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सामाजिक समरसता लेकर आएगी इस बार की होली, नौ मार्च को होगा होलिका दहन
Mon, 24 Feb 2020 04:58 PM IST
vivek shukla
अविनाश श्रीवास्तव, अमर उजाला, गोरखपुर
अविनाश श्रीवास्तव, अमर उजाला, गोरखपुर
Published by: vivek shukla
Updated Mon, 24 Feb 2020 04:58 PM IST
सार
- होली के दिन बन रहा ध्वज नाम महाऔदायिक योग
- नौ मार्च को होलिका दहन एवं 10 मार्च को खेली जाएगी होली
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होली। (file)
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
रंगोत्सव होली 10 मार्च को मनाया जाएगा। जबकि होलिका दहन नौ मार्च को होगा। इस बार की होली सामाजिक समरसता लेकर आएगी। साथ ही राष्ट्र का उत्थान होगा। ऐसा होली पर बनने वाले ध्वज नामक महाऔदायिक योग से होगा।
होली फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को फाल्गुनिका के नाम से जानी जाती है। इस दिन आमोद-प्रमोद के साथ बुराई के प्रतीक होलिका का दहन किया जाता है और आने वाले वर्ष की शुभता की कामना की जाती है। वैसे तो हर त्योहार का अपना एक रंग होता है लेकिन हरे, पीले, लाल, गुलाबी आदि असल रंगों का एक त्योहार पूरी दुनिया में सिर्फ भारत में मनाया जाता है और वह है होली। इसमें एक ओर रंगों के माध्यम से संस्कृति के रंग में रंगकर सारी भिन्नताएं मिट जाती हैं और सब बस एक रंग के हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर धार्मिक रूप से भी होली बहुत महत्वपूर्ण हैं।
ये है मान्यता
पंडित शरद चंद्र मिश्र ने बताया कि इस दिन स्वयं को ही भगवान मान बैठे हिरण्यकश्यप ने भगवान की भक्ति में लीन अपने ही पुत्र प्रह्लाद को अपनी बहन होलिका (जिसे न जलने का वरदान प्राप्त था) के जरिये जिंदा जला देना चाहा था लेकिन भगवान ने भक्त पर अपनी कृपा की और प्रह्लाद के लिये बनाई चिता में स्वयं होलिका जल मरी। इसलिये इस दिन होलिका दहन की परंपरा भी है। होलिका दहन से अगले दिन रंगों का खेल खेला गया।
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होली फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को फाल्गुनिका के नाम से जानी जाती है। इस दिन आमोद-प्रमोद के साथ बुराई के प्रतीक होलिका का दहन किया जाता है और आने वाले वर्ष की शुभता की कामना की जाती है। वैसे तो हर त्योहार का अपना एक रंग होता है लेकिन हरे, पीले, लाल, गुलाबी आदि असल रंगों का एक त्योहार पूरी दुनिया में सिर्फ भारत में मनाया जाता है और वह है होली। इसमें एक ओर रंगों के माध्यम से संस्कृति के रंग में रंगकर सारी भिन्नताएं मिट जाती हैं और सब बस एक रंग के हो जाते हैं वहीं दूसरी ओर धार्मिक रूप से भी होली बहुत महत्वपूर्ण हैं।
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ये है मान्यता
पंडित शरद चंद्र मिश्र ने बताया कि इस दिन स्वयं को ही भगवान मान बैठे हिरण्यकश्यप ने भगवान की भक्ति में लीन अपने ही पुत्र प्रह्लाद को अपनी बहन होलिका (जिसे न जलने का वरदान प्राप्त था) के जरिये जिंदा जला देना चाहा था लेकिन भगवान ने भक्त पर अपनी कृपा की और प्रह्लाद के लिये बनाई चिता में स्वयं होलिका जल मरी। इसलिये इस दिन होलिका दहन की परंपरा भी है। होलिका दहन से अगले दिन रंगों का खेल खेला गया।
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होली पूजा का महत्व
पंडित मृदुल मिश्रा ने बताया कि घर में सुख-शांति, समृद्धि, संतान प्राप्ति आदि के लिये महिलाएं इस दिन होली की पूजा करती हैं। होलिका दहन के लिए लगभग एक महीने पहले से तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं। कांटेदार झाड़ियों या लकड़ियों को इकट्ठा किया जाता है फिर होली वाले दिन शुभ मुहूर्त में होलिका का दहन किया जाता है।
होलिका दहन का मुहूर्त
नौ मार्च शाम पांच बजकर 52 मिनट से रात्रि 11:26 तक
होलिका दहन का मुहूर्त
नौ मार्च शाम पांच बजकर 52 मिनट से रात्रि 11:26 तक