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नवरात्र विशेष: अपने सपनों को उड़ान दे रहीं गोरखपुर की ये नौ बेटियां, शिक्षा से लेकर खेल तक लहरा रहीं परचम

Sun, 11 Oct 2026 07:57 PM IST
अनुराग रंजन संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर Published by: अनुराग रंजन Updated Sun, 11 Oct 2026 07:57 PM IST
सार

वर्तिका, वंदिता और उनकी छोटी बहन गोरखपुर स्थित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के गेट के सामने चाय की रेहड़ी लगाकर परिवार का सहारा बनी हैं। उनके पिता रामसकल उपाध्याय वर्ष 2017 में पैरालिसिस से ग्रस्त हो गए थे।

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Navratri Special Meet Gorakhpurs Nine Daughters Soaring High in Education Sports and Beyond
नवरात्र विशेष - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नवरात्र में मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना और अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस का संयोग बेटियों की शक्ति, सामर्थ्य और संभावनाओं को पहचानने का खास अवसर है। ये बेटियां सिर्फ अपने सपनों को पंख नहीं दे रहीं, बल्कि परिवार की उम्मीदों को संबल, समाज को नई दिशा और रूढ़ियों को चुनौती भी दे रही हैं। कोई शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही है, तो कोई खेल के मैदान में जीत का परचम लहरा रही है। कोई परिवार की आर्थिक ताकत बनी है, तो कोई विज्ञान और तकनीक की दुनिया में अपनी प्रतिभा साबित कर रही है। नवरात्र के नौ दिनों की तरह ही इन नौ बेटियों के नौ अलग-अलग रूप हैं, जिनमें छिपी है संघर्ष, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की शक्ति।
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तीन बार चूकीं, चौथी बार में 26वीं रैंक लाकर आईएएस बनीं इशिता
यूपीएससी 2025 में ऑल इंडिया में 26वीं रैंक लाने वाली इशिता शर्मा की कामयाबी की कहानी बताती है कि बेटियों में धैर्य की कमी नहीं है। उन्होंने बारहवीं पास करते ही खुद से वादा किया था कि वह अपने लक्ष्य को हासिल करके रहेंगी। खास बात यह है कि यह मुकाम उन्हें पहली या दूसरी नहीं, बल्कि चौथी कोशिश में मिला। इससे पहले दो बार प्रारंभिक परीक्षा में ही नाकामी हाथ लगी, जबकि तीसरी बार साक्षात्कार तक पहुंचने के बावजूद महज 14 अंकों से अंतिम चयन सूची में जगह नहीं बना सकीं।
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वह कहती हैं कि लगातार असफलताओं के बावजूद हार मानने के बजाय अपनी कमजोरियों को पहचाना और तैयारी की रणनीति में सुधार किया। बार-बार मिलने वाली नाकामी के हर झटके को आगे बढ़ने का अवसर बनाया। चौथे प्रयास में सपने साकार हो गए।
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वजन घटाने के लिए जिम पहुंचीं सेजल, अब एशिया में जीता रजत

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सेजल - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
80 किलो वजन घटाने के इरादे से जिम पहुंचीं सेजल गुप्ता ने कभी नहीं सोचा था कि यही कदम उन्हें एशिया के खेल मंच तक पहुंचा देगा। शुरुआत वजन घटाने की कोशिश से हुई लेकिन धीरे-धीरे पावरलिफ्टिंग उनका जुनून बन गई। उन्होंने इस्तांबुल में एशियन बेंच प्रेस चैंपियनशिप के 63 किलो वर्ग में 92.5 किलो वजन उठाकर रजत पदक जीत लिया। उनका प्रदर्शन राष्ट्रीय रिकॉर्ड से महज 2.5 किलो कम रहा। एमएमएमयूटी की 2026 बैच की मैकेनिकल इंजीनियरिंग स्नातक सेजल ने कॉलेज में प्रवेश से दो महीने पहले जिम में अभ्यास शुरू किया था। यहीं कोच ने उनकी प्रतिभा पहचानी और पावरलिफ्टिंग में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। वर्ष 2024 में गोवा में राष्ट्रीय प्रतियोगिता का रजत पदक और जनवरी 2026 में फरीदाबाद में 87.5 किलो वजन उठाकर राष्ट्रीय स्वर्ण जीतने के बाद उन्होंने एशियाई चैंपियनशिप में भी अपनी ताकत साबित की।

