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सत्य, प्रेम और करुणा ही रामचरित मानस का सार तत्व: मोरारी बापू

Sun, 31 Jan 2021 06:48 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, कुशीनगर।
अमर उजाला नेटवर्क, कुशीनगर। Published by: vivek shukla Updated Sun, 31 Jan 2021 06:48 PM IST
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Morari Bapu Ram Katha Over in Kushinagar
कथावाचक मोरारी बापू। - फोटो : अमर उजाला।

 सुख और दुख सापेक्ष है। प्रत्येक मनुष्य को कर्म का फल भोगना ही पड़ता है। अयोध्या के राजा दशरथ ने श्रवण कुमार का वध किया तो उन्हें राम का पिता होते हुए भी पुत्र वियोग का फल भोगना पड़ा। राम ही सत्य हैं और रामचरित मानस का सार तत्व सत्य, प्रेम और करुणा है।

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ये बातें अंतरराष्ट्रीय कथावाचक मोरारी बापू ने कुशीनगर में चल रहे रामकथा के आखिरी दिन मानस निर्वाण की व्याख्या करते हुए कहीं। कथावाचक ने आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत की चर्चा करते हुए कहा कि अयोध्या में भगवान राम के जन्म से लेकर विवाह तक उत्साह का माहौल था और अब वहां वियोग का वातावरण बनने लगा था।
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युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि राम के नाम का उच्चारण करें या न करें, लेकिन कुसंगति न करें। अयोध्या में जो भी हुआ वह केवल कुसंगति के कारण ही हुआ। मंथरा की कुसंगति ने कैकेयी को युगों-युगों तक अपमानित होने के लिए विवश कर दिया। कर्म का फल भी प्रत्येक व्यक्ति को भोगना पड़ता है।
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चाहे वह कोई सामान्य मनुष्य हो या स्वयं भगवान राम के पिता दशरथ। रामचरित मानस के अयोध्या कांड में इसका वर्णन है कि जब राम, लक्ष्मण व सीता वन को चले गए तो पुत्र वियोग में दशरथ ने कौशल्या से कहा कि मुझे दीवारों में श्रवण कुमार के माता-पिता का चित्र दिखाई दे रहा है।

श्रवण कुमार के अंधे माता-पिता ने उन्हें श्राप दिया था कि बुजुर्गावस्था में चार पुत्र होते हुए भी पुत्र वियोग सहन करना पड़ेगा और अंत समय में कोई पास नहीं होगा। अंत समय में राजा दशरथ की भी पुत्र वियोग में मृत्यु हुई। जबकि वे स्वयं नारायण के अवतार राम के पिता थे।

मानस निर्वाण की चर्चा करते हुए कथावाचक ने कहा कि ईर्ष्या से ऐश्वर्य तो मिल सकता है, लेकिन शांति नहीं। निंदा से स्वर्ग तो मिल सकता है, लेकिन निद्रा नहीं मिलेगा। रामचरित मानस में वर्णित राम और भरत के चरित्र की चर्चा करते हुए कहा कि प्रेम में दबाव नहीं समर्पण का भाव होता है।

चित्रकूट में जब राम और भरत का मिलन होता है तो दोनों भाई एक-दूसरे को देखकर विलाप कर रहे हैं। राम भरत को राज करने को कहते हैं और भरत राम का सेवक होने के चलते राम के चरण में ही शांति मिलने की बात कहते हैं। दोनों में लेश मात्र का भी लोभ नहीं है, इसीलिए राम जंगल में वनवासी थे तो भरत ने महल में रहते हुए भी वनवासी का जीवन व्यतीत किया। ऐसा उदाहरण दुर्लभ है।

रामचरित मानस की कथा युवाओं को यही संदेश देता है कि जीवन को आनंददायक बनाना है तो सत्य, प्रेम और करुणा का भाव मन में होना ही चाहिए। राम ही अंतिम सत्य हैं। जो राम को जान लेता है उसके अंदर प्रेम और करुणा का भाव होना सहज स्वाभाविक ही है।

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