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भारत की पहली ट्राम-वे रेल परियोजना इतिहास के पन्नों में दफन, 1924 में हुई थी इसकी शुरूआत

Tue, 09 Jun 2020 05:45 PM IST
vivek shukla संजय कुमार पांडेय, महराजगंज।
संजय कुमार पांडेय, महराजगंज। Published by: vivek shukla Updated Tue, 09 Jun 2020 05:45 PM IST
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India first tramway rail project special story in maharajganj
ट्राम-वे रेल। - फोटो : अमर उजाला।

महराजगंज के लक्ष्मीपुर रेंज में ब्रिटिश हुकूमत की 22 किमी ट्राम-वे रेल परियोजना इतिहास के पन्नो में दफन हो गई। उसे संवारने के लिए अब तक कारगर पहल नहीं हुई। रेलवे लाइन जमीन में धंस गई। जबकि शासन के निर्देश पर ट्राम-वे की अन्य लौह संपदा को संरक्षित किया गया है।

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सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग की बहुमूल्य वनसंपदा को दुर्गम वन क्षेत्र से मुख्य रेल लाइन तक लाने के लिए ब्रिटिश हुकूमत के दौरान वर्ष 1924 में लक्ष्मीपुर रेलवे स्टेशन के निकट भारत की पहली ट्राम-वे रेल परियोजना स्थापित की गई थी।
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लक्ष्मीपुर रेंज और उत्तरी चौक रेंज के जंगल में चौराहा नामक स्थान तक 22.4 किमी दूरी तक रेल लाइन बिछाईं गई थी। निरंतर 55 वर्षो की सेवा करके 8 लाख घाटे के बाद 1982 में भारत की पहली ट्राम-वे रेल परियोजना को बंद करना पड़ा। इसमें शामिल प्रत्येक 40 अश्व शक्ति के 4 इंजन, 26 बोगियां व सैलून, 2 निरीक्षण ट्राली सहित तमाम उपकरणों को लक्ष्मीपुर एकमा डिपो में रखा गया था। वर्ष 2009 में सरकार के निर्देश पर एक इंजन, एक सैलून एवं एक बोगी को लखनऊ चिड़ियाघर में रखवा दिया गया।

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संरक्षित करने का हुआ प्रयास

इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करने का प्रयास हुआ। शासन के निर्देश पर बार्डर एरिया डब्लपमेंट वर्ष 2015-16 के तहत विरासत स्थल के रूप में ट्राम-वे रेल परियोजना लक्ष्मीपुर चयनित है। इसके सुरक्षा एवं ग्रामीण पर्यटन विकास लिए लक्ष्मीपुर के एकमा में स्थित ट्राम-वे रेल परियोजना के प्रारंभिक बिंदु एकमा डिपो परिसर में रखे इंजन, टंडल, सैलून बोगी, स्पेशल बोगी, गार्डयान एवं अन्य उपकरणों को देखने के लिए रखा गया है।

जमीन में धंसी रेल की पटरी की फिक्र नहीं
एक तरफ तो ट्राम-वे इंजन, अन्य उपकरण आदि को संरक्षित किया गया लेकिन जंगल के बीच में जंग खाकर जमीन में धंसी रेल की पटरी को सुरक्षित करने की  फिक्र तक नहीं है। कई स्थानों पर ट्राम-वे रेल लाइन को उखाड़ दिया गया है। कोल्हुआ ढाला, अचलगढ़, टिनकोनिया, जंगल गुलहरिया, कजरी, टेढ़ीघाट वन विश्रामालय के सामने के ट्राम-वे रेल लाइन पटरी नाम मात्र की रह गई है।

 

कब कितना लाभ हुआ ट्राम-वे से

ट्राम-वे रेल परियोजना अपने संचालन के समय घाटे का सौदा नहीं थी। पता नहीं किन कारणों से घाटा दिखाकर बंद कर दिया गया। अभिलेखों के अनुसार वर्ष 1924 से लेकर 31 मार्च 1980 तक ट्राम-वे रेल परियोजना की देख रेख में कुल 31 लाख 48 हजार 21 रुपये के खर्च दर्ज है। जबकि 34 लाख 3764 रुपये की कमाई भी दर्ज की गई है।

वर्ष 1967-68 तक ट्राम वे  रेल परियोजना ने अच्छा खासा लाभ कमाया लेकिन उसके बाद 1971 से 74 तक वर्षो को छोड़कर निरस्तर में इसमें घाटा रहा। 1975 में 54,806 रुपये,1976 में 15 लाख 735 रुपये, 1667 में 20 लाख 2303 रुपये, 1978 में 21 लाख 7886 रुपया, 1979 में 10 लाख 5097 रुपये तथा 1980 में 44646 रुपया वार्षिक घाटा दिखाया गया। इतना ही नहीं 55 वर्षो की निरन्तर सेवा के दौरान इंजन, बोगियों तथा रेल पटरियों की दशा में गिरावट दर्ज की गई।

संरक्षित हैं ट्राम-वे के पुर्जे
डीएफओ पुष्प कुमार कांधला ने बताया कि ट्राम-वे के पुर्जे को सुरक्षित रखा गया है। इसे धरोहर के रूप से संजोया गया है। ट्राम वे रेल परियोजना को सुदृढ करने के लिए प्रयास किया ता रहा है। इसको दुरूस्त करने के लिए ज्यादा रकम व्यय होने का अनुमान है। आर्किटेक्ट को बुलाकर इस व्यय का आंकलन कराया गया, उसके मुताबिक करीब 44 करोड़ रुपये व्यय का अनुमान है।

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