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Ram Mandir: महंत अवेद्यनाथ की गिरफ्तार पर भड़के थे नागा साधु, तीर-धनुष के साथ पहुंचे थे मंदिर
Mon, 22 Jan 2024 01:12 PM IST
vivek shukla
राम मनोहर त्रिपाठी गोरखपुर।
राम मनोहर त्रिपाठी गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Mon, 22 Jan 2024 01:12 PM IST
सार
राम जन्म भूमि आंदोलन के दौरान महंत अवेद्यनाथ को गिरफ्तार कर देहरादून फारेस्ट हाउस में रखा गया था। इसकी जानकारी होने पर साधुओं का एक जत्था तीर-धनुष लेकर छत्तीसगढ़ और नागालैंड से गोरखनाथ मंदिर पहुंच गया। मंदिर में रात्रि विश्राम के बाद वह दूसरे दिन अयोध्या जाने को निकले तो पुलिस रोकने पहुंच गई।
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महंत अवैद्यनाथ की फाइल फोटो।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
राम जन्म भूमि आंदोलन के दौरान महंत अवेद्यनाथ को गिरफ्तार कर देहरादून फारेस्ट हाउस में रखा गया था। इसकी जानकारी होने पर साधुओं का एक जत्था तीर-धनुष लेकर छत्तीसगढ़ और नागालैंड से गोरखनाथ मंदिर पहुंच गया। मंदिर में रात्रि विश्राम के बाद वह दूसरे दिन अयोध्या जाने को निकले तो पुलिस रोकने पहुंच गई। इस पर वह तीर-धनुष लेकर मोर्चे पर अड़ गए थे। उस समय के एडीएम प्रशासन शमशाद अहमद ने देहरादून में महंत अवेद्यनाथ से संपर्क साधा। उनके अनुरोध पर साधु मोर्चा से पीछे हटे और वापस अपने स्थान को जाने के लिए तैयार हुए।
यह संस्मरण बताते हुए पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. यूपी सिंह भावुक हो गए। अयोध्या आंदोलन की यादों को ताजा कर 94 वर्ष की उम्र में भी जोश से भर जाते हैं। बताया कि रामजन्म भूमि आंदोलन उस समय जन आंदोलन बन चुका था। आंदोलन में समाज के हर वर्ग के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे।
कार सेवकों को रोकने के लिए सड़क मार्ग पर पहरा लगा था। ऐसे में मल्लाहों ने जलमार्ग से कार सेवकों को अयोध्या पहुंचाने का जो साहस दिखाया था उसे भुलाया जा नहीं सकता। उन्होंने बताया कि वर्ष 1991 से 1994 तक पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति का दायित्व निभाने के साथ ही विश्व हिंदू परिषद के काशी प्रांत का अध्यक्ष भी था। राम मंदिर आंदोलन के दौरान मुझे जौनपुर में नजरबंद कर दिया गया।
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इसे भी पढ़ें: पुलिस की थी नजर, गोरखनाथ मंदिर के सेवक को बदलनी पड़ी वेशभूषा और नाम
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यह संस्मरण बताते हुए पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. यूपी सिंह भावुक हो गए। अयोध्या आंदोलन की यादों को ताजा कर 94 वर्ष की उम्र में भी जोश से भर जाते हैं। बताया कि रामजन्म भूमि आंदोलन उस समय जन आंदोलन बन चुका था। आंदोलन में समाज के हर वर्ग के लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे।
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कार सेवकों को रोकने के लिए सड़क मार्ग पर पहरा लगा था। ऐसे में मल्लाहों ने जलमार्ग से कार सेवकों को अयोध्या पहुंचाने का जो साहस दिखाया था उसे भुलाया जा नहीं सकता। उन्होंने बताया कि वर्ष 1991 से 1994 तक पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति का दायित्व निभाने के साथ ही विश्व हिंदू परिषद के काशी प्रांत का अध्यक्ष भी था। राम मंदिर आंदोलन के दौरान मुझे जौनपुर में नजरबंद कर दिया गया।
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राम मंदिर आंदोलन से सीधे जुड़े थे डीडीयू के चार प्रोफेसर, बनाते थे रणनीति
राम मंदिर आंदोलन से गोरखपुर विश्वविद्यालय भी अछूता नहीं था। विश्वविद्यालय में सक्रिय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेतृत्व में चरणबद्ध आंदोलन पर रणनीति तैयार कर रहा था। इसमें विश्वविद्यालय के चार प्रोफेसरों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। जिसमें हिंदी विभाग के प्रो. सदानन्द गुप्ता, प्रो. सुरेंद्र दुबे, भूगोल विभाग के प्रो. शिव शंकर वर्मा और प्रो. केएन सिंह की जुबां पर आज भी राम मंदिर आंदोलन की दास्तां है।
प्रो. सदानंद गुप्ता ने बताया कि छह दिसंबर 1992 को अपराह्न तीन बजे विवादित ढांचा ध्वस्त होने की जानकारी मिली। वह अपने घर शिवपुर सहबाजगंज में थे। वह अपने पड़ोसी श्रीवास्तव जी के साथ अलीनगर स्थित संघ कार्यालय पहुंच गए।
प्रो. सदानंद गुप्ता ने बताया कि छह दिसंबर 1992 को अपराह्न तीन बजे विवादित ढांचा ध्वस्त होने की जानकारी मिली। वह अपने घर शिवपुर सहबाजगंज में थे। वह अपने पड़ोसी श्रीवास्तव जी के साथ अलीनगर स्थित संघ कार्यालय पहुंच गए।