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Gorakhpur News: अब सूरज की रोशनी से साफ होगा कारखानों का गंदा पानी
Fri, 10 Jul 2026 02:50 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
Updated Fri, 10 Jul 2026 02:50 AM IST
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गोरखपुर। कारखानों का गंदा पानी सूरज की रोशनी से साफ हो सकेगा। साथ ही दवा और केमिकल उद्योगों में उपयोग होने वाली रासायनिक तत्वों का भी असर कम हो जाएगा। यह संभव हो होगा बायोकॉम्पोजिट फोटोकैटलिस्ट तकनीक से, जिसे मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमएमएमयूटी) के शोधकर्ताओं ने विकसित किया है। विश्वविद्यालय की ओर से विकसित औद्योगिक अपशिष्ट जल को कम लागत और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से शुद्ध करने वाली तकनीक को भारत सरकार ने पेटेंट प्रदान किया है।
आठ जुलाई 2026 को मिले इस पेटेंट का शीर्षक ''चिटोसान–जेडएसएम-5 बायोकॉम्पोजिट फोटोकैटलिस्ट'' है। तकनीक का विकास रसायन एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रो. राजेश कुमार यादव के निर्देशन में पीएचडी शोधार्थी गीता श्रीवास्तव तथा डॉ. रेहाना शाहिन, कंचन शर्मा और शैफाली मिश्रा ने किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके संचालन के लिए अल्ट्रावायलेट (यूवी) किरणों की आवश्यकता नहीं होती। सूरज की रोशनी से ही यह औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद हानिकारक रंगों का विघटन कर देती है। इससे ऊर्जा की खपत कम होती है और जल शोधन की लागत भी घटती है। यह तकनीक केवल गंदे पानी की सफाई तक सीमित नहीं है। रासायनिक और औषधि उद्योगों में उपयोग होने वाले सल्फाइड यौगिकों के ऑक्सीकरण में भी यह प्रभावी साबित होगी।
बोलीं कुलपति यह पेटेंट विश्वविद्यालय की मजबूत शोध संस्कृति और नवाचार को दिए जा रहे प्रोत्साहन का परिणाम है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह तकनीक भविष्य में उद्योगों और शोध संस्थानों के साथ सहयोग के नए अवसर खोलने के साथ पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक अपशिष्ट जल प्रबंधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देगी।
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- प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा, कुलपति
ऐसे काम करती है तकनीक
कपड़ा, चमड़ा, कागज और रासायनिक उद्योगों के अपशिष्ट जल में मौजूद जहरीले रंग को यह प्रकाश की सहायता से तोड़कर कम हानिकारक पदार्थों में बदल देती है। रासायनिक एवं औषधि उद्योगों में प्रयुक्त सल्फाइड यौगिकों को यह नियंत्रित एवं पर्यावरण-अनुकूल तरीके से उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करने में मदद करती है। इससे रासायनिक प्रक्रियाएं अधिक सुरक्षित और स्वच्छ बनती हैं।
तकनीक के फायदे
औद्योगिक अपशिष्ट जल के उपचार में लागत कम आएगी।
पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल है।
औषधि एवं फाइन केमिकल उद्योगों में स्वच्छ उत्पादन होगा।
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आठ जुलाई 2026 को मिले इस पेटेंट का शीर्षक ''चिटोसान–जेडएसएम-5 बायोकॉम्पोजिट फोटोकैटलिस्ट'' है। तकनीक का विकास रसायन एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रो. राजेश कुमार यादव के निर्देशन में पीएचडी शोधार्थी गीता श्रीवास्तव तथा डॉ. रेहाना शाहिन, कंचन शर्मा और शैफाली मिश्रा ने किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके संचालन के लिए अल्ट्रावायलेट (यूवी) किरणों की आवश्यकता नहीं होती। सूरज की रोशनी से ही यह औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद हानिकारक रंगों का विघटन कर देती है। इससे ऊर्जा की खपत कम होती है और जल शोधन की लागत भी घटती है। यह तकनीक केवल गंदे पानी की सफाई तक सीमित नहीं है। रासायनिक और औषधि उद्योगों में उपयोग होने वाले सल्फाइड यौगिकों के ऑक्सीकरण में भी यह प्रभावी साबित होगी।
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बोलीं कुलपति यह पेटेंट विश्वविद्यालय की मजबूत शोध संस्कृति और नवाचार को दिए जा रहे प्रोत्साहन का परिणाम है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह तकनीक भविष्य में उद्योगों और शोध संस्थानों के साथ सहयोग के नए अवसर खोलने के साथ पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक अपशिष्ट जल प्रबंधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देगी।
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- प्रो. अनुपमा कौशिक शर्मा, कुलपति
ऐसे काम करती है तकनीक
कपड़ा, चमड़ा, कागज और रासायनिक उद्योगों के अपशिष्ट जल में मौजूद जहरीले रंग को यह प्रकाश की सहायता से तोड़कर कम हानिकारक पदार्थों में बदल देती है। रासायनिक एवं औषधि उद्योगों में प्रयुक्त सल्फाइड यौगिकों को यह नियंत्रित एवं पर्यावरण-अनुकूल तरीके से उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करने में मदद करती है। इससे रासायनिक प्रक्रियाएं अधिक सुरक्षित और स्वच्छ बनती हैं।
तकनीक के फायदे
औद्योगिक अपशिष्ट जल के उपचार में लागत कम आएगी।
पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल है।
औषधि एवं फाइन केमिकल उद्योगों में स्वच्छ उत्पादन होगा।