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मोरारी बापू ने कथा सुनाकर युवाओं को किया सचेत, बोले- ज्यादा मंथन करोगे तो हलाहल ही निकलेगा
Sun, 24 Jan 2021 06:22 PM IST
vivek shukla
अमर उजाला नेटवर्क, कुशीनगर।
अमर उजाला नेटवर्क, कुशीनगर।
Published by: vivek shukla
Updated Sun, 24 Jan 2021 06:22 PM IST
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रामकथा के दूसरे दिन कथा वाचन करते संत मोरारी बापू।
- फोटो : अमर उजाला।
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रामकथा के दूसरे दिन कथा वाचक मोरारी बापू ने युवाओं को उत्साहित करने के साथ-साथ नई तकनीक के दुष्परिणाम से अवगत कराते हुए भविष्य के लिए सचेत भी किया। बापू ने कहा कि ज्यादा मंथन करोगे तो हलाहल (विष) ही निकलेगा। जिसे पान करने के लिए शिव की तलाश करनी होगी।
रामकथा के दौरान मुक्ति के उपायों और मोक्ष के अर्थ समझाने के दौरान मोरारी बापू ने कहा कि युवा पीढ़ी अधिक व्यस्त है। उसकी व्यस्तता चिंता का कारण है। व्यस्तता का बड़ा कारण तकनीक का अधिक प्रयोग है। युवा चिंतन में लगे रहते हैं। कम समय में अधिक से अधिक काम करना चाहते हैं।
मोरारी बापू ने समुद्र मंथन की कथा का जिक्र करते हुए कहा कि कार्य तो भलाई के लिए हो रहा था और रत्न निकल भी रहे थे परंतु न तो देवताओं को संतोष था और न ही असुरों को। अधिक से अधिक रत्न निकालने की चाह में मंथन होता गया और एक समय ऐसा आया जब विष निकलने लगा जिसे कोई पीने को तैयार नहीं था। सब त्राहि-त्राहि करते हुए भगवान शिव के पास पहुंचे। भगवान शिव ने विष को पिया और राम का नाम लिया। उन्होंने कहा कि युवा नई तकनीक का प्रयोग करें, खोज करें लेकिन चिंतन अधिक न करें। लगातार नई तकनीक में डूबे रहने की आदत का असर नकारात्मक होगा।
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रामकथा के दौरान मुक्ति के उपायों और मोक्ष के अर्थ समझाने के दौरान मोरारी बापू ने कहा कि युवा पीढ़ी अधिक व्यस्त है। उसकी व्यस्तता चिंता का कारण है। व्यस्तता का बड़ा कारण तकनीक का अधिक प्रयोग है। युवा चिंतन में लगे रहते हैं। कम समय में अधिक से अधिक काम करना चाहते हैं।
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मोरारी बापू ने समुद्र मंथन की कथा का जिक्र करते हुए कहा कि कार्य तो भलाई के लिए हो रहा था और रत्न निकल भी रहे थे परंतु न तो देवताओं को संतोष था और न ही असुरों को। अधिक से अधिक रत्न निकालने की चाह में मंथन होता गया और एक समय ऐसा आया जब विष निकलने लगा जिसे कोई पीने को तैयार नहीं था। सब त्राहि-त्राहि करते हुए भगवान शिव के पास पहुंचे। भगवान शिव ने विष को पिया और राम का नाम लिया। उन्होंने कहा कि युवा नई तकनीक का प्रयोग करें, खोज करें लेकिन चिंतन अधिक न करें। लगातार नई तकनीक में डूबे रहने की आदत का असर नकारात्मक होगा।
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मोरारी बापू ने कहा कि काम, क्रोध, लोभ और मोह सांसारिक जीवन का हिस्सा है। प्रत्येक व्यक्ति में इसका भाव होना स्वाभाविक है लेकिन ईर्ष्या, द्वेष व निंदा का जीवन में कोई काम नहीं है। यह समुद्र मंथन से निकले हलाहल (विष) के समान है। हालांकि अब धर्म क्षेत्र में भी ईर्ष्या, द्वेष व निंदा का असर है जो उचित नहीं है। कलियुग में सभी समस्याओं का निदान केवल रामनाम संकीर्तन में है। इसका जप करने के लिए कोई नियम या विद्वता की जरूरत नहीं।
मानस में वर्णित आठ निर्वाण की व्याख्या करते हुए मोरारी बापू ने कहा कि हमारा निर्वाण हमारी मुट्ठी में है। मेरे लिए रामचरित मानस ही निर्वाण है। इसमें गोस्वामी तुलसीदास ने ईश्वर की भक्ति का मार्ग बताया है। वैष्णव कभी मुक्ति नहीं चाहते। मंत्रों का जाप करने के लिए विधियों का ज्ञान और पालन जरूरी है जबकि राम नाम का संकीर्तन करने के लिए किसी भी प्रकार के उपाय की जरूरत नहीं है। आप, सोते-जागते, घूमते जब भी मौका मिले, राम नाम का जाप कर सकते हैं।
निर्वाण की चर्चा के दौरान ही मोरारी बापू ने महाभारत काल का उल्लेख करते हुए कि भीष्म को बाणों की शैय्या पर लेटकर वक्त बदलने का इंतजार करना पड़ा। इसका कारण समझाते हुए कहा कि हर घर में एक भीष्म पाया जाता है। जो अपने प्रियजनों की भलाई के लिए हर कुर्बानी देता है लेकिन वही प्रियजन अगर गलत काम करते हैं तो उसका प्रायश्चित भी उस परिवार के भिष्म को करना पड़ता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार के भीष्म को खोजे और यह सोचे कि वह जो कष्ट पा रहे हैं वह हमारी किस गलती का परिणाम है।
मानस में वर्णित आठ निर्वाण की व्याख्या करते हुए मोरारी बापू ने कहा कि हमारा निर्वाण हमारी मुट्ठी में है। मेरे लिए रामचरित मानस ही निर्वाण है। इसमें गोस्वामी तुलसीदास ने ईश्वर की भक्ति का मार्ग बताया है। वैष्णव कभी मुक्ति नहीं चाहते। मंत्रों का जाप करने के लिए विधियों का ज्ञान और पालन जरूरी है जबकि राम नाम का संकीर्तन करने के लिए किसी भी प्रकार के उपाय की जरूरत नहीं है। आप, सोते-जागते, घूमते जब भी मौका मिले, राम नाम का जाप कर सकते हैं।
निर्वाण की चर्चा के दौरान ही मोरारी बापू ने महाभारत काल का उल्लेख करते हुए कि भीष्म को बाणों की शैय्या पर लेटकर वक्त बदलने का इंतजार करना पड़ा। इसका कारण समझाते हुए कहा कि हर घर में एक भीष्म पाया जाता है। जो अपने प्रियजनों की भलाई के लिए हर कुर्बानी देता है लेकिन वही प्रियजन अगर गलत काम करते हैं तो उसका प्रायश्चित भी उस परिवार के भिष्म को करना पड़ता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार के भीष्म को खोजे और यह सोचे कि वह जो कष्ट पा रहे हैं वह हमारी किस गलती का परिणाम है।
सांसारिक जीवन के बंधनों की चर्चा करते हुए मोरारी बापू ने कहा कि जीवन को चलाने के लिए काम भी जरूरी है। व्यवस्थाएं ठीक रहें, इसके लिए क्रोध भी करना पड़ता है। धन का लोभ होना भी स्वाभाविक है लेकिन इसमें से किसी की भी अधिकता नहीं होनी चाहिए। अगर ये सभी संतुलित रहें तो जीवन को सुखमय बनाती हैं। परंतु जीवन में ईर्ष्या, द्वेष और निंदा का कोई काम नहीं। इसके बिना ही जीवन बेहतर चल सकता है। आध्यात्मिक लोग इससे ऊपर होने का दावा करते हैं लेकिन अब धर्म क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। सामने आने पर दंडवत करते हैं और पीठ पीछे डंडा उठाने की मानसिकता भी रखते हैं।
भोग और प्रेम का अंतर समझाते हुए मोरारी बापू ने कहा कि भोग से जीवन में शिथिलता आती है जबकि प्रेम से जीवन में उत्साह का संचार होता है। प्रेम मिलने पर बुजुर्ग भी खुद को नौजवान समझने लगता है। अंत में भातृहरि और गोपीचंद की कथा सुनाते हुए दूसरे दिन की कथा को विश्राम दिया गया।
इस दौरान अमर तुलस्यान, गौरव बथवाल, विक्रम अग्रवाल, प्रांजल तुलस्यान, सुधीर वर्मा, सुमित त्रिपाठी, अजय कुमार पोद्दार, देवांश पोद्दार, मारकंडेय शाही,आशीष रूंगटा समेत कई लोग मौजूद रहे।
भोग और प्रेम का अंतर समझाते हुए मोरारी बापू ने कहा कि भोग से जीवन में शिथिलता आती है जबकि प्रेम से जीवन में उत्साह का संचार होता है। प्रेम मिलने पर बुजुर्ग भी खुद को नौजवान समझने लगता है। अंत में भातृहरि और गोपीचंद की कथा सुनाते हुए दूसरे दिन की कथा को विश्राम दिया गया।
इस दौरान अमर तुलस्यान, गौरव बथवाल, विक्रम अग्रवाल, प्रांजल तुलस्यान, सुधीर वर्मा, सुमित त्रिपाठी, अजय कुमार पोद्दार, देवांश पोद्दार, मारकंडेय शाही,आशीष रूंगटा समेत कई लोग मौजूद रहे।