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Gorakhpur News: नासा-ईएसई की तरह एशियाई देशों के लिए भी स्पेस एजेंसी
Fri, 30 Aug 2024 01:44 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
Updated Fri, 30 Aug 2024 01:44 AM IST
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-एमएमएमयूटी के नौवें दीक्षांत समारोह में बोले मुख्य अतिथि इसरो के पूर्व निदेशक एस नंबी नारायणन
संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। इसरो के पूर्व निदेशक व वैज्ञानिक, पद्मभूषण से सम्मानित एस नंबी नारायणन ने कहा कि नासा (नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) एवं ईएसए (यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी) की तरह एशियाई देशों के लिए भी एक स्पेस एजेंसी होनी चाहिए। तभी हम लोग इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकेंगे। चंद्रयान मिशन में हमें नासा और ईएसए से बहुत मदद मिली।
वह मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमएमएमयूटी) के नौवें दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। उन्होंने संघर्षों को याद करते हुए कहा कि पहले इसरो के पास केवल तीन पुरानी बिल्डिंग थीं। 23 लोग ही वहां काम करने वाले थे। हमारे सारे इंजन हल्के थे। आज वहां करीब 25 हजार लोग कार्यरत हैं। 1974 में हम लोग लिक्विड रॉकेट पर काम करने लगे। हल्का हाेने के बावजूद उस समय हमारा एक भी इंजन फेल नहीं हुआ। अब हम अंतरिक्ष में स्टेशन बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इस समय इसरो गगनयान मिशन पर काम कर रहा है। टॉपर एवं उपाधि लेने वाले विद्यार्थियों से कहना चाहूंगा कि अंतरिक्ष का फील्ड बहुत मजेदार है। उनको आगे आना चाहिए। चाहे किसी भी तरह पर एक बार वे इसका अध्ययन जरूर करें। इसरो, रॉकेट साइंस एवं इसके मिशन को समझें।
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रॉकेट साइंस ने भारत को दिलाई मजबूती
एस नंबी नारायणन ने दूसरे विश्व युद्ध से जुड़ी एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय हिटलर भी वी टू रॉकेट बनाना चाहता था, वह कामयाब नहीं हुआ वरना दुनिया को अपना गुलाम बना लिया होता। उन्होंने बताया कि पहले रूस, अमेरिका और फ्रांस ही रॉकेट साइंस में मजबूत थे। खासकर रूस और अमेरिका में प्रतिस्पर्धा थी। इसके बाद फ्रांस ने भी लिक्विड रॉकेट बनाना शुरू कर दिया। भारत में डॉ. विक्रम साराभाई ने रॉकेट साइंस की नींव रखी। रूस, अमेरिका और फ्रांस के सहयोग से भारत में रॉकेट साइंस का ब्लूप्रिंट तैयार किया। 1966 में डॉ. होमी जहांगीर भाभा की मृत्यु के बाद डाॅ. साराभाई चेयरमैन बने। डॉ. विक्रम साराभाई, डॉ. यूआर राव और डॉ. सतीश धवन ने भारत में रॉकेट साइंस को मजबूती दिलाई।
इंजीनियरिंग की विधा महत्वपूर्ण: आशीष पटेल
दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे प्रौद्योगिकी शिक्षा राज्य मंत्री आशीष पटेल
संवाद न्यूज एजेंसी
गोरखपुर। प्रदेश सरकार में प्रौद्योगिकी शिक्षा राज्य मंत्री आशीष पटेल ने कहा कि तकनीकि शिक्षा प्रदान करने में मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जब यह विश्वविद्यालय कॉलेज था, तब भी यहां से निकली प्रतिभाएं देश-विदेश में अपनी प्रतिभा का डंका बजा रही थीं। उन्होंने कहा कि इंजीनियरिंग की विधा महत्वपूर्ण है, इसमें नवाचार कर छात्र अपना नाम रोशन कर सकते हैं।
वह एमएमएमयूटी के दीक्षांत समारोह में बतौर विशिष्ट अतिथि बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी दिनों दिन प्रगति कर रहा है। इसके लिए यहां के शिक्षक बधाई के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि आज प्रदेश के तीनों तकनीकि विश्वविद्यालय अच्छा काम कर रहे हैं। उन्होंने दीक्षांत में उपाधि और पदक प्राप्त करने वाले छात्रों का आह्वान किया कि वह यहां से निकलकर विकसित भारत की संकल्पना को पूरा करने में सहयोग प्रदान करें।
