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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Gorakhpur News ›   Idol immersion: Maa Durga was worshiped for nine days...then left in dirty water

संशोधित: प्रतिमा विसर्जन

Sat, 20 Apr 2024 05:25 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर Updated Sat, 20 Apr 2024 05:25 AM IST
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Idol immersion: Maa Durga was worshiped for nine days...then left in dirty water
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मूर्ति विसर्जनः नौ दिन मां दुर्गा को पूजा...फिर मैले पानी में छोड़ गए





भूले रीति-रिवाजः राजघाट पर राप्ती नदी के किनारे बिखरे पड़े हैं प्रतिमाओं के अवशेष, आ रही दुर्गंध





चैत्र नवरात्र में भी बड़ी संख्या में किया गया देवी प्रतिमाओं का विसर्जन



नगर निगम ने विसर्जन कुंड में नहीं भरा पानी, सीधे नदी में ही प्रवाहित की गईं प्रतिमाएं



संवाद न्यूज एजेंसी



गोरखपुर। चैत्र नवरात्र में स्थापित देवी प्रतिमाओं के विसर्जन में लोग और जिम्मेदार इस बार आस्था के साथ-साथ रीति-रिवाज भी भूल गए। राजघाट पुल के पास राप्ती नदी किनारे मैले पानी और मलबे में पड़ीं प्रतिमाएं इस बात की गवाही दे रही हैं। विसर्जित प्रतिमाओं के अवशेष देखकर भक्तों की भावनाएं आहत हो रही हैं। हैरत तो इस बात की है कि प्रतिमा विसर्जन से पूर्व घाट पर किसी प्रकार की कोई तैयारी ही नहीं थी। शारदीय नवरात्र में प्रतिमा विसर्जन के लिए बना कृत्रिम तालाब सूखा पड़ा था। इस वजह से श्रद्धालुओं को प्रतिमाएं सीधे नदी में प्रवाहित करनी पड़ीं, जबकि पानी की शुद्धता के लिए ऐसा करने पर मनाही है।



शारदीय नवरात्र की तरह चैत्र नवरात्र में भी देवी प्रतिमाएं स्थापित करने का चलन शुरू हुआ है। कई जगह प्राण प्रतिष्ठित मूर्तियों की नौ दिन पूजा के बाद बृहस्पतिवार रात में विसर्जन किया गया। शहर और गांवों में जो मूर्तियां स्थापित की गई थी, उनका विसर्जन राप्ती नदी के घाट पर हुआ। लेकिन, नगर निगम ने इस बार विसर्जन कुंड में पानी भरा और न ही नदी में विसर्जन के बाद कोई सफाई ही कराई है। लोगों ने घरों में जिन छोटी मूर्तियों की स्थापना कर पूजा की है, वे मूर्तियां और चुनरी, नारियल सहित अन्य सामान भी राजघाट पर यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं।
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नदी तट पर शुक्रवार दोपहर धूप में कुछ बच्चे मूर्तियों के अवशेष बीन रहे थे। कोई नारियल और श्रृंगार के सामान तलाश रहा था तो कोई कपड़े में कुछ पाने की कोशिश में जुटा था। छाेटी मूर्तियों के साथ बच्चे खेलते दिखे। नजदीक के अंत्येष्टि स्थल पर अपने किसी प्रियजन के अंतिम संस्कार में पहुंचे सोनबरसा के लोग यह दृश्य देखकर दु:खी नजर आए।
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लोग बोले--



प्रतिमा विसर्जन के दौरान और उसके बाद भी आस्था का ध्यान दिया जाना चाहिए। पूजी गई सामग्री घाट पर पैरों तले कुचली जा रही है, ऐसा नहीं होना चाहिए।



पारसनाथ जायसवाल, जगदीशपुर, सोनबरसा



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नदी तट पर स्वच्छता होनी चाहिए। प्रतिमा विसर्जन में हुई लापरवाही के कारण यहां दुर्गंध आ रही है। ऐसा लगता है कि यहां स्वच्छता का ध्यान नहीं रखा जाता।



संत कुमार, जगदीशपुर सोनबरसा



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मुझे नदी के किनारे कुछ समय बिताने की इच्छा हुई तो यहां आया। छांव हैं और सुविधाएं भी हैं, लेकिन घाट की ओर स्वच्छता कम है। पूजन सामग्री बिखरी पड़ी है।



रंजीत कुमार, बेलघाट



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सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च करके इस स्थान को सुंदर बना दिया है, लेकिन अधिकारियों की लापरवाही से यहां स्वच्छता की कमी है। व्यवस्था को और बेहतर बनाया जा सकता है।



राजेश कुमार, जगदीश पुर, सोनबरसा



वर्जन



नवरात्र में राप्ती नदी के तट पर सफाई के निर्देश दिए गए थे और जिम्मेदारी तय की गई थी। जिसकी लापरवाही से स्वच्छता में कमी हुई होगी, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।



-गौरव सिंह सोगरवाल, नगर आयुक्त



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विशेषज्ञों की राय



आस्था का रखें ध्यान



प्राण प्रतिष्ठित मूर्तियों का विसर्जन मंत्रों के माध्यम से किया जाता है। भगवती से प्रार्थना की जाती है कि हमने आपका आह्वान किया और पूर्णाहुति कर दी। अब आप अपने स्थान को प्रस्थान करें। उसके बाद आस्था और श्रद्धा भाव से विसर्जन करना चाहिए। विसर्जित मूर्तियों या उनके अवशेष पर किसी का पैर नहीं पड़ना चाहिए। मूर्ति में उपयोग हुई किसी भी सामग्री का गलत उपयोग नहीं होना चाहिए। सही तरीके से विसर्जन होगा तो आस्था के साथ खिलवाड़ नहीं होगा। स्वच्छता बनी रहेगी और जीव-जंतुओं को नुकसान भी नहीं होगा।




राम नारायण त्रिपाठी, महंत हनुमान मंदिर, बेतियाहाता



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एनजीटी का निर्देश है कि नदी में सीधे तौर पर मूर्तियों का विसर्जन नहीं करना चाहिए, इससे पर्यावरण प्रदूषित होता है। कृत्रिम जलस्रोत बनाकर मूर्तियों का विसर्जन करना चाहिए। उसके 24 घंटे बाद मूर्ति को उपयोगी सामानों को जरूरतमंदों को दे देना चाहिए और जल को स्वच्छ कर देना चाहिए। मूर्तियों को नदी की मुख्य धारा में प्रवाहित करने से उसमें लगे प्लास्टर ऑफ पेरिस और पेंट से नुकसान होता है। इन मूर्तियों में लेड, क्रोमियम, आर्सेनिक व एंटीमनी जैसे हानिकारक तत्व होते हैं। इससे हानिकारक गैस भी निकलती है, यह जलीय जीव जंतुओें के लिए हानिकारक होती हैं। बेहतर होगा कि मिट्टी की मूर्तियां बनाई जाए और उसमें हर्बल रंगों को प्रयोग किया जाए।



-प्रो. गोविंद पांडेय, पर्यावरणविद, निदेशक, राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज गोंडा
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