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26 एकादशियों का फल देती है निर्जला एकादशी, इसी विधि से पूजा करने पर खुश होंगे भगवान

Fri, 29 May 2020 10:46 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Fri, 29 May 2020 10:46 PM IST
सार

  • दो जून को मनाया जाएगा भगवान विष्णु के उपासना का पर्व निर्जला एकादशी
  • इस दिन विधि-विधान से व्रत, पूजन-अर्चन एवं दान-पुण्य से होती है मोक्ष की प्राप्ति

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Nirjala Ekadashi special story in Gorakhpur
एकादशी - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भगवान विष्णु की उपासना का पर्व निर्जला एकादशी दो जून को मनाया जाएगा। वर्ष में 24 एकादशी होते हैं, लेकिन जिस वर्ष अधिकमास होता है, उस वर्ष में 26 एकादशी होते हैं। इन सभी में निर्जला एकादशी को श्रेष्ठ माना गया है। ऐसा माना जाता है कि सिर्फ निर्जला एकादशी का व्रत रखने से श्रद्धालुओं को वर्ष के सभी एकादशियों का फल मिल जाता है।

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निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। महर्षि वेदव्यास के अनुसार, भीमसेन ने इसे धारण किया था। इस व्रत में सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक जल भी न पीने का विधान होने के कारण इसे निर्जला एकादशी कहते हैं। इस व्रत को विधि-विधान से करने वालों को दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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निर्जला एकादशी व्रत की पूजा विधि
पंडित देवेंद्र प्रताप मिश्र ने बताया कि इस व्रत में एकादशी तिथि के सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल और भोजन ग्रहण नहीं किया जाता है। एकादशी के दिन प्रात: काल भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें। इसके बाद ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। इस दिन भक्तिभाव से कथा सुननी चाहिए। जल से कलश भरे और उसे सफेद वस्त्र से ढककर रखें। उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें।

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निर्जला एकादशी पर दान का महत्व

पंडित मनीष मोहन ने बताया कि व्रतियों को यथाशक्ति अन्न, जल, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखी तथा फल आदि का दान करना चाहिए। जल कलश का दान करने वाले श्रद्धालुओं को वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है। इस व्रत से अन्य एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाता है तथा संपूर्ण एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलता है। श्रद्धापूर्वक जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अविनाशी पद प्राप्त करता है।

निर्जला एकादशी व्रत कथा
पंडित शरद चंद्र मिश्र ने बताया कि महाभारत काल में पांडु पुत्र भीम को महर्षि वेद व्यास ने निर्जला एकादशी व्रत रखने को कहा। महर्षि ने कहा कि इस दिन अन्न और जल दोनों का त्याग करना पड़ता है। जो भी मनुष्य एकादशी तिथि के सूर्योदय से द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक बिना पानी पीए रहता है और सच्ची श्रद्धा से निर्जला व्रत का पालन करता है, उसे साल में जितनी एकादशी आती हैं, उन सबका फल मिल जाता है। इसके बाद भीमसेन निर्जला एकादशी व्रत का पालन करने लगे और पाप मुक्त हो गए।

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