिन माया के वशीभूत होकर सांसारिक बन जाता है। श्रीमद्भागवत हमें मृत्यु को समझना सिखाती है और हमारे भीतर मृत्यु के भय को समाप्त करती है। मृत्यु से भयभीत होने के बजाय जीवन को ऐसा बनाना चाहिए कि मृत्यु भी महोत्सव बन जाए। अंत समय में यदि नारायण की स्मृति आ जाए तो मृत्यु भी मंगलमय हो जाती है। कथा व्यास ने कहा कि यदि कोई भक्त जीवनभर भगवान का भजन करता रहा, लेकिन अंत समय में कोमा अथवा वात-पित्त-कफ आदि से व्याकुल होने के कारण भगवान को याद न कर पाए तो भगवान स्वयं उसका स्मरण कर उसका कल्याण करते हैं। उन्होंने कहा कि सभी साधनों का सार यही है कि जीवन के अंत समय में नारायण की स्मृति बनी रहे।
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संत का संकल्प बनता है कल्याण का आधार
अजामिल की कथा का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि यदि किसी संत ने किसी जीव के कल्याण का संकल्प कर लिया है तो उसका कल्याण अवश्य होता है। संतों ने अजामिल के कल्याण का संकल्प लेकर उसके पुत्र का नाम नारायण रखा था। पुत्र को पुकारते समय नारायण नाम का उच्चारण होने से ही अजामिल का कल्याण हो गया। उन्होंने कहा कि संत का संकल्प जीव के कल्याण का आधार बनता है। कथावाचक ने भारत के गौरवशाली अतीत का वर्णन किया।
कथा का समापन आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ। इस अवसर पर गोरक्षपीठ के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ, गोरखपुर के प्रभारी मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह, भाजपा जिलाध्यक्ष जनार्दन तिवारी, महंत रविंद्रदास, ब्लॉक प्रमुख संजय सिंह, डॉ. प्रदीप राव, डॉ. अरविंद चतुर्वेदी, डॉ. प्रांगेश मिश्र, आचार्य बृजेश मणि मिश्र व अजय सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
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गोरखनाथ मंदिर में ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ और ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की पुण्य स्मृति में आयोजित साप्ताहिक श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन शुक्रवार को मलूकपीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य श्रद्धालुओं को कथा सुना रहे थे। कथा व्यास ने कथा प्रारंभ करने से पहले गीतावली ग्रंथ के उत्तरकांड के पदों का गायन किया। उन्होंने सुनाया कि लक्ष्मण, राम के निर्देश पर जानकी को महर्षि वाल्मिकी के आश्रम में पहुंचाकर वापस आ रहे हैं। लक्ष्मण का गला उस समय भरा हुआ था, वह बोल नहीं पा रहे थे।
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कथा वाचक ने भजन के माध्यम से कहा कि संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है। यह संसार मुर्दों का गांव है। यहां वही जीवित है, जो नित्य परमात्मा से स्वयं को जोड़ता है। जो संत स्वयं भगवान के आश्रित होकर अपने शरणागतों का आश्रय बनते हैं, वे अमर हो जाते हैं। शुकदेव की कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि शुकदेव ऐसे महान संत थे, जिन्होंने पृथ्वी का अन्न-जल ग्रहण नहीं किया। वह केवल वायु का सेवन कर रहते थे।
संत के माथे पर तिलक न लगाकर चरणों की पूजा करते हैं बंगाली
उन्होंने बंगाली समाज की तारीफ करते हुए कहा कि बंगाली समाज का भोजन सभी जानते हैं, लेकिन संतों के आने पर वह बहुत ही ज्यादा सम्मान का भाव रखते हुए संतों के अनुसार ही भोजन बनाते हैं। वह संत को तिलक नहीं लगाते। कहते हैं कि इनके माथे को स्पर्श करने की ताकत हममें नहीं है, वह संत के चरणों पर अधिकार रखते हैं चरण की ही पूजा करते हैं।