वह कहती हैं कि मेहनत और आत्मविश्वास के दम पर ही कुछ हासिल किया जा सकता है। शुरुआत में परिवार को खेल में करियर और भविष्य की सुरक्षा की चिंता थी। पढ़ाई और खेल में संतुलन बनाकर धीरे-धीरे भरोसा जीता। सही दिशा में किया गया प्रयास जिंदगी बदल सकता है।

कैंसर रोधी यौगिक विकसित कर रहीं स्वाति, पेटेंट की प्रक्रिया शुरू

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स्वाति - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
महात्मा गांधी पीजी कॉलेज की शोधार्थी स्वाति श्रीवास्तव विज्ञान के क्षेत्र में शोध के जरिये नई संभावनाओं के द्वार खोल रही हैं। वह कैंसर रोधी यौगिकों के विकास पर काम कर रही हैं। उनके शोध में कुछ अणुओं के उत्साहजनक परिणाम मिलने के बाद संभावित उपयोगी यौगिकों के पेटेंट की प्रक्रिया शुरू की गई है। डॉ. आलोक कुमार श्रीवास्तव के निर्देशन में चल रहा उनका शोध भविष्य में कैंसर के उपचार के लिए नए औषधीय विकल्प विकसित करने की संभावनाओं पर केंद्रित है। उनके शोध से संबंधित समीक्षा शोध-पत्र प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका करंट मेडिसिनल केमिस्ट्री में प्रकाशित हुआ है। यह पत्रिका विज्ञान उद्धरण सूचकांक की प्रथम चतुर्थांश श्रेणी में शामिल है। वर्ष 2025 में एम्स, गोरखपुर में आयोजित वैज्ञानिक संगोष्ठी में उन्हें उत्कृष्ट शोध-पत्र प्रस्तुति के लिए प्रथम पुरस्कार भी मिला।

वह कहती हैं कि बेटियां प्रयोगशालाओं में भी भविष्य की चुनौतियों के समाधान तलाश रही हैं। मेरा यह शोध अकादमिक उपलब्धि ही नहीं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान में नए विकल्पों की तलाश की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास भी है।

चार साल से बगीचे में चला रहीं पाठशाला

पिपराइच क्षेत्र के जंगल तिनकोनिया नंबर दो स्थित धुसिया गांव की अनीता निषाद और नंदिनी प्रजापति पिछले चार वर्षों से जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाने के साथ ही अशिक्षित महिलाओं को साक्षर बनाने में जुटी हैं। उनकी पाठशाला में पढ़ाई के बदले फीस के रूप में रुपये नहीं, बल्कि घरों और आसपास बिखरा सिंगल यूज प्लास्टिक लिया जाता है। दोनों बेटियों की यह पहल अब गांव में बदलाव की नई कहानी लिख रही है।

गांव के एक छोटे से बगीचे में प्रतिदिन दोपहर तीन बजे के बाद उनकी पाठशाला सजती है। अनीता और नंदिनी साफ-सफाई करने, टाट-पट्टी बिछाने और ब्लैकबोर्ड लगाने के बाद बच्चों व महिलाओं को पढ़ाती हैं। एलकेजी से आठवीं तक के बच्चों को बुनियादी शिक्षा देने के साथ वे उन महिलाओं को भी अक्षर ज्ञान करा रही हैं, जो किसी कारणवश स्कूल नहीं जा सकीं।उनकी पाठशाला में अब तक करीब 60 क्विंटल प्लास्टिक एकत्र किया जा चुका है, जिसे रीसाइक्लिंग के लिए दिया गया।

वह कहती हैं कि बदलाव के लिए बड़े संसाधनों से ज्यादा मजबूत इच्छाशक्ति जरूरी है।

सिलाई कर आत्मनिर्भर बनीं पल्लवी, गरीब बच्चों को देती हैं निःशुल्क शिक्षा

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भगवानपुर के मौजा हासपाटी में बच्चों को पढ़ाती पल्लवी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
ग्राम सभा भगवानपुर के मौजा हासपाटी निवासी पल्लवी राज आत्मनिर्भरता की मिसाल बनी हैं। राम प्रताप राज की पुत्री पल्लवी ने स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिलाई को अपनी आजीविका बनाया। वह घर पर ही सिलाई का काम करके प्रतिमाह पांच से छह हजार रुपये कमाती हैं और परिवार की आर्थिक मदद करती हैं। घर की जिम्मेदारियों के साथ माता-पिता की सेवा करना और जरूरतमंद बच्चों को निःशुल्क पढ़ाना उनके जीवन का अहम हिस्सा है। पल्लवी ने यह साबित किया है कि आत्मनिर्भर बनने के लिए हमेशा घर से बाहर जाकर नौकरी करना ही जरूरी नहीं है। हुनर और मेहनत के दम पर घर से भी आजीविका का रास्ता तैयार किया जा सकता है।