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गोरखपुर। इसरो के पूर्व निदेशक व वैज्ञानिक, पद्मभूषण से सम्मानित एस नंबी नारायणन ने कहा कि नासा (नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) एवं ईएसए (यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी) की तरह एशियाई देशों के लिए भी एक स्पेस एजेंसी होनी चाहिए। तभी हम लोग इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकेंगे। चंद्रयान मिशन में हमें नासा और ईएसए से बहुत मदद मिली।
वह मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमएमएमयूटी) के नौवें दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। उन्होंने संघर्षों को याद करते हुए कहा कि पहले इसरो के पास केवल तीन पुरानी बिल्डिंग थीं। 23 लोग ही वहां काम करने वाले थे। हमारे सारे इंजन हल्के थे। आज वहां करीब 25 हजार लोग कार्यरत हैं। 1974 में हम लोग लिक्विड रॉकेट पर काम करने लगे। हल्का हाेने के बावजूद उस समय हमारा एक भी इंजन फेल नहीं हुआ। अब हम अंतरिक्ष में स्टेशन बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
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उन्होंने कहा कि इस समय इसरो गगनयान मिशन पर काम कर रहा है। टॉपर एवं उपाधि लेने वाले विद्यार्थियों से कहना चाहूंगा कि अंतरिक्ष का फील्ड बहुत मजेदार है। उनको आगे आना चाहिए। चाहे किसी भी तरह पर एक बार वे इसका अध्ययन जरूर करें। इसरो, रॉकेट साइंस एवं इसके मिशन को समझें।
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रॉकेट साइंस ने भारत को दिलाई मजबूती
एस नंबी नारायणन ने दूसरे विश्व युद्ध से जुड़ी एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय हिटलर भी वी टू रॉकेट बनाना चाहता था, वह कामयाब नहीं हुआ वरना दुनिया को अपना गुलाम बना लिया होता। उन्होंने बताया कि पहले रूस, अमेरिका और फ्रांस ही रॉकेट साइंस में मजबूत थे। खासकर रूस और अमेरिका में प्रतिस्पर्धा थी। इसके बाद फ्रांस ने भी लिक्विड रॉकेट बनाना शुरू कर दिया। भारत में डॉ. विक्रम साराभाई ने रॉकेट साइंस की नींव रखी। रूस, अमेरिका और फ्रांस के सहयोग से भारत में रॉकेट साइंस का ब्लूप्रिंट तैयार किया। 1966 में डॉ. होमी जहांगीर भाभा की मृत्यु के बाद डाॅ. साराभाई चेयरमैन बने। डॉ. विक्रम साराभाई, डॉ. यूआर राव और डॉ. सतीश धवन ने भारत में रॉकेट साइंस को मजबूती दिलाई।
इंजीनियरिंग की विधा महत्वपूर्ण: आशीष पटेल
दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे प्रौद्योगिकी शिक्षा राज्य मंत्री आशीष पटेल
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गोरखपुर। प्रदेश सरकार में प्रौद्योगिकी शिक्षा राज्य मंत्री आशीष पटेल ने कहा कि तकनीकि शिक्षा प्रदान करने में मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जब यह विश्वविद्यालय कॉलेज था, तब भी यहां से निकली प्रतिभाएं देश-विदेश में अपनी प्रतिभा का डंका बजा रही थीं। उन्होंने कहा कि इंजीनियरिंग की विधा महत्वपूर्ण है, इसमें नवाचार कर छात्र अपना नाम रोशन कर सकते हैं।
वह एमएमएमयूटी के दीक्षांत समारोह में बतौर विशिष्ट अतिथि बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी दिनों दिन प्रगति कर रहा है। इसके लिए यहां के शिक्षक बधाई के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि आज प्रदेश के तीनों तकनीकि विश्वविद्यालय अच्छा काम कर रहे हैं। उन्होंने दीक्षांत में उपाधि और पदक प्राप्त करने वाले छात्रों का आह्वान किया कि वह यहां से निकलकर विकसित भारत की संकल्पना को पूरा करने में सहयोग प्रदान करें।