हीरामन के जज्बे से हार गई दिव्यांगता, ऐसे चला रहे हैं अपने घर की गाड़ी
अगर मनुष्य अपने इरादे को मजबूत कर ले तो हौंसला, मेहनत, कर्म और जज्बे से कोई भी जंग लड़ सकता है। इसका सटीक उदाहरण दिव्यांग हीरामन हैं। हीरामन दोनों पैरों से विकलांग हैं।
पांचवी तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब आर्थिक तंगी और परिवार का बोझ सामने आई तो हिरामन ने बेकरी फैक्ट्री में कार्य करने लगे। उन्होंने अपने काम के बीच कभी दिव्यांगता को आड़े नहीं आने दिया। वह अपनी मेहनत से पत्नी सहित कुल परिवार के पांच सदस्यों का भरण पोषण आसानी से कर रहे हैं।
बेकरी फैक्टरी के मालिक रामू भारती बताते हैं कि क्षेत्र के ठूठीबारी गांव निवासी हीरामन की माता गौरा और पिता बनारसी की मौत बचपन में ही हो गई थी। हीरामन दो भाइयों में छोटे हैं। बड़े भाई बिकाऊ की करीब पांच वर्ष पहले एक हादसें में मौत हो गई।
वही बड़े भाई की अचानक मौत के बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी हीरामन के कंधों पर आ गई। बता दें, जन्म के समय हीरामन पोलियों का शिकार हो गए थे जिससे उनका दोनों पैर बेकार हो गया। बावजूद इसके हीरामन अपनी दिव्यांगता को अभिशाप नहीं बनने दिया। वहीं परिवार की हालत ठीक न होने के कारण काम की तलाश में फैक्टरी आ पहुंचा। यहां पर उसने पूरे जज्बे और लगन से कामकर अपने पूरे परिवार का भरण पोषण कर रहा है।
बगैर पैरों के भी बखूबी से जी सकते हैं जिंदगी
हीरामन कहते हैं कि पत्नी पिंगला भी दिव्यांग हैं। दोनों से तीन बच्चें कुलदीप, रूखमणी और छोटी है। कहा कि दुनिया में सिर्फ एक ही दिव्यंगता है और वह है नकारात्मक सोच। इन्होंने अपनी शारीरिक अक्षमता को कमजोरी नहीं बनने दिया।
जीवन से संघर्ष करो, समझौता नहीं
हिरामन की सोच है कि जीवन से संघर्ष करो, समझौता नहीं और इस सोच को उन्होंने बचपन से ही साकार किया है। वह बताते हैं, अचानक हादसें से बड़े भाई की मौत के बाद मैंने विकलांगता को कभी आड़े नहीं आने दिया। हमेशा उससे संघर्ष करता रहा।