वह कहती हैं कि हुनर को रोजगार में बदलकर न केवल परिवार का सहारा बना जा सकता है, बल्कि समाज के जरूरतमंद बच्चों को आगे बढ़ने का अवसर भी दिया जा सकता है।

होम ट्यूटर बनीं, पेशेवर दुनिया में मुस्कान पांडेय ने बनाया मुकाम

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मुस्कान पांडेय - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पढ़ाई के दौरान होम ट्यूटर का काम किया, रूढ़ियों को तोड़ा और पीजी में रहकर आत्मनिर्भरता सीखी। बीएससी पूरी करते ही नौकरी शुरू कर दी। मुस्कान पांडेय ने वर्ष 2025 में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कोच्चि में टाटा मोटर पार्ट्स में काम शुरू किया। बाद में ओडिशा के पुरी में आदित्य बिड़ला समूह से जुड़ गईं। कम समय में बेहतर प्रदर्शन के लिए उन्हें वरिष्ठ पेशेवरों से सम्मान और पदोन्नति मिली। साधारण परिवार से निकलकर पेशेवर दुनिया में अपनी जगह बनाना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हर चुनौती को सीखने और आगे बढ़ने के अवसर में बदला।

मुस्कान की प्रतिभा केवल पढ़ाई और नौकरी तक सीमित नहीं है। कॉलेज और क्षेत्रीय स्तर पर फुटबाल खेलने के बाद उनका चयन राज्य स्तर तक हुआ। पेंसिल से चित्र और पोस्टर बनाने में भी उनकी खास रुचि है। लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सम्मानित हो चुकीं मुस्कान अब अपने कार्यक्षेत्र में और बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद के साथ आगे बढ़ रही हैं।

वह कहती हैं कि हम लोग जिस परिवेश से हैं, वहां से लड़कियों का बाहर जाकर, पीजी में रहकर नौकरी करना चुनौतीभरा है। मुझे यह मौका मिला और मैंने खुद का साबित किया।

चोट ने छीना सोनाली से खिलाड़ी बनने का सपना, अब अंतरराष्ट्रीय अंपायर

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सोनाली सिंह - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
कलाई की गंभीर चोट ने हॉकी खिलाड़ी बनने का सपना तोड़ा लेकिन सोनाली सिंह का हौसला नहीं डिगा। रामजानकी नगर के पचपेड़वा की सोनाली ने दर्द और निराशा से उबरकर अंपायरिंग में नई पहचान बनाई। किसान आनंद प्रताप सिंह और सुनीता देवी की बेटी सोनाली ने वर्ष 2011 में वीर बहादुर सिंह स्पोर्ट्स कॉलेज में हॉकी का प्रशिक्षण शुरू किया। वर्ष 2021 में हाथ की हड्डियों में गंभीर चोट लगने से मैदान में वापसी मुश्किल लगी, लेकिन कोच शशि नवैत के मार्गदर्शन में अंपायरिंग सीखी। चीन में जूनियर हॉकी एशिया कप में अंपायरिंग कर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभा साबित की। बीपीएड डिग्रीधारक सोनाली वर्ष 2025 से बेंगलुरु के विद्या शिल्प स्कूल में शिक्षिका हैं।

वह कहती हैं कि मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है।

बाबाल प्रतिभा और विश्व रिकॉर्डसात साल की उम्र में विश्व रिकॉर्ड, जिम्नास्टिक से स्केटिंग तक मोहलक्षिका का कमाल

