फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Gorakhpur News ›   Mobile phones, plastic toys destroyed clay toys business in gorakhpur

बच्चों के लोकप्रिय खेल पर लगा मॉडर्न जमाने का ग्रहण, दिवाली में इस खेल से दूर हुए बच्चे

Mon, 09 Nov 2020 04:12 PM IST
vivek shukla अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर।
अविनाश श्रीवास्तव, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Mon, 09 Nov 2020 04:12 PM IST
विज्ञापन
Mobile phones, plastic toys destroyed clay toys business in gorakhpur
मिट्टी के खिलौने। - फोटो : अमर उजाला।
एक दशक पहले तक दिवाली के दौरान बच्चे मिट्टी के खिलौनों से खेला करते थे। घर की छतों और आंगन में मिट्टी से ईंटें जोड़ घरौंदा बनाते थे और मिट्टी से बने खिलौने सजाते थे। आस-पड़ोस के बच्चे एकत्रित होकर मिट्टी के छोटे बर्तनों और चूल्हे पर खाना पकाने का खेल खेला करते थे। आधुनिकता ने बच्चों के इस लोकप्रिय खेल को छीन लिया है। अब मुश्किल से दिवाली के समय मिट्टी के खिलौने बिकते नजर आते हैं।
विज्ञापन

 
दिवाली का पर्व आने के एक माह पहले से ही चाक पर मिट्टी के खिलौनों और बर्तन बनाने वाले कुम्हारों के चाक दिन-रात चलने लगते थे। इस मेहनत से वह साल भर का खर्चा निकालते थे। खास बात यह रहती थी कि कुम्हार बड़ों की पूजा अर्चना के लिए दिये, लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा बनाते थे तो बच्चों के लिए खिलौने बनाना नहीं भूलते थे। ऐसा लगभग एक दशक पहले तक होता था। अब कुम्हार मिट्टी के खिलौने नहीं बनाना चाहते हैं, क्योंकि खिलौनों के कद्रदान नहीं रह गए हैं।
विज्ञापन


मिट्टी के खिलौने बनाने वाले कलाकारों ने बताया कि पहले मिट्टी के खिलौने से अच्छा कारोबार हो जाता था। गांव के साथ ही शहर में भी इनकी खूब बिक्री होती थी। बच्चे माता-पिता से जिद कर इन खिलौनों को खरीदते थे, लेकिन अब बच्चों में मिट्टी के खिलौनों को लेकर कोई रुचि नहीं है। वह मोबाइल और प्लास्टिक के खिलौनों में व्यस्त हो गए हैं। इससे हम लोगों के खिलौनों का कारोबार चौपट हो गया है। 
विज्ञापन
विज्ञापन

Mobile phones, plastic toys destroyed clay toys business in gorakhpur
कलाकारों ने कहा- आधुनिकता में खो गए मिट्टी के खिलौने। - फोटो : अमर उजाला।
कलाकार सुमित्रा देवी ने बताया कि लगभग एक दशक पहले दो हजार से अधिक मिट्टी के खिलौनों का सेट बनाते थे तो वह भी कम पड़ जाते थे। अब अधिकतम दो सौ सेट खिलौने बनाती हूं। वह भी मुश्किल से बिकते हैं। पहले जो खिलौने दो से पांच रुपये के बीच बेचते थे वह अब 20 से 30 रुपये के बीच बिक रहे हैं।
 
कलाकार स्वामीनाथ ने बताया कि पहले हम लोगों को मिट्टी आसानी से मिल जाती थी। दिवाली के समय खिलौनों को बनाकर परिवार का भरण पोषण करते थे, लेकिन अब मिट्टी महंगी हो गई है। खिलौनों को बनाना काफी महंगा पड़ता है। नुकसान से बचने के लिए खिलौनों को बनाना बंद कर दिया।
 
विकास श्रीवास्तव ने बताया कि बचपन में दिवाली के समय मिट्टी के खिलौनों से खूब खेला करते थे। दिवाली के दौरान होने वाली स्कूल की छुट्टी ऐसे खिलौनों से खेलते हुए बीत जाती थी, लेकिन अब के बच्चे इन खिलौनों से खेलना पसंद नहीं करते हैं।
 
अजय शर्मा ने बताया कि दिवाली के दौरान बचपन के वह दिन भूले नहीं भूलते हैं। भूजा और मिठाई के साथ सभी भाई-बहन छत पर बने घरौंदे में मिट्टी के खिलौनों से खेलते थे। अब के बच्चे मोबाइल और आधुनिक खिलौनों के आगे मिट्टी के खिलौनों को पसंद नहीं करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed