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श्रीमद्भागवत कथा का छठवां दिन: कृष्ण की लीलाएं सुन भाव विभोर हुए श्रद्धालु
Wed, 08 Jan 2020 10:00 PM IST
विजय जैन
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
डिजिटल न्यूज डेस्क, गोरखपुर
Published by: विजय जैन
Updated Wed, 08 Jan 2020 10:00 PM IST
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श्रीमद्भागवत कथा में शामिल लोग।
- फोटो : अमर उजाला
मां भक्ति ज्ञान गंगा सेवा संस्थान की ओर से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अंतर्गत बुधवार को कथा व्यास पंडित बालक दास महाराज ने श्रीकृष्ण की सुंदर लीलाओं को सुनाकर भक्तों को भावविभोर कर दिया।
भव्या मैरेज हाउस में आयोजित कथा में बालक दास ने कहा कि चुंबक सहज स्वभाव से लोहे को अपनी ओर खींच लेता है। ठीक वैसे ही मोहन की ये मोहनी कथा है। यह सभी के मन को अचानक से जो भी एक बार इसकी शरण में आता है उसे हमेशा के लिए मोह लेती है। फिर उसे कभी नहीं छोड़ती। वो आत्माएं पवित्र हैं, धन्य हैं जो अपने पवित्र मन को गोविंद और उसकी कथाओं में लगा देती हैं।
उन्होंने कहा कि जैसे जल को कहीं भी गिरा दो, जहां ढलान होगा वो वहीं जाएगा। ये जल का स्वभाव है। ठीक वैसे ही हमारे मन की स्थिति होती है। मन स्वाभाविक तौर पर गलत रास्ते पर ही जाना पसंद करता है। जो अनुचित है, मन स्वभावत: उधर ही जाता है। जैसे जल का स्वभाव है कि नीचे की ओर जाना, वैसे ही मन का स्वभाव है बुरे मार्ग पर जाना। जब लगे कि संसार में बहुत कलेश, परेशानियां हैं तो कभी-कभी एकांत में भी बैठना चाहिए। एक दिन में कम से कम 10 मिनट अकेले में बैठना चाहिए। अकेले बैठकर खुद की साधना बढ़ानी चाहिए। अकेले बैठने से मन को बहुत शांति मिलती है।
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भव्या मैरेज हाउस में आयोजित कथा में बालक दास ने कहा कि चुंबक सहज स्वभाव से लोहे को अपनी ओर खींच लेता है। ठीक वैसे ही मोहन की ये मोहनी कथा है। यह सभी के मन को अचानक से जो भी एक बार इसकी शरण में आता है उसे हमेशा के लिए मोह लेती है। फिर उसे कभी नहीं छोड़ती। वो आत्माएं पवित्र हैं, धन्य हैं जो अपने पवित्र मन को गोविंद और उसकी कथाओं में लगा देती हैं।
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उन्होंने कहा कि जैसे जल को कहीं भी गिरा दो, जहां ढलान होगा वो वहीं जाएगा। ये जल का स्वभाव है। ठीक वैसे ही हमारे मन की स्थिति होती है। मन स्वाभाविक तौर पर गलत रास्ते पर ही जाना पसंद करता है। जो अनुचित है, मन स्वभावत: उधर ही जाता है। जैसे जल का स्वभाव है कि नीचे की ओर जाना, वैसे ही मन का स्वभाव है बुरे मार्ग पर जाना। जब लगे कि संसार में बहुत कलेश, परेशानियां हैं तो कभी-कभी एकांत में भी बैठना चाहिए। एक दिन में कम से कम 10 मिनट अकेले में बैठना चाहिए। अकेले बैठकर खुद की साधना बढ़ानी चाहिए। अकेले बैठने से मन को बहुत शांति मिलती है।
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