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मोहलक्षिका सिंह - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
सूरज कुंड काॅलोनी निवासी सात वर्षीय मोहलक्षिका सिंह ने खेल और कला के क्षेत्र में अपनी असाधारण प्रतिभा से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। जिम्नास्टिक, स्केटिंग, कराटे और डांस में उपलब्धियां हासिल कर उन्होंने साबित किया है कि प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती। मोहलक्षिका ने जिम्नास्टिक में ‘मोस्ट अल्टरनेटिंग कार्टव्हील सीक्वेंस’ का विश्व रिकॉर्ड बनाया, जिसे कनाडा के अमेजिंग ओलंपिया वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने मान्यता दी है। उनकी उपलब्धियां यहीं तक सीमित नहीं हैं। राष्ट्रीय खेल दिवस पर पारंपरिक परिधान में 5.3 किलोमीटर तक लगातार स्केटिंग करने का कीर्तिमान भी उनके नाम दर्ज है। इसके साथ ही उन्होंने 52 महिला साइकिल चालकों की रैली का नेतृत्व किया। इन दोनों उपलब्धियों को इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में जगह मिली है। इतनी कम उम्र में विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा साबित करना उनकी मेहनत, अनुशासन और लगन को दर्शाता है।

मोहलक्षिका उत्तर प्रदेश की सबसे कम उम्र की कराटे ब्लैक बेल्ट बनने का गौरव भी हासिल कर चुकी हैं। वहीं, बैटल स्पोर्ट्स डांस की राष्ट्रीय चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने खेल के साथ सांस्कृतिक क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। उनकी कहानी बताती है कि सही प्रशिक्षण, निरंतर अभ्यास और परिवार के सहयोग से छोटी उम्र में भी बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।

95.6 प्रतिशत अंक, जेईई मेन में 98.5 परसेंटाइल, अनन्या ने एडवांस्ड भी क्वालीफाई किया

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अनन्या त्रिपाठी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
शहर की अनन्या त्रिपाठी ने पढ़ाई में निरंतरता और धैर्य को सफलता का आधार बनाकर अपनी प्रतिभा साबित की है। वर्ष 2026 की 12वीं बोर्ड परीक्षा में उन्होंने 95.6 प्रतिशत अंक हासिल किए। वहीं, जेईई मेन में 98.5 परसेंटाइल प्राप्त करने के साथ जेईई एडवांस्ड भी क्वालीफाई किया। उनकी यह उपलब्धि बताती है कि स्पष्ट लक्ष्य और नियमित मेहनत से बड़ी परीक्षाओं की चुनौतियों का सामना किया जा सकता है। अनन्या के अनुसार, अपनी पूरी तैयारी के दौरान उन्होंने दो बातों पर विशेष ध्यान दिया- निरंतरता और धैर्य।

वह हर दिन एक निश्चित समय-सारिणी के अनुसार पढ़ाई करती थीं। तैयारी के दौरान आने वाली असफलताओं से निराश होने के बजाय अपनी गलतियों को समझने और उनसे सीखने की कोशिश करती थीं। इसी सोच ने उन्हें आगे बढ़ने और अपने प्रदर्शन में सुधार करने का हौसला दिया।

पिता को लकवा, बेटियों ने संभाली जिम्मेदारी, चाय की रेहड़ी से आईएएस बनने का सपना

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गोरखपुर विवि के सामने चाय बेचती बहनें - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
हालात ने रास्ता बदला तो तीन बहनों ने हार मानने के बजाय संघर्ष को अपनी ताकत बना लिया। वर्तिका, वंदिता और उनकी छोटी बहन गोरखपुर स्थित दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के गेट के सामने चाय की रेहड़ी लगाकर परिवार का सहारा बनी हैं। उनके पिता रामसकल उपाध्याय वर्ष 2017 में पैरालिसिस से ग्रस्त हो गए थे। इससे उनकी नौकरी छूट गई और परिवार आर्थिक संकट में घिर गया।

बड़ी बहन वर्तिका ने छोटी-मोटी नौकरी और ट्यूशन के जरिये घर चलाने की कोशिश की, लेकिन आमदनी पर्याप्त नहीं थी। इसके बाद तीनों बहनों ने पढ़ाई जारी रखते हुए चाय का स्टॉल लगाने का फैसला किया। सामाजिक उलाहनों की चिंता के बावजूद उन्होंने करीब चार महीने पहले आठ हजार रुपये से चाय की रेहड़ी शुरू की। यहां विश्वविद्यालय आने वाले विद्यार्थी और राहगीर चाय पीने पहुंचते हैं। आर्थिक जिम्मेदारियां उठाने के साथ तीनों बहनों का सपना आईएएस अधिकारी बनने का है। उनकी मेहनत और हौसले की जानकारी मिलने पर गोरखपुर के जिलाधिकारी ने उन्हें अपने आवास पर मिलने के लिए आमंत्रित किया है। उनकी कहानी बताती है कि मुश्किल हालात भी बेटियों के सपनों और हौसलों को रोक नहीं सकते।
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