गाय हमारे घरों से, खेतों से व हृदय से भी निकल गई
गोसेवा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कथा व्यास ने कहा कि आज गाय हमारे घरों से निकल गई, खेतों से निकल गई और अब हमारे हृदय से भी निकल गई है। इसी कारण गोरक्षा का प्रश्न खड़ा हो रहा है। उन्होंने कहा कि हमारा नियम है कि हम उसी घर में जाएंगे, जिस घर में गाय होगी। इस नियम के कारण हजारों घरों में गोसेवा शुरू हुई है।
मृत्यु के भय से मुक्ति देती है भागवत
कथा व्यास जगद्गुरु स्वामी राजेंद्रदास देवाचार्य ने कहा कि भगवान की माया इतनी विचित्र है कि मनुष्य प्रतिदिन किसी न किसी को मृत्यु को प्राप्त होते देखता है, फिर भी स्वयं को अमर मानकर भगवान के बजाय सांसारिक पदार्थों में लगा रहता है। जो लोग संसार की उपलब्धियों पर हंस रहे हैं, उन्हें अनंत काल तक रोना पड़ सकता है, लेकिन जिसने भगवान के लिए रो लिया, उसका मरना भी मरण-महोत्सव बन जाता है।
सिद्ध संतों के कारण भारतवर्ष की आध्यात्मिक परंपरा सुरक्षित
उन्होंने कहा कि भारत में ऐसी अनेक गौरवशाली परंपराएं रही हैं, जहां संतों ने जीवित समाधि ली। जीवित समाधि वही ले सकता है, जिसके भीतर शरीर और संसार के प्रति मैं और मेरा का भाव समाप्त हो गया हो। इन्हीं सिद्ध संतों के कारण भारतवर्ष की आध्यात्मिक परंपरा सुरक्षित है। मृत्यु उसी की होती है, जिसमें मैं-मेरा और देहात्मभाव रहता है। जिसमें देहात्मभाव समाप्त हो जाता है, वह अमर हो जाता है।
जीव ईश्वर का अंश
उन्होंने कहा कि जीव ईश्वर का अंश है, लेकिन माया के वशीभूत होकर सांसारिक बन जाता है। श्रीमद्भागवत हमें मृत्यु को समझना सिखाती है और हमारे भीतर मृत्यु के भय को समाप्त करती है। मृत्यु से भयभीत होने के बजाय जीवन को ऐसा बनाना चाहिए कि मृत्यु भी महोत्सव बन जाए। अंत समय में यदि नारायण की स्मृति आ जाए तो मृत्यु भी मंगलमय हो जाती है। कथा व्यास ने कहा कि यदि कोई भक्त जीवनभर भगवान का भजन करता रहा, लेकिन अंत समय में कोमा अथवा वात-पित्त-कफ आदि से व्याकुल होने के कारण भगवान को याद न कर पाए तो भगवान स्वयं उसका स्मरण कर उसका कल्याण करते हैं। उन्होंने कहा कि सभी साधनों का सार यही है कि जीवन के अंत समय में नारायण की स्मृति बनी रहे।
संत का संकल्प बनता है कल्याण का आधार
अजामिल की कथा का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि यदि किसी संत ने किसी जीव के कल्याण का संकल्प कर लिया है तो उसका कल्याण अवश्य होता है। संतों ने अजामिल के कल्याण का संकल्प लेकर उसके पुत्र का नाम नारायण रखा था। पुत्र को पुकारते समय नारायण नाम का उच्चारण होने से ही अजामिल का कल्याण हो गया। उन्होंने कहा कि संत का संकल्प जीव के कल्याण का आधार बनता है। कथावाचक ने भारत के गौरवशाली अतीत का वर्णन किया।
कथा का समापन आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ। इस अवसर पर गोरक्षपीठ के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ, गोरखपुर के प्रभारी मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह, भाजपा जिलाध्यक्ष जनार्दन तिवारी, महंत रविंद्रदास, ब्लॉक प्रमुख संजय सिंह, डॉ. प्रदीप राव, डॉ. अरविंद चतुर्वेदी, डॉ. प्रांगेश मिश्र, आचार्य बृजेश मणि मिश्र व अजय सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।